अयोध्या में ब्राह्मण प्रत्याशियों की होड़ तेज, भाजपा से मिलेगा सिर्फ एक टिकट?

Update: 2026-01-17 13:16 GMT

अयोध्या | विशेष राजनीतिक रिपोर्ट

अयोध्या जिले की दो महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों — अयोध्या सदर और गोसाईगंज — में चुनावी सरगर्मी धीरे-धीरे तेज होती जा रही है। इन दोनों सीटों पर ब्राह्मण और व्यापारी समाज को निर्णायक माना जाता है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो यदि भाजपा इन सीटों पर मजबूत ब्राह्मण चेहरा उतारती है, तभी दोनों सीटों को साध पाना आसान होगा, अन्यथा पार्टी को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

अयोध्या सीट पर ब्राह्मण चेहरों की लंबी सूची

अयोध्या विधानसभा से भाजपा टिकट की दौड़ में इस समय कई ब्राह्मण चेहरे सक्रिय हैं, जिनमें प्रमुख रूप से—

इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी (पूर्व विधायक, गोसाईगंज)

पं. गिरीशपति त्रिपाठी (द्वितीय महापौर)

अभिषेक मिश्रा (युवा चेहरा)

अवधेश सिंह उर्फ बादल पांडे (पूर्व भाजपा जिला अध्यक्ष)

कृष्ण कुमार पांडे उर्फ खुन्नू पांडे

ऋषिकेश उपाध्याय (प्रथम महापौर, अयोध्या नगर निगम)

कौन कितना मजबूत?

खब्बू तिवारी की गोसाईगंज में आज भी मजबूत पकड़ मानी जाती है। यदि पार्टी उन्हें वहां से प्रत्याशी बनाती है, तो सीट भाजपा के पक्ष में जाने की प्रबल संभावना बताई जा रही है।

पं. गिरीशपति त्रिपाठी पर भ्रष्टाचार के आरोप और नकारात्मक छवि के कारण पार्टी के लिए जोखिम भरा विकल्प माने जा रहे हैं।

अभिषेक मिश्रा की पहचान सीमित क्षेत्र तक है। संगठन और शासन स्तर पर संपर्क हैं, लेकिन जमीनी पकड़ कमजोर मानी जाती है।

खुन्नू पांडे और अवधेश सिंह बादल को संगठन के भीतर तो पहचान है, लेकिन आम मतदाताओं में प्रभाव सीमित है।

ऋषिकेश उपाध्याय पर सबसे ज्यादा सहमति

प्रथम महापौर ऋषिकेश उपाध्याय को लेकर सबसे सकारात्मक चर्चा है। सरल, सौम्य और जनसेवा की छवि के साथ उन्हें “गरीबों के मसीहा” के रूप में जाना जाता है। शिक्षा के क्षेत्र में उनके संस्थान के माध्यम से जरूरतमंद छात्रों को आर्थिक राहत देना, और महापौर रहते हुए पारदर्शी व ईमानदार कार्यशैली ने उन्हें जनमानस में अलग पहचान दिलाई है। नगर निगम में उनके कार्यकाल को लेकर कर्मचारियों और अधिकारियों की राय भी सकारात्मक बताई जाती है।

वर्तमान विधायक और परिवारवाद का सवाल

वर्तमान विधायक वेद प्रकाश गुप्ता तीसरी बार टिकट की कोशिश में हैं। चर्चा है कि टिकट न मिलने की स्थिति में वे अपने पुत्र अमल गुप्ता के लिए प्रयास कर सकते हैं। हालांकि भाजपा में परिवारवाद के विरोध की नीति को देखते हुए यह राह आसान नहीं मानी जा रही। लखनऊ का उदाहरण पार्टी के इस रुख को पहले ही स्पष्ट कर चुका है।

अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व के हाथ

भाजपा से जिले में केवल एक ही ब्राह्मण प्रत्याशी को टिकट मिलने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह चरित्र, जनस्वीकार्यता और पारदर्शिता के आधार पर सही चेहरे का चयन करे।

अंतिम निर्णय पार्टी की कोर कमेटी और केंद्रीय नेतृत्व को लेना है, जिस पर से पर्दा 2027 के चुनावी समय में ही उठेगा।

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