कोई आज तक ईमानदारी से नहीं बता पाया कि जाति कब बनी, किसने बनाई और किस हक़ से इंसान को इंसान से छोटा किया गया। फिर भी बड़े आराम से एक नाम उछाल दिया जाता है—पंडित। यह आरोप जितना लोकप्रिय है, उतना ही बौद्धिक रूप से कायर और ऐतिहासिक रूप से अधूरा है।
अगर जाति सच में किसी एक पंडित, किसी एक ग्रंथ या किसी एक वर्ग की देन होती, तो कब की खत्म हो चुकी होती। सच्चाई यह है कि जाति इसलिए ज़िंदा है क्योंकि समाज ने उसे अपने स्वार्थ, सुविधा और सत्ता के लिए रोज़ ज़िंदा रखा।
वर्ण था, जाति नहीं-यह फर्क समझना होगा
प्राचीन भारतीय दर्शन में वर्ण व्यवस्था थी-एक सैद्धांतिक ढांचा, जो कर्म और गुण की बात करता था। लेकिन आज जिस जन्म-आधारित, सीमेंट से ढली हुई जाति-प्रणाली को हम झेल रहे हैं, उसका खाका किसी भी प्राचीन ग्रंथ में साफ़-साफ़ नहीं मिलता।
मनुस्मृति वर्ण की बात करती है, हज़ारों जातियों की नहीं। अगर जाति वहीं लिख दी गई होती, तो समाज को इसे गढ़ने में सदियाँ क्यों लगतीं?
इतिहास गवाह है-जाति किसी एक दिन पैदा नहीं हुई
इतिहास और परंपरा के उदाहरण साफ़ चीख-चीख कर बताते हैं कि सामाजिक ऊँच-नीच बहुत पुरानी है:
संत रविदास तुलसीदास से पहले हुए-मतलब जाति पहचान पहले से मौजूद थी।
तुलसीदास के नाम का ‘दुबे’ यह साबित करता है कि जाति नामों से चिपक चुकी थी।
मंडन मिश्र, कुमारिल भट्ट-ये नाम ईसा मसीह से सदियों पहले के हैं। अगर जाति नहीं थी, तो ये पहचानें क्या थीं?
त्रेतायुग में निषादराज का भगवान राम के बराबर बैठने से इंकार करना श्रद्धा नहीं, सामाजिक दूरी की स्वीकृति है।
सतयुग में क्षत्रिय राजा हरिश्चंद्र का डोम के हाथ बिकना यह बताने के लिए काफी है कि जाति कोई आधुनिक साज़िश नहीं।
तो सवाल यह नहीं कि जाति थी या नहीं-सवाल यह है कि इसे पवित्र क्यों मान लिया गया?
असली पाप: काम को नहीं, आदमी को अपवित्र किया गया
जिन कामों को सदियों तक ‘नीच’ कहा गया, आज वही काम खुले बाज़ार में बिना किसी धार्मिक पाप के हो रहे हैं:
सफ़ाई का काम
नाई, लोहार, बढ़ई का काम
मांस, सब्ज़ी, ठेले-खोमचे
आज ये सब काम मुसलमान, ईसाई और दूसरे समुदाय कर रहे हैं। न कोई उन्हें अछूत कहता है, न मंदिर के बाहर रोकता है। उन्हें सिर्फ़ काम चाहिए, कमाई चाहिए।
तो गंदगी काम में नहीं थी-गंदगी उस सोच में थी जिसने काम करने वाले आदमी को गंदा कहा।
आज जाति कहाँ ज़िंदा है?-जहाँ सबसे ज़्यादा गंदगी है
आज सड़क पर गोलगप्पे कौन बना रहा है, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता। पंडित भी मज़े से खाते हैं, बिना जाति पूछे। लेकिन वही पंडित:
शादी में जाति पूछता है
राजनीति में जाति गिनता है
गाली देते वक़्त जाति उछालता है
और सरकारी फ़ॉर्म में उसे अमर बना देता है
मतलब साफ़ है-जाति पेट में नहीं, दिमाग़ में ज़िंदा है।
जाति किसने बनाई?-सच सुनने की हिम्मत चाहिए
जाति किसी एक पंडित ने नहीं बनाई।
इसे समाज ने गढ़ा, सत्ता ने पाला, धर्म के नाम पर正 ठहराया, और अंग्रेज़ों ने काग़ज़ों में पत्थर की लकीर बना दिया।
जब तक दोष किसी एक पर डालते रहेंगे, जाति आराम से बची रहेगी।
"जाति छोड़ दो"-यह उपदेश नहीं, पाखंड है
जाति छोड़ी नहीं जाती, छोड़ी जाती तो कब की खत्म हो चुकी होती। समाज छोड़ने नहीं देता, सरकार पूछना नहीं छोड़ती, और राजनीति इसे मरने नहीं देती।
इसलिए समाधान भावुक नारों में नहीं है। समाधान है:
काम को छोटा मानना बंद करने में
इंसान को उसकी पैदाइश से नहीं, उसके आचरण से आँकने में
और जाति को गौरव नहीं, ऐतिहासिक अपराध मानने में
जाति पंडित ने नहीं बनाई। जाति हमने बनाई है-और जब तक यह सच नहीं मानेंगे, यह खत्म नहीं होगी।