राजनैतिक व्यंग्य-समागम

Update: 2026-01-07 08:13 GMT


1. रीढ़ की हड्डी : विष्णु नागर

जिसकी देखो, उसकी आजकल रीढ़ की हड्डी गुम है। मुख्यमंत्रियों की गुम है, मंत्रियों की गुम है। अफसरों की गुम है, जजों की गुम है, संपादकों और एंकरों की गुम है। पुलिस, सीबीआई, ईडी के प्रमुखों की गुम है। और तो और, प्रधानमंत्री की गुम है। उनकी जुबान जहां खुलनी चाहिए, वहां बंद है और जहां बंद रहनी चाहिए, वहां खुली रहती है। उनके अपने ही निवास में सुनते हैं कि बहुत बड़ा खेला हो गया है, मगर उनकी और उनके गोदी मीडिया की जुबान बंद है। सब तरफ खुसफुसाहट है, मगर किसी के गले में आवाज़ नहीं। न कहीं खंडन है, न मंडन‌, क्योंकि रीढ़ की हड्डी गुम है। देश के गुंडों के आगे गुम है, विदेशों के गुंडों के सामने गुम है। अडानी के आगे गुम है, अंबानी के आगे गुम है। बताया था एक बार प्रधानमंत्री ने कि उनकी छाती छप्पन इंची है, मगर जब रीढ़ की हड्डी गुम है, तो‌ छाती कितनी भी इंची हो, न होने जैसी है। गली-गली में धर्म के नाम पर गुंडे नंगा नाच, नाच रहे हैं, मगर उनके आगे बड़े-बड़े सत्ताधारियों की फूंक निकली हुई है। वे जिस राह चलते की चाहें तो गर्दन पकड़ लें, मरोड़ दें, उसे घुसपैठिया बता दें या गाय का मांस खाने वाला या धर्म परिवर्तन करवाने वाला बता दें, चलेगी उनकी ही, पीड़ित की नहीं, क्योंकि उनके आगे बड़ों-बड़ों की रीढ़ की हड्डी गुम है।

रीढ़ की हड्डी गुम है, मगर किसी को इसकी चिंता नहीं है।जिनकी गुम है, वे खुश हैं कि गुम है। उन पर तन कर सीधे खड़े होने की जिम्मेदारी नहीं है। किसी ने आज तक इसकी एफआईआर तक दर्ज करवाना जरूरी नहीं समझा है, क्योंकि गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखवाने के लिए भी रीढ़ की हड्डी चाहिए! यह अपनी तरह का विचित्र और विकट संकट है और इतना बड़ा संकट है कि दस में से नौ खाते-पीते लोग इससे पीड़ित हैं। पीड़ित हैं और सुखी हैं।

इस माहौल में एनडीटीवी के पत्रकार अनुराग द्वारी ने मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के सामने अपनी रीढ़ की हड्डी दिखा दी। मंत्री ने अपशब्द बोला, तो उस पत्रकार ने कहा कि आप अपना शब्द चयन ठीक कीजिए। बात करने की तमीज मत भूलिए। आजकल गली-मोहल्ले के छोकरों से इस हिम्मत से बात करने का कोई खतरा नहीं उठाता, क्योंकि क्या पता वह बजरंगी हो, किसी हिंदू सेना का सेनापति हो, जबकि इस पत्रकार ने एक वरिष्ठ मंत्री को उसके अपने शहर में तमीज का पाठ पढ़ा दिया! सब चकित रह गए कि यह क्या हो गया! कैसे एक गोदी मीडिया के पत्रकार की रीढ़ की हड्डी बची हुई है! बचा कैसे ली इसने? भोपाल से दिल्ली तक चिंता की लहर दौड़ गई है! आजकल तो बड़े से बड़े अंग्रेजी के तीस मार खां पत्रकारों की हालत टाइट है। दो शब्द बोलने या लिखने से पहले पांच मिनट तक सोचते हैं। फिर आगे बढ़ते हैं या पीछे हटते हैं। आगे बढ़कर पीछे हटते हैं!

प्रणव रॉय के जमाने का एनडीटीवी होता, तो बात और थी। माना जा सकता था कि यह पत्रकार अपनी नहीं, उनकी बची-खुची, क्षत-विक्षत रीढ़ की हड्डी के दम पर बोल रहा है, मगर अब तो यह समाचार चैनल मोदी जी के भ्रातासम गौतम अडानी का है। फिर भी उसके एक कर्मचारी की रीढ़ की हड्डी बच गई, यह प्रधानमंत्री तथा अडानी के लिए यानी देश के लिए चिंता की बात है! देश को असली 'खतरा' चीन या पाकिस्तान से नहीं, रीढ़ की हड्डी वाले चंद इधर -उधर बचे भारतीयों से है!

