बीकानेर का ब्राह्मण पुष्करणा समाज अपनी समृद्ध वैदिक एवं लोक परम्पराओं के लिए देश-विदेश में विशिष्ट पहचान रखता है। विशेष रूप से यहाँ का सामूहिक विवाह आयोजन, जिसे स्नेहपूर्वक “पुष्करणा ओलम्पिक” कहा जाता है, भारतीय सामाजिक परम्पराओं में अपने आप में एक अनूठा उदाहरण रहा है। सावे के समय सम्पूर्ण परकोटे को एक परिवार मानकर विवाह एवं यज्ञोपवीत जैसे संस्कार प्रत्येक गली-मोहल्ले में सामूहिक उल्लास के साथ सम्पन्न होते थे।
परम्परागत रूप से सावे के दिनों में हर गली से यज्ञोपवीत धारण किए बटुकों की टोलियाँ निकलती थीं। घर-घर से गणेश, विवाह और शगुन के लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियाँ वातावरण को आध्यात्मिक बना देती थीं। गणेश परिक्रमा के दौरान “ओम ना सुसीसा”, “हर आयो हर आयो” जैसे गीतों की गूंज से पूरा नगर मानो सामवेद के गायन में लीन हो जाता था। बटुकों के हाथों में पाटी-घोटा, खड़ाऊँ और कमंडल वैदिक संस्कृति की जीवंत झलक प्रस्तुत करते थे।
दुर्भाग्यवश समय के साथ इन परम्पराओं में निरन्तर कमी देखने को मिल रही है। आज सामूहिक आयोजनों का सीमित भवनों एवं मंदिरों तक सिमट जाना, घरों में सम्पन्न होने वाले यज्ञोपवीत एवं विवाह संस्कारों का लोप होना तथा पारम्परिक मांगलिक गीतों के स्थान पर डीजे और फिल्मी संगीत का प्रचलन समाज के लिए चिंताजनक संकेत है।
यह विशेष रूप से विचारणीय है कि जिस समाज का सावा स्वयं शिव-पार्वती के नाम पर निर्धारित होता है और जिसके सभी संस्कार वैदिक मंत्रोच्चार से सम्पन्न होते हैं, उसी समाज द्वारा वैदिक एवं लोक परम्पराओं से विमुख होना हमारी सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करता है।
पुष्करणा समाज का सामूहिक विवाह मूलतः आर्थिक बोझ को कम करने, सामाजिक समरसता बनाए रखने और पारिवारिक आत्मीयता को सुदृढ़ करने का माध्यम रहा है। “एक धामें, एक जान—जीमें सभी” की भावना इस परम्परा का मूल आधार रही है, जिसने बीकानेर के पुष्करणा समाज को विश्व-स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाई।
आज आवश्यकता है कि समाज पुनः अपनी पारम्परिक सावे की संस्कृति की ओर लौटे, यज्ञोपवीत एवं विवाह संस्कार अपने-अपने घरों में सम्पन्न करे तथा लोक एवं वैदिक परम्पराओं को सहेजते हुए आने वाली पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़े।
— पण्डित अशोक कुमार ओझा
ज्योतिषाचार्य
चौथाणी ओझाओं का चौक, बीकानेर