कर्नाटक में नई आबकारी नीति लागू, बीयर के दाम बढ़े 800 से 1200 रुपये तक महंगी हुई प्रीमियम बीयर, आम उपभोक्ताओं पर असर
रिपोर्ट : विजय तिवारी
बेंगलुरु।
कर्नाटक सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए नई आबकारी (एक्साइज) नीति को मंजूरी दे दी है। इस नीति के लागू होते ही राज्य में शराब, विशेष रूप से बीयर की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। नई व्यवस्था के तहत प्रीमियम श्रेणी की बीयर अब 800 रुपये से बढ़कर 1,200 रुपये तक पहुंच गई है, जिससे उपभोक्ताओं की जेब पर सीधा असर पड़ा है।
सरकार के निर्णय के अनुसार बीयर और अन्य मादक पेय पदार्थों पर अतिरिक्त आबकारी शुल्क लगाया गया है। अधिकारियों का कहना है कि यह कदम राज्य के राजस्व को मजबूत करने और वित्तीय घाटे को नियंत्रित करने के उद्देश्य से उठाया गया है। नई नीति के बाद शराब की अलग-अलग श्रेणियों की कीमतों में बदलाव किया गया है, जिसमें प्रीमियम और हाई-एंड ब्रांड्स पर अधिक असर पड़ा है।
राजस्व बढ़ाने पर सरकार का जोर
सरकारी सूत्रों के मुताबिक कर्नाटक में आबकारी विभाग से सरकार को हर साल हजारों करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त होता है। नई नीति के माध्यम से इस आय में और इजाफा करने का लक्ष्य रखा गया है। अनुमान है कि बढ़ी हुई दरों से राज्य को अतिरिक्त राजस्व मिलेगा, जिसका उपयोग कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास में किया जाएगा।
होटल और बार कारोबारियों की चिंता
बीयर की कीमतों में बढ़ोतरी से होटल, बार और पब संचालकों में भी चिंता देखी जा रही है। उनका कहना है कि महंगी कीमतों के कारण ग्राहकों की संख्या में गिरावट आ सकती है, जिससे कारोबार प्रभावित होगा। कई कारोबारियों ने आशंका जताई है कि उपभोक्ता अब सस्ती श्रेणी की शराब की ओर रुख कर सकते हैं।
उपभोक्ताओं पर सीधा असर
नई कीमतों से आम उपभोक्ता भी असंतुष्ट नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे लोगों के लिए यह फैसला अतिरिक्त बोझ लेकर आया है। खासकर युवा वर्ग और शहरी उपभोक्ताओं पर इसका ज्यादा प्रभाव पड़ने की संभावना है।
विपक्ष का विरोध
सरकार के इस फैसले पर विपक्षी दलों ने भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि राजस्व बढ़ाने के नाम पर जनता पर बोझ डालना उचित नहीं है। विपक्ष ने मांग की है कि सरकार आबकारी नीति की समीक्षा करे और कीमतों में की गई बढ़ोतरी पर पुनर्विचार करे।
सरकार ने साफ किया है कि नई आबकारी नीति फिलहाल लागू रहेगी और इसके प्रभावों की नियमित समीक्षा की जाएगी। यदि राजस्व और सामाजिक प्रभावों में असंतुलन देखा गया, तो आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं।