पीएफ की सैलरी लिमिट 25–30 हजार करने की तैयारी, कर्मचारियों और कंपनियों दोनों पर पड़ेगा बड़ा असर

Update: 2026-01-09 17:29 GMT

रिपोर्ट : विजय तिवारी

नई दिल्ली।

केंद्र सरकार कर्मचारी भविष्य निधि (PF) से जुड़े नियमों में अहम बदलाव की दिशा में आगे बढ़ रही है। मौजूदा समय में पीएफ की अनिवार्य सैलरी सीमा ₹15,000 प्रतिमाह तय है, लेकिन इसे बढ़ाकर ₹25,000 से ₹30,000 करने पर गंभीर स्तर पर विचार किया जा रहा है। यह बदलाव लागू होने की स्थिति में निजी और संगठित क्षेत्र के करोड़ों कर्मचारियों की मासिक सैलरी, बचत और रिटायरमेंट प्लानिंग सीधे प्रभावित होगी।

क्यों जरूरी माना जा रहा है बदलाव

विशेषज्ञों के अनुसार ₹15,000 की सैलरी सीमा कई साल पहले तय की गई थी। बढ़ती महंगाई, जीवन-यापन की लागत और वेतन संरचना में बदलाव को देखते हुए यह सीमा अब अप्रासंगिक होती जा रही है। सरकार का मानना है कि सैलरी लिमिट बढ़ाने से अधिक कर्मचारियों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जा सकेगा।

मौजूदा नियम क्या कहते हैं

वर्तमान व्यवस्था के तहत जिन कर्मचारियों का बेसिक वेतन और महंगाई भत्ता ₹15,000 या उससे कम है, उनके लिए पीएफ अनिवार्य है। कर्मचारी और नियोक्ता दोनों 12-12 प्रतिशत योगदान करते हैं। वहीं इससे अधिक वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए पीएफ स्वैच्छिक होता है।

नया नियम लागू होने पर क्या बदलेगा

यदि सैलरी लिमिट बढ़ाकर ₹25,000 या ₹30,000 कर दी जाती है, तो इस दायरे में आने वाले सभी कर्मचारियों पर पीएफ कटौती अनिवार्य हो जाएगी। इससे पीएफ खातों में हर महीने जमा होने वाली राशि में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

कर्मचारियों को होने वाले फायदे

रिटायरमेंट फंड मजबूत होगा: ज्यादा योगदान से सेवानिवृत्ति के समय बड़ी राशि मिलेगी।

सुरक्षित निवेश: पीएफ को जोखिम मुक्त निवेश माना जाता है।

पेंशन में सुधार की संभावना: EPS के तहत भविष्य में बेहतर पेंशन मिल सकती है।

लंबी अवधि की वित्तीय सुरक्षा: बुजुर्गावस्था में आर्थिक निर्भरता कम होगी।

नुकसान और चुनौतियां

इन-हैंड सैलरी में कटौती: मासिक वेतन में सीधे तौर पर कमी आएगी।

नियोक्ताओं का खर्च बढ़ेगा: कंपनियों को भी समान प्रतिशत योगदान देना होगा।

MSME सेक्टर पर दबाव: छोटी और मध्यम कंपनियों के लिए यह आर्थिक बोझ बन सकता है।

नौकरी बाजार पर असर: कुछ कंपनियां नई भर्तियों से बच सकती हैं।

विशेषज्ञों की राय

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला लंबी अवधि में कर्मचारियों के हित में होगा, लेकिन सरकार को इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करना चाहिए ताकि अचानक सैलरी पर असर न पड़े। कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव दे रहे हैं कि कर्मचारियों को आंशिक छूट या विकल्प दिए जाएं।

कर्मचारी संगठनों की प्रतिक्रिया

कई कर्मचारी संगठन इस प्रस्ताव का समर्थन कर रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि महंगाई के इस दौर में इन-हैंड सैलरी घटाना व्यावहारिक नहीं है। निजी क्षेत्र के युवा कर्मचारियों में इसे लेकर ज्यादा असमंजस देखा जा रहा है।

सरकार की तैयारी और स्थिति

सरकार और कर्मचारी भविष्य निधि संगठन इस प्रस्ताव के वित्तीय, सामाजिक और व्यावहारिक पहलुओं का अध्ययन कर रहे हैं। फिलहाल इस संबंध में कोई आधिकारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है, लेकिन आने वाले समय में इस पर बड़ा फैसला लिया जा सकता है।

पीएफ की सैलरी लिमिट बढ़ाने का प्रस्ताव रिटायरमेंट सुरक्षा की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। हालांकि इसका सीधा असर कर्मचारियों की मासिक सैलरी और नियोक्ताओं की लागत पर पड़ेगा। सरकार का अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि वह बचत और खर्च के बीच संतुलन कैसे बनाती है।

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