काशी में PDA पंचांग पर सियासी बवाल- परंपरा बनाम प्रचार: सनातन संस्कृति को वोट बैंक की भेंट?

Update: 2026-01-05 14:02 GMT

वाराणसी, 5 जनवरी 2026।

काशी- जिसे सनातन संस्कृति, वेद, दर्शन और ज्ञान की राजधानी कहा जाता है- आज एक ऐसे विवाद के केंद्र में है, जिसने धार्मिक परंपरा और राजनीतिक प्रचार की सीमाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता अजय चौरसिया द्वारा जारी PDA पंचांग को लेकर काशी के विद्वानों और धर्माचार्यों में तीखा आक्रोश है। उनका आरोप है कि सदियों पुरानी वैदिक परंपरा को सियासी एजेंडे का औजार बनाने की कोशिश की गई है।

पंचांग: केवल कैलेंडर नहीं, सनातन परंपरा का आधार

काशी में पंचांग को मात्र तिथियों और पर्वों की सूची नहीं माना जाता। यह वैदिक गणना, खगोलीय विज्ञान और आध्यात्मिक अनुशासन का जीवंत दस्तावेज है। सूर्य, चंद्रमा और नक्षत्रों की सूक्ष्म गणना पर आधारित पंचांग के अनुसार ही व्रत, पर्व, संस्कार और धार्मिक अनुष्ठान तय होते हैं। यही कारण है कि इसे सनातन संस्कृति की रीढ़ कहा जाता है।

विवाद की जड़: PDA पंचांग

PDA पंचांग में पर्वों और तिथियों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी से जुड़े दिवंगत नेताओं एवं मुस्लिम समुदाय की तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं। काशी के विद्वानों का कहना है कि यह कदम धार्मिक परंपरा का खुला उल्लंघन है। उनका आरोप है कि श्रद्धांजलि के नाम पर पंचांग को राजनीतिक प्रचार पुस्तिका में बदल दिया गया है।

विद्वानों का स्पष्ट कहना है कि यदि उद्देश्य श्रद्धांजलि देना था, तो इसके लिए सामान्य कैलेंडर या अलग पुस्तिका प्रकाशित की जा सकती थी। पंचांग को वोट बैंक साधने का माध्यम बनाना न केवल अनुचित है, बल्कि सनातन संस्कृति का अपमान भी है।



विद्वानों का तीखा प्रतिरोध

सनातन रक्षक दल से जुड़े काशी के प्रख्यात विद्वान पंडित अजय शर्मा ने PDA पंचांग को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि पंचांग में मृत व्यक्तियों की तस्वीरें शामिल करना धार्मिक दृष्टि से पूर्णतः अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा,

“पंचांग कोई स्मृति-पुस्तिका नहीं है। इसमें प्रेत समान व्यक्तियों का उल्लेख करना वैदिक परंपरा के खिलाफ है।”

पंडित शर्मा ने इसे “छपास की बीमारी” बताते हुए कहा कि यह श्रद्धा नहीं, बल्कि सस्ती लोकप्रियता और राजनीतिक लाभ की कोशिश है।

संस्कृति पर आघात, राजनीति को लाभ

विद्वानों का मानना है कि पंचांग जैसे पवित्र ग्रंथ का राजनीतिकरण काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक गरिमा पर सीधा प्रहार है। दिवंगत नेताओं की तस्वीरें श्रद्धांजलि से अधिक सियासी संदेश देती हैं। पंडित अजय शर्मा ने ऐसे प्रयासों को “शिवद्रोह” तक करार देते हुए कहा कि सनातन परंपरा से खिलवाड़ करने वालों को इसका नैतिक उत्तर देना होगा।

पंचांग का वैदिक और वैज्ञानिक महत्व

पंडित शर्मा ने पंचांग की वैदिक वैज्ञानिकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पंचांग पांच अंगों—तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण—से मिलकर बनता है। इसकी गणनाएं अनादि काल से चली आ रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आज आधुनिक वैज्ञानिक संस्थाएं, यहां तक कि नासा जैसी एजेंसियां भी ग्रहण और खगोलीय घटनाओं के लिए भारतीय पंचांग की गणनाओं को महत्व देती हैं।

बड़ा सवाल

काशी में उठा यह विवाद केवल एक पंचांग का नहीं, बल्कि उस सीमा रेखा का है, जहां धर्म समाप्त होता है और राजनीति शुरू। सवाल यह है कि क्या सनातन परंपराओं को राजनीतिक प्रचार का मंच बनाया जाना स्वीकार्य है?

काशी के विद्वानों का स्पष्ट मत है—पंचांग आस्था का ग्रंथ है, प्रचार की किताब नहीं।

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