जिसने भी वह विडियो देखा, वह ढूंढ रहा है कि क्या उसकी अपनी रीढ़ की हड्डी अभी भी बची हुई है? कुछ ने पाया कि बची हुई है, इसलिए खुश हैं, तो कुछ हैरान और परेशान हैं कि पता नहीं कब यह कौन-से संकट का कारण बन जाए! वे अपनी इस दुश्मन हड्डी से डरे हुए हैं।

(कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं। जनवादी लेखक संघ के उपाध्यक्ष है।)

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2. कुछ न कहो, ख़ामोश रहो/ लब सी लो, ख़ामोश रहो! : राजेंद्र शर्मा

भई ये तो इंसाफ की बात नहीं है। वेनेजुएला पर हमले का शोर मचाने वालों की बात अगर सच भी मान ली जाए और अमेरिका ने मारा, अमेरिका ने मारा का हल्ला मचाने वालों की बात पर आंख मूंदकर विश्वास भी कर लिया जाए, तब भी मोदी जी इसमें कहां से आ गए?

हमला हुआ, दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर वेनेजुएला में। हमला किया, दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर से अमेरिका ने। हमला करने वाले वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को, सोते में से उठाकर ले गए। वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उठाकर ले जाया गया अमेरिका में। अमेरिका कह रहा है कि वह वेनेजुएला को तब तक खुद ही चलाएगा, जब तक उसके हिसाब से सब ठीक-ठाक नहीं हो जाता है। उसके तेल, सोने और दूसरी संपदा पर अमेरिकी कंपनियों का कब्जा नहीं हो जाता है। उसके बाद वह कुछ सोचेगा कि उसका क्या करना है? पर यहां भाई लोग मोदी जी के पीछे पड़े हुए हैं कि मोदी जी चुप क्यों हैं? मोदी जी कुछ कहते क्यों नहीं हैं? बुरा हुआ कहें। ना हो तो अच्छा हुआ ही कहें। पर कुछ तो कहेें। एकदम चुप तो ना रहें। इतनी बड़ी घटना और इतना-इतना बोलने वाले मोदी जी एकदम चुप। ये तो विश्व गुरु के चलन नहीं हैं!

तो क्या इन शोर मचाने वालों के विश्व गुरु की प्रजा वाले चलन हैं? पहले शोर था कि भारत ने कुछ बोला क्यों नहीं? घंटे गिने जा रहे थे, बोला क्यों नहीं? दो घंटे हो गए, चार घंटे हो गए, आठ घंटे हो गए, बारह घंटे हो गए ; कुछ बोला क्यों नहीं? और जब दूसरे दिन विदेश मंत्रालय ने बोला भी, तो भाई लोग कहने लगे कि ये क्या बोला? विश्व गुरु के विदेश मंत्रालय ने हाल की घटनाओं पर चिंता भी जता दी। वेनेजुएला की जनता की सुरक्षा और कल्याण में दिलचस्पी भी दिखा दी। वहां फंसे भारतीयों को जरूरत पड़ने पर मदद का भरोसा भी दिला दिया और उन्हें झगड़ों से बचकर रहने की सलाह भी दे दी। और तो और, दोनों पक्षों से शांति से संवाद के जरिए, सारे मुद्दे निपटाने और इलाके में शांति तथा स्थिरता कायम रखने की अपील भी कर दी। फिर भी भाई लोग कह रहे हैं कि बोला भी, तो क्या बोला? उसके ऊपर से एक नयी डिमांड और – मोदी जी चुप क्यों हैं ; कुछ कहते क्यों नहीं हैं? क्या यही विश्व गुरु के चलन हैं!

