वो 5 मौके, जब कांग्रेस ने की मुसलमानों को आरक्षण देने की घोषणा

Update: 2024-12-18 13:56 GMT

संविधान और आरक्षण के बैरियर को लेकर संसद में गतिरोध जारी है. मंगलवार को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में कांग्रेस पर निशाना साधा. अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस 50 प्रतिशत के बैरियर को इसलिए तोड़ना चाहती है, जिससे धर्म के आधार पर आसानी से आरक्षण दिया जा सके.

संसद में शाह ने कहा कि जब तक लोकसभा और राज्यसभा में बीजेपी के पास एक भी सदस्य है, तब तक देश में धर्म के आधार पर आरक्षण लागू नहीं होने दिया जाएगा. यह पहली बार नहीं है, जब मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस किसी पार्टी की रडार में है.

पिछले 30 साल में मुसलमानों को आरक्षण देने की घोषणा को लेकर कांग्रेस की कम से कम 5 बार किरकिरी हो चुकी है.

मुस्लिम आरक्षण को लेकर कब-कब विवादों में आई कांग्रेस?

1. भास्कर रेड्डी की घोषणा और चली गई सरकार

1994 में आंध्र प्रदेश में कोटला भास्कर रेड्डी की आंध्र प्रदेश में सरकार थी. रेड्डी ने एक घोषणा में कहा कि मुसलमानों को आंध्र प्रदेश में 4 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा. रेड्डी ने इसके लिए मुसलमानों के 14 जातियों के नामों की घोषणा भी की. उन्होंने कहा कि सरकार में आने पर इन सभी जातियों को ओबीसी की कैटेगरी में शामिल किया जाएगा.

रेड्डी की घोषणा से आंध्र में सियासी घमासान शुरू हो गया. जगह-जगह भास्कर रेड्डी की सरकार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आए. उस वक्त विपक्षी टीडीपी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया.

1995 के चुनाव में मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे से कांग्रेस बैकफुट पर चली गई. रेड्डी की करारी हार हुई और टीडीपी ने सरकार में वापसी की. रेड्डी के प्रस्ताव को टीडीपी ने सिरे से खारिज कर दिया. 1999 में भी आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं आई, जिसके बाद यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया.

2. वाईएसआर आए और 5 प्रतिशत आरक्षण दे गए

2004 में आंध्र प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस ने मजबूत वापसी की. मुख्यमंत्री की कुर्सी वाईएस रेड्डी को मिली. रेड्डी ने मुस्लिमों को साधने के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर दी. सरकार ने इस पर अमल भी शुरू कर दिया, लेकिन पहले यह केस हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया.

वर्तमान में यह मामला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के पास पेंडिंग है. हाईकोर्ट ने 2010 में इस पर रोक लगा दी थी. आंध्र प्रदेश में मुसलमानों की आबादी करीब 9 प्रतिशत है. यहां के चुनावों में मुस्लिम अहम फैक्टर माने जाते हैं. 2014 के बाद से आंध्र की सत्ता में कांग्रेस की वापसी नहीं हो पाई है.

3. 2012 में यूपी में आरक्षण देने की घोषणा की

2009 में यूपी की 80 में से 21 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली. इस जीत से गदगद कांग्रेस ने 2012 के विधानसभा चुनाव में पूरी मजबूती के साथ मैदान में उतरने की घोषणा की. कांग्रेस में उस वक्त चुनाव मैनेजमेंट की कमान सलमान खुर्शीद को सौंपी गई. प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री थे.

सलमान खुर्शीद उस वक्त मनमोहन सरकार में मंत्री थे. खुर्शीद ने यूपी में चुनाव से पहले बड़ी घोषणा की. उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सरकार अगर आएगी तो हम मुसलमानों को 5 प्रतिशत आरक्षण देंगे.

खुर्शीद के इस बयान पर जमकर राजनीति हुई. उस वक्त बीजेपी के लालकृष्ण आडवाणी ने इसे तुष्टिकरण की राजनीति बताया. बीएसपी समेत कई विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस के इस घोषणा पर सवाल उठाए.

4. महाराष्ट्र में मराठाओं के साथ मुसलमानों को साधा

2014 में महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन ने तुल पकड़ लिया. इससे निपटने के लिए तत्कालीन पृथ्वीराज चव्हाण की सरकार ने मराठाओं को आरक्षण देने की घोषणा कर दी. इसके तहत महाराष्ट्र में मराठाओं को अलग से 16 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की गई.

चव्हाण सरकार ने इसी के साथ मुसलमानों को भी 5 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर दी. मुस्लिम आरक्षण की घोषणा होते ही महाराष्ट्र में सियासी बवाल शुरू हो गया. शिवसेना और बीजेपी ने इसका पुरजोर विरोध किया.

सरकार इसे तुरंत होल्ड करने का फैसला किया, लेकिन इसके पक्ष में दलील देते हुए कहा कि जब 32 प्रतिशत मराठाओं को 16 प्रतिशत आरक्षण दी जा सकती है तो 11 प्रतिशत मुसलमानों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने में क्या दिक्कत है?

2014 के विधानसभा चुनाव में चव्हाण की सरकार चली गई, जिसके बाद बीजेपी-शिवसेना ने मुस्लिम आरक्षण से संबंधित प्रस्ताव को रद्द कर दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को भी रद्द कर दिया.

5. कर्नाटक में 4% आरक्षण देने के पक्ष में कांग्रेस

कर्नाटक में ओबीसी कैटेगरी के तहत कुछ मुस्लिम जातियों को 4 प्रतिशत आरक्षण मिलता था, जिसे बीजेपी की सरकार ने रद्द कर दिया था. कर्नाटक की कांग्रेस सरकार अब इसे फिर से लागू करने की तैयारी में है. अप्रैल 2024 में सिद्धारमैया की सरकार ने कुछ मुस्लिम जातियों को ओबीसी वर्ग में शामिल करने की कवायद की थी, जिसका विरोध हुआ था.

सिद्धारमैया फिर से मुसमलानों को 4 प्रतिशत आरक्षण देने के पक्ष में हैं. हाल ही में उन्होंने इसको लेकर कई संकेत भी दिए हैं. सरकार में शामिल डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार 2023 में मुसलमानों को 4 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा भी कर चुके हैं.

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