(आलेख : बादल सरोज)
एक मित्र हुआ करते थे, जो संघी थे, लेकिन बुद्धिहीन भक्त नहीं थे। एक तो वर्किंग क्लास से थे, दूसरे पढ़ते-लिखते भी थे। संघ की भुजा भाजपा में काफी बड़े पद पर रहे और एक बार लिखा-पढ़ी में साफगोई दिखाने की जुर्रत कर दी, तो ‘जो कभी नहीं भूलता, जो कभी माफ़ नहीं करता’ के गुण वाले ब्रह्मा की नजर ऐसी टेढ़ी हुई कि बाद में हाशिये पर भी धकेल दिए गए। हाल ही में स्मृति शेष हुए इस मित्र ने पहले और आज के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंतर के बारे में बतियाते हुए एक मार्के की बात बोली थी। उन्होंने कहा कि एक फर्क तो यही है कि पहले सरसंघचालक साल भर में बस एक बार, दशहरे के दिन, बोला करते थे। आजकल महीने में दस दिन से कम नहीं बोलते। इसमें कोई शुबहा नहीं कि कम बोलने के कुछ फायदे हैं, तो ज्यादा बोलने के ज्यादा नुकसान भी हैं। खासकर तब, जब ‘साफ़ छुपना भी न हो, सामने आना भी न हो’ की स्थिति हो, तब तो जोखिम और भी अधिक हो जाते हैं। मौजूदा सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के साथ इन दिनों ऐसा ही हो रहा है। वे जिस तरफ ढील देने की कोशिश करते हैं, उधर बात खिंच जाती है, जिसे समेटना चाहते हैं, वह खुलकर इत्ती फैल जाती है कि ‘बंद मुट्ठी थी खरा कलदार था, ऐसे बिखरे पैसे पैसे हो गए’ की गति को प्राप्त हो जाती है। इन दिनों शताब्दी वर्ष चल रहा है और शायद यह फैसला भी हुआ है कि वे स्वयं बगिया-बगिया घूमेंगे और बसंत बरपाएंगे भी, बगरायेंगे भी।
नई साल के दूसरे दिन 2 जनवरी को भोपाल में ‘सौ का संघ’ की श्रृंखला में उन्होंने प्रस्थापना दी कि संघ को भाजपा या विश्व हिंदू परिषद के नजरिए से देखना एक बहुत बड़ी भूल है, क्योंकि ये सभी संगठन पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करते हैं और संघ किसी को भी रिमोट कंट्रोल से नहीं चलाता है। संघ का प्राथमिक उद्देश्य समाज की सेवा करना है, न कि राजनीति की दिशा तय करना। अपने हिसाब से बात को और साफ़ करते हुए उन्होंने कहा कि संघ का मूल उद्देश्य राजनीति में हस्तक्षेप करना या सत्ता और टिकटों का वितरण करना नहीं है। संघ का एकमात्र लक्ष्य समाज की गुणवत्ता में सुधार करना और प्रत्येक नागरिक का चरित्र निर्माण करना है। उन्होंने संघ को एक अर्धसैनिक संगठन - पैरा मिलिट्री फोर्स - के रूप में देखे जाने को गलत बताया। वे बोले कि संघ में स्वयंसेवकों का वर्दी पहनना, मार्च निकालना और लाठी का अभ्यास करना केवल अनुशासन और शारीरिक प्रशिक्षण का एक हिस्सा है और इसे किसी सैन्य संगठन की तरह समझना एक बड़ी गलतफहमी है। संघ केवल व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है, जो आगे चलकर राष्ट्र की सेवा करते हैं।
सरसंघचालक ने हिंदू पहचान को भारत की सबसे बड़ी शक्ति और एकता का आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल देश में विभिन्न मत, पंथ, संप्रदाय, भाषाएं और जातियां हो सकती हैं, लेकिन हिंदू पहचान हम सभी को एक अटूट सूत्र में पिरोती है। अब ये हिन्दू कौन है? इस दुविधा को वे स्वयं इसी श्रृंखला में 19 नवंबर 25 को गुवाहाटी में दिये गए प्रबोधन में बता चुके थे। यहाँ उन्होंने एक बार फिर कहा था कि भारत में रहने वाला हर शख्स हिंदू है। उसका धर्म या जेंडर कुछ भी हो, लेकिन वह मूल रूप से हिंदू ही है। उन्होंने कहा कि ‘हिंदू’ कोई सीमित धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि हजारों साल पुरानी संस्कृति और सभ्यता की पहचान है, जो हम सबको सबको जोड़ती है। इसे और सरल बनाने के लहजे में उन्होंने कहा कि ‘अगर मुसलमान और ईसाई भी अपनी पूजा-पद्धति और परंपराएं बनाए रखते हुए इस देश का सम्मान करते हैं, भारतीय संस्कृति का पालन करते हैं और भारतीय पूर्वजों पर गर्व करते हैं, तो वे भी हिंदू माने जाएंगे। असली पहचान धार्मिक प्रथाओं से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निष्ठा से बनती है।