विश्व गुरु के चलन के संबंध में दुनिया में बहुत ज्यादा कन्फ्यूजन है। सच पूछिए, तो इसी वजह से विश्व गुरु का ठीक से फैसला हो ही नहीं पा रहा है। यानी वैसे तो मोदी जी का अमृतकाल वाला भारत कब का विश्व गुरु बन चुका था, पर बाकायदा फैसला नहीं पाया, तो नहीं ही हो पाया। जैसे अमेरिका, विश्व दादा है। किसी से भी पूछ लीजिए, सब कहेंगे कि अमेरिका ही विश्व दादा है। कहीं भी फौज भेज देता है। कहीं भी तख्ता पलट करा देता है। किसी को भी धमका देता है। किसी पर भी पाबंदी लगा देता है। और तो और, संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्थाओं पर भी पाबंदी लगा देता है। और दुनिया भर पर टैरिफ लगाता फिरता है, सो अलग।

ऐसे ही इस्राइल, विश्व दादा का विश्व पट्ठा है। ऐसे ही यूरोप, विश्व पाखंड गुरु है। ये सब तो क्लीअर हैं, पर विश्व गुरु के मामले में ग्यारह साल बाद भी साफ-साफ फैसला नहीं हो पाया है। और हो भी तो कैसे? कभी लोग कहते हैं कि विश्व गुरु को दुनिया को नैतिक राह दिखानी चाहिए। और कभी कहते हैं कि विश्व गुरु को सबको खुश करने की कला आनी चाहिए। और कभी कहते हैं कि विश्व गुरु के पास आपदा को अवसर में बदलने की महारत होनी चाहिए।

खैर! विश्व गुरु और नो गुरु, मोदी जी को बखूबी पता है कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं करना है? और कब नहीं बोलना है, यह तो मोदी जी से बेहतर तरीके से कोई जान ही नहीं सकता है। जिस पर नहीं बोलना होता है, उस पर नहीं बोलने में तो मोदी जी बार-बार मौन मोहन कहलाने वाले अपने से पहले वाले प्रधानमंत्री को भी पछाड़ते आए हैं। अभी पिछले साल के आखिर में देखा नहीं मोदी जी के मौन का कमाल। क्रिसमस पर देश भर में जगह-जगह चर्चों पर, क्रिसमस की सजावटों पर, क्रिसमस मनाने वालों पर हमले होते रहे। पर मजाल है जो मोदी जी के मुंह से एक शब्द भी निकला हो। उसके बाद से बांग्लादेशी कहकर जगह-जगह बांग्ला बोलने वालों पर हमले हुए हैं, पर मोदी जी ने एक बार उफ तक नहीं की है। मुसलमानों पर तो खैर अब हर सीजन में ही हमले होते ही रहते हैं और मोदी जी हमेशा मौन साधे ही रहते हैं।

और क्या किसी ने सेंगर के मामले में मोदी जी के मुंह से एक शब्द भी सुना है? या अंकिता भंडारी के मामले में? या इंदौर में पानी में जहर पीकर हुई मौतों के मामले में? या गांधीनगर में ही पानी में जहर पीकर अस्पताल पहुंचे लोगों के बारे में?

और रही बात ट्रंप की, तो ट्रंप-2 के मामले में तो मोदी जी की जनरल पॉलिसी ही है -- मैं चुप रहूंगा। ट्रंप-1 के टैम में बात दूसरी थी। तब मोदी जी खूब बोलते। तब मोदी जी बोलते थे, ट्रंप सुनता था – डीयर फ्रेंड से लेकर, अबकी बार ट्रंप सरकार तक! पर ट्रंप-2 में हालात बदल गए, जज्बात बदल गए! अब ट्रंप कुछ भी कहे, कुछ भी करे, मोदी जी चुप रहते हैं। ट्रंप ने टैरिफ के वार पर वार किए, मोदी जी चुप। ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान की लड़ाई रुकवाने का दावा किया, बार-बार दावा किया, मोदी जी बार-बार चुप। फिर ट्रंप के वेनेजुएला पर हमला करने पर ही मोदी जी से मुंह खोलने की मांग क्यों की जा रही है?

वैसे दिल से तो मोदी जी भी मादुरो के साथ होंगे, पर ट्रंप के मुंह नहीं लगने में ही भलाई है। नाराज होकर, बीच-पच्चीस फीसद टैरिफ और ठोक दिया तो? और जो कहीं ठेके के लिए रिश्वत वाले केस में राष्ट्र सेठ को उठवाकर, न्यूयार्क ले गया तो? या कहीं 2002 वाले केस में...! वेनेजुएला का साथ देने से क्या मिल जाएगा, पर ट्रंप को नाराज करने से बहुत कुछ जा सकता है। विश्व गुरु का ढोल पूरा फट भी सकता है। व्यापार खून में है, मोदी जी ऐसा घाटे का सौदा हर्गिज नहीं करेंगे। अब ट्रंप कुछ भी करे, विश्व गुरु जी खामोश ही रहेंगे!

(व्यंग्यकार वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं।)

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