PDA पर घमासान : पंकज चौधरी का अखिलेश यादव पर हमला, बोले—पहले तय करें PDA का मतलब क्या है?
रिपोर्ट : विजय तिवारी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में PDA को लेकर सियासी टकराव तेज़ हो गया है। केंद्रीय राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पर PDA को लेकर जनता में भ्रम फैलाने का आरोप लगाया है। चौधरी ने कहा कि सपा नेतृत्व को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि PDA का वास्तविक अर्थ क्या है, क्योंकि अस्पष्ट नारों और दिखावटी शब्दों से राजनीति नहीं चलती।
PDA की परिभाषा पर तीखे सवाल
पंकज चौधरी ने कहा कि PDA में P का मतलब पंडित है या पिछड़ा वर्ग, D दलित है या दबंग और A अल्पसंख्यक है या अनुसूचित वर्ग—इस पर खुद सपा के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। उनके अनुसार, जब किसी राजनीतिक अवधारणा की परिभाषा ही स्पष्ट न हो, तो उसके आधार पर समाज को जोड़ने का दावा खोखला साबित होता है।
“दिखावटी नारों से नहीं बनता भरोसा”
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आज की जनता परिपक्व है और वह केवल नारेबाज़ी से प्रभावित नहीं होती। जनता स्पष्ट सोच, ठोस नीति और ज़मीनी काम को महत्व देती है। उन्होंने आरोप लगाया कि PDA के नाम पर भ्रम पैदा कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जा रही है, लेकिन ऐसे प्रयोगों का जनता समर्थन नहीं करती।
सपा की रणनीति पर सवाल
चौधरी ने कहा कि सपा अलग-अलग मंचों पर PDA की अलग-अलग व्याख्या पेश कर रही है, जिससे यह साफ होता है कि यह कोई ठोस सामाजिक एजेंडा नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति है। उन्होंने कहा कि जब नेतृत्व खुद कंफ्यूजन में हो, तो उससे स्थिर और भरोसेमंद राजनीति की उम्मीद नहीं की जा सकती।
अखिलेश यादव का पक्ष
दूसरी ओर, अखिलेश यादव लगातार यह कहते रहे हैं कि PDA के माध्यम से पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एकजुट कर सामाजिक न्याय को मज़बूत किया जाएगा। वे इसे व्यापक सामाजिक गठजोड़ बताते हैं और भाजपा पर इन वर्गों की अनदेखी का आरोप लगाते रहे हैं।
राजनीतिक मायने और चुनावी संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, PDA को लेकर यह बयानबाज़ी आगामी चुनावी माहौल से जुड़ी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक वर्गों का संतुलन हमेशा निर्णायक रहा है। ऐसे में एक ओर सपा PDA को सामाजिक एकता का प्रतीक बता रही है, वहीं भाजपा इसे भ्रम और दिखावे की राजनीति करार देकर आक्रामक रुख अपनाए हुए है।
PDA को लेकर छिड़ा यह विवाद केवल शब्दों की लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भरोसे से जुड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। आने वाले दिनों में इस पर बयान और तीखे होने की संभावना है, जिससे उत्तर प्रदेश की राजनीति और अधिक गरमाने के संकेत मिल रहे हैं।