‘ उनके इस सार्वजनिक कथन की थोड़ी और गहराई से खुदाई करें तो और भी दिलचस्प विस्तार मिलता है। इस बार छपे हुए में नहीं, बाकायदा लाइव वीडियो में वे स्वयं मराठी उच्चारणयुक्त हिदी में बताते दिखते हैं कि भारत (वे हिन्दुस्थान का शब्द वापरते हैं) में रहने वाले सभी हिन्दू हैं। कोई नौ वर्ष पहले दिल्ली के विज्ञान भवन में दिए अपने संबोधन में वे स्थापना देते हैं कि "बिना अपनी पूजा पद्वत्ति, खानपान, श्रद्धा को बदले वे हिन्दू हैं। सब हमारे भाई हैं।“ इसी रौ में उन्होंने बोला कि ‘जो भी विविधताएं हैं, वे कुटुंब की विविधताएं हैं – और ये विविधताएं सिर्फ सहन करने लायक ही नहीं हैं, बल्कि हमको (मतलब संघ को) स्वीकार हैं, मान्य हैं।‘
अब हाथ कंगन को आरसी क्या? उनके कहे की सचाई को उन्ही की कसौटी पर जांच लेते हैं। भोपाल में संघ सुप्रीमो संघ के बारे में एक गलत नैरेटिव बनाए जाने से दुखी थे। उनका कहना था कि लोग मूल स्रोतों तक जाने के बजाय अधूरी या गलत जानकारियों पर भरोसा कर लेते हैं, जिससे भ्रम फैलता है। उन्होंने बताया कि संघ के बारे में सही जानकारी उन्हीं को मिलेगी, जो प्रामाणिक स्रोतों से उसे समझने का प्रयास करेंगे। जिन मूल स्रोतों की वे बात कर रहे हैं, उनके शिरोमणि विचारकों के अब तक माने जाने वाले सिद्धांतों की विवेचना और इस बार सौ वर्ष के संघ के पूरे सौ बरस के अपरिवर्तित चाल, चरित्र और चेहरे की मीमांसा अनेकानेक बार करते ही रहे हैं – और सच्ची बात तो यह है कि इन मूल स्रोतों में से कोई भी उनकी बात की ताईद करने वाला नहीं है। इसलिए इनमें जाने की बजाय और हाल के कुछ ‘कामों’ पर ही नजर डाल लेते हैं।
यदि सचमुच में ‘बिना अपनी पूजा पद्वत्ति, खानपान, श्रद्धा को बदले वे हिन्दू हैं। सब हमारे भाई हैं ।“, तो अकेले 2025 में हुई भीड़ हत्याओं के 14 मामलों में अखलाकों और जुनैदों के जो 8 भाई मार दिए गए, वे किसके भाई थे? पालघाट में बांग्लादेशी बताकर जिस प्रवासी मजदूर रामनारायण को पीट-पीट कर मार डाला गया, वह किसका भाई था? बुलंदशहर का पुलिस अधिकारी सुबोध कुमार सिंह तो गोपन और ओपन दोनों ही हिसाब से पक्का भाई था – उसके साथ जो हुआ, वह करने वाले किसके भाई थे? देहरादून की अंकिता भंडारी, कुलदीप सेंगर, चिन्मयानंद, आसाराम, गुरमीत राम रहीम के द्वारा बलात्कार और कुछ मामलों में हत्या की जघन्यता की शिकार बनी युवतियां-साध्वियां हिन्दुस्थान में रहने वाली हिन्दू थीं या उनके साथ जबर जिनाह करके भी मूंछ मरोड़ते हुए कभी जमानत और कभी पैरोल पर मालाएं पहनने वाले भर ही भाई हैं? कुलबुर्गी, दाभोलकर, पान्सारे और गौरी लंकेश तो जन्मना उस कोटि में आते थे, जिनकी सर्वोच्च श्रेष्ठता का बखान उस किताब में किया गया है, जिसके आधार पर संघ के संस्थापक और प्रेरणा स्रोत हिन्दुस्थान में राज काज और समाज को पहुंचाना और चलाना चाहते थे/हैं।
अगर बिना अपनी पूजा पद्वत्ति और श्रद्धा को बदले बिना ही वे भाई हैं, तो अलग-अलग पूजा स्थलों पर हुड़दंग, उनके पर्वों उत्सवों के समय तोड़फोड़, उन पर झंडे फहराने के काम कौन करता है? चुनावी सभाओं में श्मशान–कब्रिस्तान का, भागवत जी जिनको भाई बता रहे हैं, उनकी एकता को खंड-खंड करने वाला अखंड जाप जो करते हैं, वे किस के भाई हैं? यदि वाकई में सारी विविधताएं ‘कुटुंब की विविधताएं हैं – और ये विविधताएं सिर्फ सहन करने लायक ही नहीं हैं, बल्कि हमको (मतलब संघ को) स्वीकार हैं, मान्य हैं', तो फिर ‘छोटी आँख’ का जुमला कसकर ऐसे हालात कौन पैदा करता है, जिसके चलते पूरे पूर्वोत्तर भारत के भारतवासी – भागवत जी के शब्दों में हिंदुस्थानी – अपनी नस्लीय विविधता के चलते दिल्ली समेत उत्तर भारत में चिंकी, चीनी कहकर निशाना बनाये जाते हैं : जिसकी परिणिति त्रिपुरा के भारतीय, होनहार विद्यार्थी एंजेल चकमा को देहरादून में जान से मार डालने में होती है?
