एससी–एसटी–ओबीसी महिलाओं के पक्ष में

Update: 2026-01-19 14:07 GMT


जुबां कहती है सारा कसूर उनका है,

जमीर कहता है गुनाहगार हम भी हैं।

— दीपक मिश्र

फूल सिंह बरैया नामक एक कठोर हृदय विधायक ने यह बयान दिया है कि धर्मग्रंथों में लिखा है कि एससी–एसटी और पिछड़ी महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने से तीर्थ का फल प्राप्त होता है। यह कथन न केवल घृणित और अमानवीय है, बल्कि घोर अज्ञान और दुराग्रह का परिचायक भी है।

प्रतीत होता है कि विधायक के नाम में प्रयुक्त ‘फूल’ शब्द हिंदी का नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी का *fool* है, जिसका अर्थ मूर्ख, मतिहीन और मदान्ध होता है। संयोग से इन दिनों मैं स्वयं धर्मग्रंथों का अध्ययन कर रहा हूँ और अपने अध्ययन के आधार पर विधायक के इस बयान को सिरे से खारिज करता हूँ। यह कथन दुखद, दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय और दण्डनीय है।

हमारा धर्म और हमारी कोई भी प्रामाणिक धार्मिक पुस्तक ऐसे कुकृत्य या कदाचार की अनुमति कदापि नहीं देती। स्त्री में अगड़े–पिछड़े का विभेद करना ही अतार्किक, अमानवीय और आपत्तिजनक है। रामायण में प्रभु श्रीराम द्वारा शबरी को देवीतुल्य सम्मान दिया गया है, जिसका सुंदर वर्णन तुलसीदास जी ने किया है। यह प्रमाण है कि हमारी परंपरा में नारी की प्रतिष्ठा अप्रतिम रही है।

भारतीय लोकधर्म का सुप्रसिद्ध कथन है—

*“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”*

अर्थात जहाँ नारियों का सम्मान नहीं होता, वहाँ समस्त शुभ और पवित्र कर्म भी निष्फल हो जाते हैं। वेदों, पुराणों और उपनिषदों में नारी की महिमा गाई गई है। इनमें कहीं भी स्त्री के साथ जातिगत भेदभाव का समर्थन नहीं मिलता।

रामायण और रामचरितमानस हमें प्रत्येक नारी में सीता देखने की प्रेरणा देते हैं—

“सिय राम मय सब जग जानी,

करहु प्रणाम जोरि जुग पानी।”

गीता में योगेश्वर श्रीकृष्ण भी हर नारी में ईश्वर देखने की शिक्षा देते हैं—

“समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥”

विधायक महोदय को अपनी संकीर्ण और विकृत सोच को धर्मग्रंथों से जोड़ने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए। जिस पुस्तक का वे उल्लेख कर रहे हैं, वह हमारे धर्मग्रंथ के रूप में मान्य नहीं है। इस प्रकार की पैशाचिक मानसिकता समाज के लिए सर्वग्रासी और विनाशकारी है।

सभी स्त्रियाँ—चाहे वे किसी भी धर्म, संप्रदाय, जाति, क्षेत्र या कुल की हों—समान रूप से सम्मान की अधिकारी हैं। उनके साथ दुष्कर्म तो दूर, उन्हें बुरी दृष्टि से देखने तक की अनुमति हमारे धर्मग्रंथ नहीं देते। रावण ने नारी का अपहरण किया था, और उसका पुतला आज भी जलाया जाता है।

विधायक को धर्मग्रंथों का गंभीर अध्ययन करना चाहिए और भारत माता से सार्वजनिक रूप से क्षमा माँगनी चाहिए। उन्होंने भले ही एससी, एसटी या पिछड़ी जाति की महिलाओं का उल्लेख किया हो, किंतु यह अपमान भारत माता, समस्त नारियों और मानवीय मूल्यों का अपमान है।

उनके कथन में निहित कुत्सित सोच अत्यंत घातक है। हमारा स्पष्ट मत है कि हर नारी में भारत माता का नूर है। हर नारी सुंदर है। सुंदरता की कसौटियाँ भिन्न हो सकती हैं, किंतु जिन्हें सुंदरता दिखाई नहीं देती, वे पहले अपनी आँखों की जाँच कराएँ; और यदि आँखें ठीक निकलें, तो अपने मस्तिष्क का उपचार कराएँ।

विधायक महोदय एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं। उनसे इस प्रकार की असंवैधानिक और अमर्यादित भाषा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। उन्हें भारत माता और नारी समाज से सार्वजनिक रूप से क्षमा माँगनी चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो हम सभी उनका सविनय बहिष्कार करेंगे और चुनाव में उनके विरुद्ध अभियान चलाएँगे।

अब यह नहीं चलेगा कि कोई भी कुछ भी बोले और बोलकर चलता बने। हम अनर्गल प्रलापों का प्रतिबद्ध प्रत्युत्तर देंगे और प्रबल प्रतिकार करेंगे। यही हमारा लोकधर्म, जनदायित्व और राष्ट्रीय कर्तव्य है। हम चुप रहने के अपराधी अब और नहीं बनेंगे।

फिर कह रहा हूँ और कहता रहूँगा—

जुबां कहती है सारा कसूर उनका है,

जमीर कहता है गुनाहगार हम भी हैं।

दीपक मिश्र

सदस्य

संवैधानिक व संसदीय (अ. सं. का.) समिति

अध्यक्ष — बौद्धिक सभा

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