रोटियों से आगे की सोच… समाज को जगाने की एक कोशिश

Update: 2026-01-06 10:05 GMT

आनन्द प्रकाश गुप्ता

बहराइच।

कुछ महिलाएँ ऐसी भी होती हैं, जिनके हाथों से फूली हुई रोटियाँ निकलती हैं, लेकिन समाज उन्हें बस उसी दायरे में बाँध देता है। सवाल यही है—

क्या स्त्री की पहचान सिर्फ़ रसोई तक सीमित है?

इसी प्रश्न से जन्म लेती है वह संवेदनशील सोच, जो आज सामाजिक सरोकारों की दिशा में आगे बढ़ रही है। बहुत कम लोग होते हैं, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इन सवालों को महसूस करते हैं और फिर उन्हें समाज के सामने रखने का साहस भी करते हैं। ऐसे ही प्रयासों की एक सशक्त कड़ी के रूप में एक सामाजिक संस्था लगातार उन मुद्दों को उठाने का कार्य कर रही है, जिन पर सोचना ज़रूरी है, मगर जिन पर अक्सर चुप्पी छा जाती है।

संस्था से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि सीमित जीवन में हम कुछ सकारात्मक नहीं कर पाए, तो जीवन का वास्तविक अर्थ अधूरा रह जाता है। यही सोच उन्हें हर दिन कुछ नया, कुछ बेहतर करने की प्रेरणा देती है। उनकी संवेदनाएँ कान से दिमाग और दिमाग से दिल तक का सफ़र तय करती हैं—और फिर वही संवेदनाएँ समाज के लिए नई ऊर्जा बन जाती हैं।

इसी भावभूमि पर जनपद की साहित्यिक, सामाजिक और बौद्धिक परंपरा को आगे बढ़ाने का एक सार्थक प्रयास किया गया है। यह पहल केवल एक पत्रिका या लेख का प्रकाशन भर नहीं, बल्कि उस परंपरा की अगली कड़ी है, जो समाज को सोचने, समझने और बदलने की ताक़त देती है।

‘बहराइच स्मारिका’ का द्वितीय संस्करण बना विमर्श का मंच

कलाम फाउंडेशन, बहराइच द्वारा प्रकाशित ‘बहराइच स्मारिका’ के द्वितीय संस्करण में सामाजिक चेतना और नारी विमर्श को केंद्र में रखते हुए कई विचारोत्तेजक रचनाएँ शामिल की गई हैं।

विशेष रूप से पत्रकार भागवत शुक्ला द्वारा लिखित संपादकीय—

“शिखर की राह, संघर्ष की तपिश से कुंदन बनती भारतीय नारी”—

नारी संघर्ष, आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की सशक्त व्याख्या करता है।

इस स्मारिका में पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह, सांसद डॉ. आनंद गोंड, ब्लॉक प्रमुख अजीत प्रताप सिंह, भाजपा किसान मोर्चा सदस्य सुरेश प्रताप सिंह, सदर विधायक अनुपमा जायसवाल, प्रयागपुर विधायक सुभाष त्रिपाठी, डॉ. जितेंद्र सिंह (अध्यक्ष, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा), लोकतांत्रिक युवा शक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पं. राजकुमार बाजपेयी, उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व मंत्री याशर शाह तथा पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव ने कलाम फाउंडेशन के संस्थापक—जो शिक्षा जगत के साथ-साथ साहित्यकार एवं वरिष्ठ समाजसेवी भी हैं—के प्रति अपने संदेशों के माध्यम से आभार प्रकट किया है।

नारी सशक्तिकरण की सशक्त आवाज़

महिलाओं के उत्थान की बात हो और दिव्या पोरवाल का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संस्था को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का कार्य किया है। उनके प्रयासों ने यह सिद्ध किया है कि नेतृत्व जब संवेदनशील हाथों में हो, तो बदलाव सिर्फ़ नारा नहीं, हकीकत बन जाता है।

पर्यटन और अन्य उद्योगों को सामाजिक विकास का प्रमुख माध्यम बताते हुए डॉ. मेजर एस. पी. सिंह (सचिव, किसान पी.जी. कॉलेज) का लेख भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वहीं पत्रकार अजय त्रिपाठी द्वारा लिखा गया “मेरा बहराइच” शीर्षक आलेख जनपद से भावनात्मक जुड़ाव और सामाजिक यथार्थ का मार्मिक चित्रण करता है।

एक छोटा सा सवाल, बड़ी सोच की शुरुआत

आज जब संवेदनाएँ अक्सर शोर में दब जाती हैं, तब ऐसी पहलें यह याद दिलाती हैं कि बदलाव की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि एक छोटे से सवाल से होती है—

“रोटियाँ पकाने के अलावा आता ही क्या है?”

यही सवाल, धीरे-धीरे समाज की सोच बदलने की ताक़त बन जाता है—

और यही ताक़त, आने वाले कल की दिशा तय करती है।

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