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19 अगस्त 2022 शुक्रवार को होगा श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत और जन्मोत्सव।

19 अगस्त 2022 शुक्रवार को होगा  श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत और जन्मोत्सव।
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भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य (जन्म) आध्यात्मिक पहलू तथा

जन्माष्टमी व्रत निर्णय।।

सच्चिदानंदरूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे।

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयं नुमः।।

जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्

तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः।

तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषा

धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परं धीमहि।।

'सच्चिदानंद भगवान श्रीकृष्ण को हम नमस्कार करते हैं, जो जगत की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय के हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक – इन तीनों प्रकार के तापों का नाश करने वाले हैं।'

'जिससे इस जगत का सर्जन, पोषण एवं विसर्जन होता है क्योंकि वह सभी सत् रूप पदार्थों में अनुगत है और असत् पदार्थों से पृथक है; जड़ नहीं, चेतन है; परतंत्र नहीं, स्वयं प्रकाश है; जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं, प्रत्युत उन्हें अपने संकल्प से ही जिसने उस वेदज्ञान का दान किया है; जिसके सम्बन्ध में बड़े-बड़े विद्वान भी मोहित हो जाते हैं; जैसे तेजोमय सूर्य रश्मियों में जल का, जल में स्थल का और स्थल में जल का भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत-स्वप्न- सुषिप्त रूपा सृष्टि मिथ्या होने पर भी अधिष्ठान-सत्ता से सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयं प्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और माया कार्य से पूर्णतः मुक्त रहने वाले सत्यरूप परमात्मा का हम ध्यान करते हैं।

पं. अनन्त पाठक :- कृष्ण जन्म की कहानी का भी गहन अर्थ है। देवकी शरीर का प्रतीक है और वसुदेव जीवनी शक्ति (प्राण) का प्रतीक है। जब शरीर में प्राणों का संचार होता है तब आनंद (कृष्ण) की उत्पत्ति होती है। परंतु अहंकार (कंस) आनंद को समाप्त करने की कोशिश करता है। कंस देवकी का भाई है जो इंगित करता है कि अहंकार शरीर के साथ ही उत्पन्न होता है। जो व्यक्ति प्रसन्न और आनंदपूर्ण है वह किसी को पीड़ा नहीं देता, जो व्यक्ति अप्रसन्न और भावनात्मक रुप से घायल है वही दूसरों के लिए दु:ख का कारण बनता है। जो लोग यह अनुभव करते हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ है, वह अपने अहंकार पर ठेस लगने के कारण दूसरों के साथ भी अन्याय कर बैठते हैं।

अहंकार का सबसे बड़ा शत्रु आनंद है। जहां पर आनंद व प्रेम होता है, वहां पर अहंकार जीवित नहीं रह सकता और अपने घुटने टेक देता है। जिस व्यक्ति का समाज में बहुत ऊंचा स्थान होता है वह व्यक्ति भी अपने छोटे बच्चे के सामने पिघल जाता है। चाहे व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि उसका बच्चा बीमार हो जाता है तो वह व्यक्ति भी थोड़ा असहाय अनुभव करता है। अहंकार प्रेम, सादगी और आनंद के समक्ष सरलता से पिघल जाता है। कृष्ण आनंद का प्रतीक हैं, सादगी और प्रेम का मुख्य स्रोत हैं।

कंस के द्वारा देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल देना, इस बात का प्रतीक है कि जब अहंकार बढ़ जाता है, तब शरीर कारावास के समान प्रतीत होता है। जब कृष्ण का जन्म हुआ, तब जेल के पहरेदार गहरी नींद में सो गए। यहां पर पहरेदार हमारी पांचों इंद्रियां हैं, जो जागृत अवस्था में बहिर्मुखी हो कर अहंकार की रक्षक होती हैं। जब यही इंद्रियां अंतर्मुखी हो जाती हैं, तब हमारे भीतर आंतरिक आनंद अंकुरित होता है।

कृष्ण को माखन चोर भी कहा जाता है। दूध को पोषक तत्व माना जाता है और दही दूध का परिष्कृत रूप है। जब दही को मथा जाता है तब मक्खन निकलकर ऊपर तैरने लगता है, यह बहुत पोषक होने के साथ-साथ हल्का व सुपाच्य होता है, भारी नहीं। इसी प्रकार यदि हमारी बुद्धि को मथा जाए, यह मक्खन की भांति हो जाएगी। जब बुद्धि में ज्ञान का उदय होता है तब व्यक्ति स्वयं में स्थित हो जाता है। ऐसा व्यक्ति दुनिया के आकर्षण से नहीं बंधता और उसका मन इसमें नहीं डूबता। कृष्ण का मक्खन चुराना प्रेम की महिमा को दर्शाता है। कृष्ण इतने मनमोहक है कि अपने प्रेम के आकर्षण में वह सब का चित् चुरा लेते हैं। यहां तक कि जो बिल्कुल निर्मोही हैं वह भी उनके मोह में पड़ जाते हैं।

