'सेवा तीर्थ' से अपने पहले संबोधन में बोले पीएम मोदी- आज हम एक नए इतिहास को बनते देख रहे हैं. 13 फरवरी का यह दिन भारत की विकास यात्रा में एक नए आरंभ का साक्षी बन रहा है.

Update: 2026-02-13 13:33 GMT

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को नए प्रशासनिक परिसर 'सेवा तीर्थ' का अनावरण करने के बाद कहा कि आज हम एक नए इतिहास को बनते देख रहे हैं. 13 फरवरी का यह दिन भारत की विकास यात्रा में एक नए आरंभ का साक्षी बन रहा है. हम विकसित भारत का संकल्प लेकर सेवा तीर्थ में, कर्तव्य भवन में प्रवेश कर रहे हैं. अपने लक्ष्य में विजय होने का दैवीय आशीर्वाद हमारे साथ है.

पीएम मोदी ने कहा कि आजादी के बाद साउथ ब्लॉक और नॉर्थ ब्लॉक जैसी इमारतों से देश के लिए अनेक अहम निर्णय हुए, नीतियां बनीं. लेकिन ये भी सच है कि ये इमारतें ब्रिटिश साम्राज्य के प्रतीक के तौर पर बनाई गई थीं. इन इमारतों को बनाने का मकसद भारत को सदियों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रखना था. 

प्रधानमंत्री ने कहा कि एक समय था, जब कलकत्ता शहर देश की राजधानी हुआ करता था. लेकिन 1905 के बंगाल विभाजन के उस दौर में कलकत्ता ब्रिटिश विरोधी आंदोलन का प्रबल केंद्र बन चुका था. इसलिए अंग्रेजों ने 1911 में भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली शिफ्ट किया, और उसी के बाद अंग्रेजी हुकूमत की जरूरतों और उसकी सोच को ध्यान में रखकर नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक जैसी इमारतें बनाने का काम शुरु हुआ.

पीएम ने कहा कि रायसीना हिल्स के इन भवनों के उद्घाटन के वक्त उस समय के वायसराय ने कहा था कि ये भवन ब्रिटिश सम्राट की इच्छाओं के अनुरूप बने हैं. यानी ये भवन ब्रिटेन के महाराजा की सोच को गुलाम भारत की जमीन पर उतारने का माध्यम थे. रायसीना हिल्स का चुनाव भी इसलिए किया गया ताकि ये इमारतें दूसरी इमारतों से ऊपर रहें, कोई उनकी बराबरी न कर सके.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि सेवा तीर्थ का ये परिसर किसी पहाड़ी पर न होकर जमीन से ज्यादा जुड़ा है. मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन जैसे नए परिसर भारत की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए बने हैं. यहां से जो फैसले होंगे, वो किसी महाराजा की सोच को नहीं, 140 करोड़ देशवासियों की अपेक्षाओं को आगे बढ़ाने का आधार बनेंगे.

पीएम मोदी ने कहा कि इस समय 21वीं सदी का पहला क्वार्टर पूरा हो चुका है. ये जरूरी है कि विकसित भारत की हमारी कल्पना केवल नीतियों और योजनाओं में ही नहीं, हमारे कार्यस्थलों और हमारी इमारतों में भी दिखाई दे. जहां से देश का संचालन होता है, वो जगह प्रभावी और प्रेरणादायी होनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि करीब 100 साल पुरानी ये इमारतें अंदर से जर्जर होती जा रही थीं, नए तकनीकों और टूल्स के उपयोग के लिए नाकाफी साबित हो रही थीं, इनमें जगह और सुविधाओं की अपनी सीमाएं थीं. इसके अलावा भी कई चुनौतियां थीं.

 

पीएम ने बताया कि आजादी के इतने दशकों बाद भी भारत सरकार के अनेकों मंत्रालय दिल्ली के 50 से ज्यादा अलग-अलग स्थानों से चल रहे हैं. हर साल इन मंत्रालयों की इमारतों के किराए पर ही प्रतिवर्ष डेढ़ हजार करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो रहे हैं. हर रोज 8-10 हजार कर्मचारियों को एक इमारत से दूसरी इमारत में आने-जाने का लॉजिस्टिक खर्च अलग होता था. अब सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन के निर्माण से ये खर्च कम होगा, समय बचेगा और कर्मचारियों के समय की इस बचत से प्रोडक्टिविटी बढ़ेगी.

पीएम ने कहा कि पुराने भवनों से कई महत्वपूर्ण फैसले हुए, देश को नई दिशा मिली, सुधार की पहलें हुईं. वो परिसर, वो इमारत भारत के इतिहास का अमर हिस्सा है. इसलिए हमने उन भवनों को देश के लिए समर्पित म्यूजियम बनाने का फैसला किया है. वो युगेयुगीन भारत म्यूजियम का हिस्सा होंगी. वो देश की आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा केंद्र बनेंगी.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि विकसित भारत की इस यात्रा में ये जरूरी है कि भारत गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर आगे बढ़े. दुर्भाग्य की बात है कि आजादी के बाद भी हमारे यहां गुलामी के प्रतीकों को ढोया जाता रहा. प्रधानमंत्री आवास को रेसकोर्स कहा जाता था, उपराष्ट्रपति के लिए कोई निवास स्थान था ही नहीं. राष्ट्रपति भवन तक आने वाले रास्ते को लोकतंत्र में राजपथ कहा जाता था. आजाद भारत में जो सैनिक, सुरक्षा बल, पुलिसकर्मी शहीद हुए, उनके लिए कोई स्मारक ही नहीं था. यानी दिल्ली की राजधानी पूरी तरह गुलामी की मानसिकता में जकड़ी हुई थी. 

Similar News