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जो बिल का 'ब' भी नहीं जानते, बिल का विरोध इस कारण कर रहे हैं कि इसे मोदी लाये हैं

जो बिल का ब भी नहीं जानते,  बिल का विरोध इस कारण कर रहे हैं कि इसे मोदी लाये हैं
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एक आदर्श लोकतांत्रिक विमर्श वही है जिसमें दोनो पक्ष मिल कर मुद्दे पर पेशाब कर दें। मैं पिछले कुछ दिनों से कृषि बिल के बहाने चल रहे विमर्श का स्तर देख कर अत्यंत प्रसन्न हूँ। इस विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बिल के विरोधी इस कारण विरोध कर रहे हैं कि इसे मोदी लाये हैं, और समर्थक भी इसी कारण समर्थन कर रहे हैं कि मोदी लाये हैं। दोनों समान रूप से इस बिल का 'ब' भी नहीं जानते। यह अद्भुत किस्म का साम्यवाद है। चर्चा के केंद्र में किसान नहीं है, केवल मोदी हैं। इससे पता चलता है कि देशवासी कितने परिपक्व विमर्शकार हैं।

मेरे बाबा कहते थे, सबसे उच्च कोटि का विमर्श गंजेड़ी करते हैं। देश की बदहाली को लेकर छिड़े विमर्श में जब साली और घरवाली का जिक्र आ जाय, तब जा कर चर्चा का खर्चा निकलता है। विकास की हवा में उड़ती मेरे देश की तरुणाई जल्द ही विमर्श के उस स्तर को भी छू लेगी।

मैंने कल अपने एक पड़ोसी बुजुर्ग से पूछा, "और कका! देश में आपके लिए विमर्श छिड़ा हुआ है। मुँह तो छोड़ो, हाथ पैर से भी विमर्श हो रहा है। सांसद आपके लिए मर-मराने को तैयार हैं और आप यहाँ ओल पर माटी चढ़ा रहे हो? अरे तनिक कृषि बिल पर अपना मत बताओ मरदे..."

बुढ़ऊ मुस्कुरा कर बोले, "सुनिए माटसाब! सरकारी अस्पताल की नर्स और राजनैतिक विमर्श दोनों केवल होने के लिए होते हैं, इनसे कुछ फायदा नहीं होता। विमर्श निठल्लों का काम है। उनके जैसे निठल्ले बोलते हैं और आपके जैसे निठल्ले सुनते हैं। किसान के घर में रोटी संसद के दंगल से नहीं, जंगल से आती है। और मेरा मत जानना चाहते हैं सुनिए! जिस देश में धान तेरह रुपये किलो और पानी बीस रुपये लीटर बिके उस देश में जो किसानी करे वह चू....... "

बुढ़ऊ की भाषा साम्यवादी होने लगी थी। मुझे याद आया, एक उखड़े हुए साम्यवादी से बात करना और गदहा से जौ चराना दोनों बराबर होता है। हमने उनको बीड़ी पीने के लिए दसटकिया नोट दिया और सरक गए।

किसान को विमर्श पसन्द नहीं पर मुझे है। टीवी हो या बीवी, मैं दोनों के विमर्श बड़े ध्यान से सुनता हूँ। पहले को सुन कर पता चलता है कि लोग कितने गिर गए हैं, और दूसरे को सुन कर पता चलता है कि मैं कितना गिर गया हूँ। वैसे वैसे व्यक्ति के चरित्र का गिरना बहुत बुरा नहीं होता। आजकल गिरा हुआ आदमी बहुत ऊपर जाता है।

कल एक मित्र कह रहे थे कि कृषि बिल के कारण महंगाई एकाएक इतनी बढ़ गयी कि है आम गरीब किसान दोगुने दाम पर सब्जी खरीदने को मजबूर है। मैं सोचता हूँ कि जिस देश का किसान गोभी, बैगन, मिर्चा लौकी जैसी मौसमी सब्जी भी बाजार से खरीदता है उस देश की कृषि व्यवस्था और व्यवस्थापक दोनों पूजनीय हैं। हाँ उन्हें सम्मान देने की विधि को लेकर विमर्श होना चाहिए।

वैसे मैं किसानों के भविष्य को लेकर निश्चिन्त होऊं न होऊं, देश के भविष्य को लेकर निश्चिन्त हूँ। जिस देश में नर्स के कोमल स्पर्श की आशा में व्यक्ति सहर्ष कोरोना का मरीज होने को तैयार है, उस देश के उत्कर्ष में कोई बाधा नहीं। वह विमर्श के बल पर ही फर्श से अर्श पर चला जायेगा।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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