कृष्ण अपने सिर पर मोर पंख क्यों लगाते हैं? एक राजा के ऊपर सारे समाज की जिम्मेदारी होती है जो कि एक बहुत बड़ा बोझ हो सकती है। वह राजा के सिर पर मुकुट के रूप में रखी होती हैं। परंतु कृष्ण अपनी सारी जिम्मेदारी एक खेल की तरह बिना किसी प्रयास के पूरा करते हैं। जैसे एक मां अपने बच्चे के सारे कामों को बोझ नहीं समझती, उसी प्रकार कृष्ण अपनी जिम्मेदारियों को हल्के तौर पर लेते हैं और अपने सिर पर लगे बहुरंगी मोरपंख के मुकुट की तरह जीवन में अपना चरित्र रंगों से भर कर निभाते हैं।

कृष्ण हम सब के अंतरतम में सर्वाधिक मनमोहक व आनंदाकाश हैं। जहां पर किसी भी प्रकार की बेचैनी नहीं है, चिंता और इच्छाएं मन को घेरे हुए नहीं हैं। यहां तुम गहन विश्राम कर सकते हो और इस गहन विश्राम में ही कृष्ण का जन्म होता है।

कृष्ण जन्माष्टमी का यही संदेश है कि यही समय है जब समाज में आनंद की लहर उठनी चाहिए। पूर्ण गहनता से आनंदमय हो जाओ!

प्रभू श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्ररूप में हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण विष्णुजी के आठवें अवतार माने जाते हैं। यह श्रीविष्णु का सोलह कलाओं से पूर्ण भव्यतम अवतार है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी:-

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद्गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी को भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।

इस वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत संवत् २०७९ भाद्रपद कृष्ण अष्टमी शुक्रवार 19 अगस्त 2022 को मनाया जाएगा।

'जन्माष्टमी व्रत' एवं 'जयन्ती व्रत' एक ही हैं या ये दो पृथक् व्रत हैं। कालनिर्णय ने दोनों को पृथक् व्रत माना है, क्योंकि दो पृथक् नाम आये हैं, दोनों के निमित्त (अवसर) पृथक् हैं (प्रथम तो कृष्णपक्ष की अष्टमी है और दूसरी रोहिणी से संयुक्त कृष्णपक्ष की अष्टमी), दोनों की ही विशेषताएँ पृथक् हैं, क्योंकि जन्माष्टमी व्रत में शास्त्र में उपवास की व्यवस्था दी है और जयन्ती व्रत में उपवास, दान आदि की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त जन्माष्टमी व्रत नित्य है (क्योंकि इसके न करने से केवल पाप लगने की बात कही गयी है) और जयन्ती व्रत नित्य एवं काम्य दोनों ही है, क्योंकि उसमें इसके न करने से न केवल पाप की व्यवस्था है प्रत्युत करने से फल की प्राप्ति की बात भी कही गयी है। एक ही श्लोक में दोनों के पृथक् उल्लेख भी हैं। हेमाद्रि, मदनरत्न, निर्णयसिन्धु आदि ने दोनों को भिन्न माना है। निर्णयसिन्धु ने यह भी कहा है कि इस काल में लोग जन्माष्टमी व्रत करते हैं न कि जयन्ती व्रत। किन्तु जयन्तीनिर्णय का कथन है कि लोग जयन्ती मनाते हैं न कि जन्माष्टमी। सम्भवत: यह भेद उत्तर एवं दक्षिण भारत का है।

श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोह रात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्य राशि प्राप्त कर लेंगे। व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमीके दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्री विग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासी उसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रों से मंगल ध्वनि बजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं । श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।

भविष्योत्तर पुराण में कृष्ण द्वारा 'कृष्णजन्माष्टमी व्रत' के बारे में युधिष्ठिर से स्वयं कहलाया गया है–'मैं वासुदेव एवं देवकी से भाद्र कृष्ण अष्टमी को उत्पन्न हुआ था, जबकि सूर्य सिंह राशि में था, चन्द्र वृषभ राशि में था और नक्षत्र रोहिणी था'। जब भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र होता है तो वह तिथि जयन्ती कहलाती है, उस दिन उपवास करने से सभी पाप जो बचपन, युवावस्था, वृद्धावस्था एवं बहुत से पूर्वजन्मों में हुए रहते हैं, कट जाते हैं। इसका फल यह है कि यदि भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी हो तो न यह केवल जन्माष्टमी होती है, किन्तु जब भाद्रपद कृष्ण पक्ष की कृष्णाष्टमी से रोहिणी संयुक्त हो जाती है तो जयन्ती होती है।

इस बार जयंती योग नहीं है जन्माष्टमी है।

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जो व्यक्ति जन्माष्टमी के व्रत को करता है, वह ऐश्वर्य और मुक्ति को प्राप्त करता है। आयु, कीर्ति, यश, लाभ, पुत्र व पौत्र को प्राप्त कर इसी जन्म में सभी प्रकार के सुखों को भोग कर अंत में मोक्ष को प्राप्त करता है।

शेष अपने विवेक के अनुसार-

यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत्।

भौमस्य ब्रह्मणों गुप्त्यै तस्मै ब्रह्मात्मने नम:।।

सुजन्म-वासुदेवाय गोब्राह्मणहिताय च।

शान्तिरस्तु शिव चास्तु॥ 🙏

------------------------- पं अनन्त पाठक

-------------------ज्योतिष, वास्तु, कर्म कांड

---जेलरोड रायपुरराजा बहराइच उ. प्र. भारत

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