“मुंबई में कंक्रीट स्पिलेज अलर्ट: ट्रांजिट मिक्सर-डंपरों पर सख्ती की मांग, RTI कार्यकर्ता अनिल गलगली ने उठाए स्वास्थ्य और सफाई के सवाल”

Update: 2026-02-14 17:02 GMT

रिपोर्ट : विजय तिवारी

मुंबई महानगर में तेज़ी से चल रहे निर्माण कार्यों के बीच अब सड़कों पर गिरता सीमेंट घोल (Cement Slurry), उड़ती धूल और रेडीमिक्स कंक्रीट (RMC) ट्रकों की लापरवाही बड़ा शहरी संकट बनती जा रही है। शहर के कई प्रमुख मार्गों पर ट्रांजिट मिक्सर, टिपर डंपर और मिलर वाहनों से गिरता कंक्रीट मिश्रण न केवल ट्रैफिक सुरक्षा के लिए खतरा साबित हो रहा है, बल्कि वायु प्रदूषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल रहा है।

सड़कों पर फैल रहा कंक्रीट और धूल का जाल

स्थानीय नागरिकों के अनुसार, कई निर्माण कंपनियां नियमों की अनदेखी करते हुए बिना साफ-सफाई के ही ट्रकों को सड़कों पर उतार देती हैं। परिणामस्वरूप सड़कें धूलभरी हो जाती हैं और जगह-जगह कंक्रीट स्पिलेज दिखाई देता है। इससे दोपहिया चालकों के फिसलने की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है, जबकि पैदल यात्रियों को भी सांस लेने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने उठाई सख्त मांग

वरिष्ठ पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली ने इस मुद्दे को गंभीर बताते हुए संबंधित अधिकारियों—नगर निगम, ट्रैफिक विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और निर्माण निगरानी एजेंसियों—को तत्काल कार्रवाई के लिए सूचित करने की मांग की है। उनका कहना है कि नियम स्पष्ट हैं, फिर भी ट्रांजिट मिक्सर और धूलभरे डंपर बिना साफ किए शहर की सड़कों पर दौड़ रहे हैं, जिससे नागरिकों की सेहत खतरे में पड़ रही है।

उन्होंने सुझाव दिया कि निर्माण स्थल से बाहर निकलने वाले सभी वाहनों के लिए व्हील-वॉश सिस्टम, बॉडी क्लीनिंग और कवरिंग अनिवार्य की जाए, ताकि सड़क पर कंक्रीट या मलबा न गिरे।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनी

डॉक्टरों और पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि सीमेंट और कंक्रीट की महीन धूल में मौजूद सूक्ष्म कण (Particulate Matter) लंबे समय तक सांस के जरिए शरीर में जाते हैं तो आंखों में जलन, एलर्जी, खांसी, ब्रोंकाइटिस और अस्थमा जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों के लिए यह स्थिति और ज्यादा गंभीर हो सकती है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, Dust Pollution बढ़ने से शहर का Air Quality Index भी प्रभावित हो सकता है, जिससे भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव पड़ने की आशंका है।

जिम्मेदार विभागों पर उठे सवाल

स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई जगहों पर निगरानी तंत्र कमजोर नजर आता है। सड़क पर गिरता सीमेंट मिश्रण सूखकर धूल में बदल जाता है और वाहन गुजरते ही हवा में फैल जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या निर्माण एजेंसियां सुरक्षा मानकों का पालन कर रही हैं और क्या संबंधित अधिकारी नियमित निरीक्षण कर रहे हैं या नहीं।

क्या हो सकते हैं समाधान?

पर्यावरण और शहरी नियोजन से जुड़े जानकारों ने कुछ प्रमुख उपाय सुझाए हैं—

निर्माण वाहनों की नियमित धुलाई और बॉडी कवर अनिवार्य किया जाए।

सड़कों पर पानी का नियमित छिड़काव और सफाई अभियान चलाया जाए।

नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाए।

नागरिकों की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम मजबूत किया जाए।

विकास बनाम स्वास्थ्य – संतुलन जरूरी

नागरिकों का कहना है कि शहर में विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन साफ-सुथरी सड़कें और लोगों की सेहत उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में प्रदूषण और दुर्घटनाओं का खतरा और बढ़ सकता है।

आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली की ओर से उठाई गई यह आवाज़ अब प्रशासन के लिए एक चेतावनी मानी जा रही है कि निर्माण कार्यों के साथ-साथ सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों पर भी उतना ही ध्यान देना होगा, ताकि मुंबई की सड़कें विकास के साथ-साथ सुरक्षित और स्वच्छ भी रह सकें।

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