विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस: ऑटिज़्म के शुरुआती संकेत पहचानें, हर बच्चे की अनोखी क्षमता को समझें
डॉ. शरद शर्मा, एडिशनल डायरेक्टर, पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर
जयपुर, 2 अप्रैल 2026: विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस हर वर्ष 2 अप्रैल को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2007 में स्थापित इस दिवस का उद्देश्य ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम से जुड़े व्यक्तियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और उन्हें स्वीकार्यता दिलाना है। यह दिन न्यूरोडायवर्सिटी को समझने के महत्व को रेखांकित करता है और यह सुनिश्चित करने पर जोर देता है कि हर बच्चे को उसकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप सहयोग मिले। अप्रैल माह को ऑटिज़्म जागरूकता माह के रूप में भी मनाया जाता है, जिसमें स्कूल, स्वास्थ्य सेवा प्रदाता और समुदाय मिलकर अधिक समावेशी वातावरण बनाने के लिए कार्य करते हैं।
यह दिवस ऑटिज़्म की समय पर पहचान और शीघ्र हस्तक्षेप के महत्व को भी रेखांकित करता है। यह खुली बातचीत को प्रोत्साहित करता है, सामाजिक कलंक को कम करता है और सहायक देखभाल, शिक्षा तथा थेरेपी तक पहुंच को बढ़ावा देता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हमें याद दिलाता है कि समय पर समझ विकसित करना बच्चे के विकासात्मक सफर में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।
डॉ. शरद शर्मा, एडिशनल डायरेक्टर, पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी, फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर ने कहा,
“इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स में वर्ष 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में ऑटिज़्म की अनुमानित व्यापकता लगभग 68 बच्चों में से 1 है। हालांकि, कई मामलों की पहचान अभी भी देर से होती है। शुरुआती संकेतों को पहचानकर समय पर हस्तक्षेप शुरू करने से विकासात्मक परिणामों और जीवन की गुणवत्ता में महत्वपूर्ण सुधार किया जा सकता है।”
ध्यान देने योग्य शुरुआती संकेत:
* बोलने में देरी या सीमित मौखिक संचार
* आंखों से कम संपर्क या नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना
* सामाजिक संपर्क या खेल में कम रुचि
* दोहराव वाले व्यवहार, जैसे हाथ हिलाना या वस्तुओं को एक पंक्ति में लगाना
* दिनचर्या के प्रति अत्यधिक लगाव; बदलाव में कठिनाई
* ध्वनि, रोशनी, बनावट या स्पर्श के प्रति संवेदनशीलता
निदान (Diagnosis):
* लक्षण अक्सर तीन वर्ष की आयु से पहले दिखाई देते हैं
* निदान विकासात्मक पैटर्न और व्यवहार के आधार पर किया जाता है
* स्क्रीनिंग टूल्स और विशेषज्ञों द्वारा मूल्यांकन से पुष्टि की जाती है
* प्रारंभिक पहचान से समय पर हस्तक्षेप और सहायता शुरू की जा सकती है
ऑटिज़्म की देखभाल और सहयोग:
समय पर और निरंतर सहयोग से बच्चों को आवश्यक कौशल विकसित करने में काफी मदद मिलती है। व्यवहारिक, स्पीच और ऑक्यूपेशनल थेरेपी उनके समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संरचित दिनचर्या बनाना और सहायक वातावरण प्रदान करना सीखने और सहजता, दोनों को बढ़ाता है। इसके साथ ही, अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी और केयरगिवर्स का प्रशिक्षण प्रगति तथा देखभाल की निरंतरता को मजबूत बनाता है। सही मार्गदर्शन और सहयोग के साथ, ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम से जुड़े कई व्यक्ति स्वतंत्र और संतोषजनक जीवन जी सकते हैं।
विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि ऑटिज़्म के शुरुआती संकेतों की पहचान किसी लेबल लगाने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों को सही समय पर उचित देखभाल, समझ और अवसर उपलब्ध कराने के लिए होती है।