कुछ इससे दुखी होकर तो कुछ पूर्वोत्तर के पहले से ही संवेदनशील प्रदेशों में उठी गुस्से की लहर को शांत करने के लिए मोदी सरकार में ऊपर वाले दो के बाद सबसे अधिक बोलने वाले मंत्री किरण रिरिजू तक को कहना पड़ता है कि “हम (उत्तर-पूर्व के भारतीय) देश में नस्लवाद का निशाना रहे हैं।‘’ उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में नस्लवाद और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है। किसी भी जाति, नस्ल या धर्म के लोगों का मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए। केवल पूर्वोत्तर के लोग ही नहीं, बल्कि सभी को इस तरह की घटनाओं से दुखी होना चाहिए, क्योंकि यह किसी के साथ भी हो सकता है। इसे वे एक 'वैचारिक बीमारी' बताते हैं और कहते हैं कि इस तरह की मानसिकता केवल कुछ लोगों में होती है और इसके खिलाफ जागरूकता जरूरी है।‘’
रिरिजू भूल गए कि उनके प्रधानमंत्री की आँखें कितनी तेज हैं, जो सिर्फ छोटी आँखों तक ही नहीं देखती, वे तो कपड़े देखकर भी दूर से ही पहचान लेती हैं। बहरहाल, बकौल रिरिजू, इस तरह की बीमार मानसिकता के शिकार ये केवल कुछ लोग कौन हैं, यह बात उन्होंने इधर, प्रेस के सामने, नहीं बताई, मगर उधर जाकर कान में तो बता ही सकते हैं।
यहाँ जाति की पहचान का उल्लेख नहीं कर रहे, क्योंकि अब तक सिर्फ अंधभक्तों को छोड़कर बाकी ज्यादातर भारतीय जान चुके हैं कि भाई-भाई की बात कहने वालों के लिए दलित, आदिवासी और इन दिनों ओबीसी बताये जाने वाले शूद्रों की हैसियत कैसे भाई की है। यह कुनबा भाषाई वैविध्य के मामले में कितनी ‘उच्च वैचारिक बीमारी’ से ग्रस्त है, यह बाकी भाषाओं के बारे में उनसे अकेले में बात करके समझा जा सकता है। और यह रोग सिर्फ नीचे तक महदूद नहीं है। इन पंक्तियों के लेखक को 1975-77 की इमरजेंसी के दौरान आरएसएस के दिग्गजों के साथ एक जेल की एक ही बैरक में 19 महीने गुजारने का अनुभव है। इनके एक बड़े वाले जो दो-दो जिलों के संगठक भी थे और बौद्धिक देने लायक बौद्धिक भी माने जाते थे, उनके मुखारबिंद से भारतीय भाषाओं का चुन-चुनकर किया जा रहा संधि-विच्छेद सुना था। वे छोड़ संस्कृत, अंग्रेजी और हिदी बाकी भारतीय भाषाओं की व्युत्पत्ति बता रहे थे। उनकी शोध के कुछ नमूने देखें : बंगाली = बन गाली। मलयालम = मल का विकल्प मल। तेलुगू = तेल + (बाकी आप समझ गए होंगे)। कन्नड़ = लोटे में भरे कंकड़। तमिल = तेल + मल। पंजाबी = पंजा हावी!! उड़िया = उड़ जा। मैथिली = मैली थाली। और भी बहुत कुछ। अलबत्ता इतनी सावधानी उन्होंने जरूर बरती कि मराठी के बारे में कुछ नहीं बोला। इसी तर्ज पर अगले दिन उनका "बौध्दिक" पहनावे को लेकर था। उसके अगले दिन खानपान के तरीके और व्यंजन विमर्श में थे।
