मुरादाबाद की राजनीति इन दिनों एक अजीब दौर से गुजर रही है।

Update: 2026-02-08 06:42 GMT

जो दिग्गज नेता कल तक लखनऊ के सत्ता गलियारों में एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे, जो सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे पर कटाक्ष करते थे और जिनकी आपसी रंजिशें जगजाहिर थीं—आज वे सब “एक ही घाट पर पानी पीते” नज़र आ रहे हैं।

सवाल यह है कि आखिर यह अचानक आई एकता किस मजबूरी की देन है?

हिम्मत का डर:

जब एक अकेली महिला सांसद का राजनीतिक कद और आत्मविश्वास इन सब पर भारी पड़ने लगा, तब इन तथाकथित सियासी सूरमाओं को अपनी ज़मीन खिसकती दिखाई देने लगी।

कमज़ोरी का खुला प्रदर्शन:

पूरी पार्टी के विधायक, पूर्व सांसद और दिग्गज चेहरे अगर एक महिला के खिलाफ एकजुट हो जाएँ, तो यह उनकी ताकत नहीं—उनकी डर और असहायता का प्रमाण है। वे अकेले उससे मुकाबला करने का साहस खो चुके हैं।

अस्तित्व की लड़ाई:

यह मेल-मिलाप किसी वैचारिक प्रेम का परिणाम नहीं, बल्कि हार के भय से उपजी मजबूरी है। कल तक जो एक-दूसरे के कट्टर विरोधी थे, आज इसलिए साथ खड़े हैं क्योंकि उन्हें एहसास है कि अगर यह महिला नेतृत्व और मजबूत हुआ, तो उनकी पुरानी राजनीति की दुकानें हमेशा के लिए बंद हो जाएँगी।

जनता सब देख रही है:

मुरादाबाद की अवाम समझदार है। वह जानती है कि जो नेता कल तक एक-दूसरे को गालियाँ दे रहे थे, वे आज किस स्वार्थ में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। यह बेमेल गठबंधन उनकी ताकत नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है।

साफ है

जब तूफान का डर बढ़ता है, तो तिनके अक्सर एक-दूसरे का सहारा ढूंढते हैं।

लेकिन मुरादाबाद की जनता अब भीड़ और शेरनी के बीच का फर्क पहचान चुकी है।

 फरीद मलिक, एडवोकेट

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