जानें, यूपी के चुनाव पर कैसे असर डालेंगे पांच राज्यों के नतीजे

Update: 2016-05-20 01:46 GMT
असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल की सीमाएं भले ही उत्तर प्रदेश को सीधे तौर पर न छूती हों लेकिन इनके चुनाव नतीजे यहां 2017 में होने वाले चुनावी समीकरणों को प्रभावित किए बिना नहीं रहेंगे।

यूपी के चुनावी समर की रणनीति बनाने से लेकर चुनाव प्रचार तक में इन नतीजों का असर दिखेगा। बिहार चुनाव के नतीजों से हतोत्साहित भाजपाइयों के लिए ये नतीजे ऑक्सीजन का काम करेंगे तो कांग्रेसियों के लिए चुनौती बढ़ाने वाले और चेतावनी के साथ सबक देने वाले रहे हैं।

बंगाल व तमिलनाडु में ममता व जयललिता की वापसी को सपा व बसपा क्षेत्रीय दलों का उभार मानकर उत्साहित हो सकती है लेकिन नतीजे इन्हें भी अपनी रीति-नीति में बदलाव लाने के लिए आगाह कर रहे हैं।

राजनीति शास्त्रियों व वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि भले ही पुडुचेरी में द्रमुक व कांग्रेस जीत गई हो लेकिन यह बात बिल्कुल साफ हो गई है कि पूरे देश में कांग्रेस विरोधी हवा तेज होती जा रही है। मतदाताओं में कांग्रेस को लेकर नाराजगी इतनी ज्यादा है कि कांग्रेस के साथ रहने वालों को भी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

कांग्रेस का साथ लिया तो उठाना पड़ा नुकसान


तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के नतीजे इसका प्रमाण हैं। दोनों ही जगह क्रमश: द्रमुक और वामपंथी दलों को कांग्रेस के साथ का नुकसान भुगतना पड़ा है। केरल में वाममोर्चा की जीत हुई है लेकिन यहां कांग्रेस से मुकाबला था।

जाहिर है कि इन नतीजों ने उप्र में कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। उन्हें चुनाव मैदान में उतरने के लिए इन राज्यों में पराजय के प्रभाव को कम करने के  लिए तर्क तलाशने होंगे। जो काफी मुश्किल होगा।

यही नहीं, कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में गठबंधन के लिए साथियों की तलाश भी मुश्किल होगी। सपा और बसपा जैसे दल भविष्य में कांग्रेस से और दूरी बनाते दिख सकते हैं।

उप्र में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की सोच रहे जनता दल (यू) को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार के लिए विवश होना पड़ सकता है। रालोद जैसे दल भी अब शायद ही कांग्रेस के साथ खड़े होकर लड़ने की सोचें।

इन नतीजों के बाद भाजपा नेता अब ज्यादा ताकत और भरोसे के साथ जनता के बीच कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बुलंद कर सकेंगे। वे असम, बंगाल, केरल और तमिलनाडु का उदाहरण देकर कह सकेंगे कि देखो सभी जगह कांग्रेस साफ हो रही है।

तुष्टीकरण नीति के बावजूद असम जैसे उस राज्य में भी सफल नहीं हो पाई जहां देश के किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा 30 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम हैं।

राजनीति शास्त्री प्रो. जेके पुंडीर कहते हैं, जिस तरह इन चुनाव में ज्यादातर राज्यों में भाजपा का मत प्रतिशत बढ़ा है और खाता खुला है, उससे इस पार्टी के नेताओं को यह कहने का आधार मिल गया है कि देश में कांग्रेस की अस्वीकार्यता और भाजपा की स्वीकार्यता में वृद्धि हुई है।

दिल्ली में मिली भारी पराजय के बाद राज्यों के चुनाव में भावी मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से बचती आ रही भाजपा इन नतीजों के बाद उप्र में चेहरे के प्रयोग पर आगे बढ़ सकती है। भाजपा के अंदर से भी चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने की आवाज उठ सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल के मुताबिक असम में तरुण गोगोई का अति आत्मविश्वास, कांग्रेस में लंबे समय से नंबर दो की स्थिति में रहने वाले हेमंत बिसवाल की उपेक्षा और उनका भाजपा में शामिल हो जाना तथा एआईयूडीएफ नेता बदरुद्दीन अजमल का यह बयान कि भाजपा और नरेन्द्र मोदी की हिंदूवादी राजनीति को रोकने के लिए उसके खिलाफ वोट दें, भी कहीं न कहीं कमल खिलाने में सहायक बने हैं।

यदि लाल के निष्कर्ष को मान लें तो भी इसमें भाजपा के लिए ऑक्सीजन छिपी दिख रही है। वह असम का उदाहरण देकर यूपी में कह सकती है कि असम जैसे मुस्लिम प्रभावित राज्य में उसकी जीत मोदी के नारे सबका साथ-सबका विकास पर भरोसे की जीत है। भाजपा की राष्ट्रवादी नीतियों का विरोध करने वालों की हार है।

सपा-बसपा का बढ़ा उत्साह पर बदलना होगा काम करने का ढंग


लाल कहते हैं कि तृणमूल की बंगाल में तो अन्नाद्रमुक की तमिलनाडु में सत्ता में वापसी सूबे के सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दलों का हौसला बढ़ाने वाली है।

तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के नतीजों के बाद यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सत्ता में फिर वापसी के दावे को ताकत मिल सकती है। पर, उन्हें यह याद रखना होगा कि जयललिता व ममता की वापसी सिर्फ एक्सप्रेस वे, बड़े-बड़े पार्क व स्टेडियम के निर्माण तथा किसी वर्ग को विशेष सुविधाएं देने की बदौलत ही नहीं हुई है।

इसलिए अखिलेश को भी वापस आने के लिए अपनी और अपने सरकार की कार्यशैली सुधारनी होगी। कानून-व्यवस्था ठीक करके अपने और अपने अधिकारियों की कार्यप्रणाली को दुरुस्त कर जनता को पारदर्शी प्रशासन का एहसास करना होगा। उनकी समस्याओं के त्वरित समाधान का संदेश देना होगा।

लाल की बात सही लगती है क्योंकि तमिलनाडु में जयललिता का महिलाओं से शराबबंदी का वादा तो पश्चिम बंगाल में ममता की सादगी, जनता से सीधे संवाद और प्रशासन में पारदर्शिता की भूमिका भी रही है।

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