अपनी भाषा, अपने खानपान, अपने परिधान , अपने साहित्य, अपनी जीवन शैली, कुल मिलाकर अपनी संस्कृति पर फख्र करना एक बात है - मगर इसके लिए बाकी मनुष्यता को नकारना, उनकी भाषा, उनके खानपान, उनके परिधान, उनके साहित्य, उनकी जीवन शैली, कुल मिलाकर उनकी संस्कृति को निकृष्टतम बताना, उसका अपमान करना -- मखौल बनाना एक खास किस्म की हीनग्रंथि है। इस तरह की मनोरोगिता एक विशिष्ट किस्म का विकृत मानस तैयार करती है। मनुष्य को असामाजिक प्राणी बनाती है। ऐसा संकीर्ण व्यक्तित्व ढालती है, जो घटते-घटते न दुनिया का बचता है, न देश का, न समाज का, ना ही स्वयं के परिवार का। वह एकदम खुद पर आकर टिक जाता है। और ऐसा टिकना भी कोई टिकना है भला !! भोपाल में भागवत जो बोल रहे थे, उसका हिन्दू होने के संघ के अब तक के ‘एक भूगोल, एक नस्ल, एक धर्म, एक भाषा, एक संस्कृति’ वाले आधार के साथ कोई संबंध नहीं है। ये सिर्फ दिखाने के दांत हैं।
उन्होंने दावा किया कि संघ केवल व्यक्ति निर्माण का कार्य करता है, जो आगे चलकर राष्ट्र की सेवा करते हैं। ऐसे स्वयंसेवक तैयार करता है ..... कैसे स्वयंसेवक? अब तो खुलासे इतने बढ़ गए हैं कि सिर्फ सोशल मीडिया ही नहीं भरा पड़ा, पोषित-पालित मीडिया को भी इन कारनामों को छापना और दिखाना पड़ रहा है। भ्रष्टाचार हो या कदाचरण, यौन दुराचरण हो या देश और उसकी सुरक्षा से जुड़े हितों के साथ गद्दारी और जासूसी करते पकड़े जाने वालों की फेहरिश्त हो, लिप्त पाए गए लोगों की राजनीतिक-सांगठनिक संबद्धता इस दावे की कलई खोल देती है। पहले स्वयंसेवक प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के किसी अन्य सन्दर्भ में बोले गए शब्द-युग्म में कहें तो ‘कुनबे का हर संगी अपराधी नहीं है, मगर इसरो से आईएसआई से लेकर बाकी अपराधों में जितने पकड़े गए, उनमें ज्यादातर कुनबे के हैं।‘
शुचिता, समर्पण, सादगी आदि इत्यादि की बात तो अब दिखाने को भी नहीं बची। शुरुआत में एक पत्रकार मित्र का जिक्र किया था। यहाँ भी इस कुनबे के साथ रहे एक नामी पत्रकार के एक अनुभव का उल्लेख सामयिक होगा। वे अटल सरकार में मंत्री भी थे। एक बार वे झंडेवालान के संघ कार्यालय का भ्रमण करने गये और लौटकर अटल जी से सादगी, सरलता की प्रशंसा करने लगे। वाजपेयी ने सिर्फ एक टिप्पणी से उन्हें चुप कर दिया। उन्होंने कहा कि अभी इन्होने सत्ता सुख नहीं देखा है। जब ये सत्ता सुख देख लेंगे, तब क्या-क्या करेंगे, यह आज सोचना भी मुश्किल है। सत्ता सुख वाले स्वयंसेवकों ने अपने आचरण से खुद वाजपेयी जी ने भी जो नहीं सोचा होगा, उससे भी आगे का कर दिखाया है। और, अभी तो बस शुरुआत ही हुई है।
ऐसा नहीं कि संघ सुप्रीमो यह सब नहीं जानते। वे जानते हैं और अपना मजबूत जाल बिछाने के बाद भी वे उसकी कमजोर बुनावट के बारे में जानते हैं। विज्ञान भवन, गुवाहाटी और अब भोपाल में इस तरह के बोलवचन करके वे भाजपा और विश्व हिन्दू परिषद् वगैरा से अपनी अलहदगी जताना और समावेशी दिखने की कोशिश कुल्हाड़ी से किये छेदों की तलवार से तुरपाई करने की चतुराई है। मगर किया- धरा, किया जा रहा इस कदर नुमायाँ है कि ऐसी झीनी चदरियाओं से ढंकने वाला नहीं है।
(लेखक 'लोकजतन' के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94242-31650)