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कहानी : हरमपन करता है दिनभर...हरमपन।

कहानी : हरमपन करता है दिनभर...हरमपन।
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थानेदार- क्या करता है तुम्हारा मरद?

महिला- कुछ नहीं!

थानेदार- "अरे! कुछ तो करता ही होगा"

महिला- "साहब! वैसे तो कुछ नहीं करता लेकिन जब आप इतना जोर देकर पूछ रहें हैं तो बता ही देती हूं..

हरमपन करता है दिनभर...हरमपन।"

थानेदार- "अरे! होश में हो.. थाना है, तुम्हारा मायका नहीं."

महिला- "हां साहेब! होश में हूं...सुबह साढ़े आठ बजे बिस्तर छोड़कर उठता है.. बस दातुन-मंजन किया, फिर निकल देता है चौराहे..आठ कप चाय पीता है...और चार जोड़ी पान..फिर घूम-घूम कर तीन तरह का अखबार पढ़ता है.. दोपहरी में घर आता है..थरिया भर भकोसता है और दिन-रात परधनवा के काम में किल्ली लगाता है.

थानेदार- "किल्ली लगाता है!!मतलब ??

महिला- "कुछ नहीं साहब! खलिहर है..

परधनवा,काहें इसको शौचालय दे दिया.. काहें उसको आवास! कौन मास्टर स्कूल नहीं आया..कौन सफाईकर्मी नदारत है..आंगनबाड़ी केतना सतुआ बांट रहीं हैं.. बस इसी खुरपेंच में रहता है दिनभर."

थानेदार- "तब तो बढ़िया काम करता है."

महिला- "हं लुआठी बढ़िया काम करता है! उधर परधनवा कमा के लाल हो गया..दूं तल्ला बिल्डिंग, स्कार्पियो गाड़ी.चार बीघा जमीन खरीद लिया और एक इ है कि आपन कच्छा-बनियान के खरीदने की औकात नहीं."

थानेदार- "तुम बता रही हो कि अखबार पढ़ता है..इसका मतलब पढ़ा लिखा है."

महिला- "भगवान जाने! कहता तो है कि हाईस्कूल सैकेंड डिवीजन पास है लेकिन हमको तो रत्ती भर भरोसा नहीं..रही बात अखबार की तो उस पर एतना मेहरारू की फोटो छपती है..उसी को चाय पीकर निहारता होगा.

थानेदार- "वैसे उसके पढ़ाई पर विश्वास क्यों नहीं तुमको??"

महिला-"साहब! आज तक कवनो कागज पत्तर तो देखें नहीं..एक बार उसके बक्सा से एक लभलेटर पकड़े थे.…बीस लाइन के चिट्ठी में तेरह ठो मात्रा की गलती थी..'दिल' को 'दील' लिखा था.….वफ़ा को 'बफा'.. 'गुलाब का फूल' की जगह 'गूलाब का फुल्ल'

बतायीं..हम सिर्फ पांचे पास हैं लेकिन 'दिल' और 'दील' में खूब फरक बूझते हैं.

हां तो साहब.. चिट्ठी लेकर सबसे पहिले बाबू के बस्ता में से कापी पेन्सिल निकाले फिर पहुंच गये छत पर.… वहां इ यूट्यूब पर कवनो फूहड़ नाच देख रहा था.. पहुंचते ही पहिले मोबाइल हाथ में लेकर स्विच आफ किये और उनके सामने कापी धरके हाथ में पिंसिल पकड़ाकर बोले..लिखो-

'दिल'

ऊ भौऊचका गये...

पूछे -'काहें'

हम बोले- अब 'दिल' लिखने में तुम्हारा हाथ काहें कांप रहा… लिखो! जवन हम कह रहें हैं..

फिर..डर-डर के लिखेन-

'दील'

साहब! ज्यों लिखें 'दील'...मारे तुरन्ते, दूं कंटाप..जब तक ऊ कुछ समझें-बूझै उनका लभलेट मुंह पर मार के, छह झापड़ और दीहिन. सच्ची बतायीं दरोगा जी.. चिट्ठी खातिर केवल चार हाथ मारे रहे..चार हाथ केवल 'दील' खातिर….अभगवा दिल तक नहीं लिख पावत और बात करेला कलेक्टरी का.."

थानेदार- "तुमको मारता-पीटता भी है?"

महिला- भक्क! ऊ का मारी साहेब!

वइसे शादी के पांच बरीस बहुत पिट-पिट हाथ छोड़ता था..एक दिन गर्मी में खेत काटकर घर पहुंचे .तमतमाते तो थे ही..इ पहुंचते ही हमरे ऊपर हाथ छोड़ दिया ..हमहूं आव देखें न ताव तुरन्ते उनका गट्टा धरके मोड़ दिये.. फिर एक हाथ बबरी धरके नीचे खींचें और पीठ पर साध के तीन कुहनी ऐक्के जगह धरे..ऊ वहीं पसर गये..हमरो गुस्सा सातवें आसमान पर..चूल्हे के बराबर में चईला गजा था.…खींचकर जब सामने आये तो गोड़ धर लिये हमारा..खैर उनका रोना और हाल देखकर चइला से ना मारे.

थानेदार- "तब"

महिला-"तब का! फिर हमहूं को मोह लगने लगा..खुदे नूरानी का तेल गरम करके लाये, उनकी पीठ पर पैंतालीस मिनट मले..और ऊ पेट के बल लेटकर भकर-भकर रो रहा था और कह रहा था "हींक्क भर मारके तेल लगावत बाड़ू"

थानेदार- "अच्छा बताओ जब तुम खुदे थानेदार हो तो क्या करने थाने आयी हो."

महिला- "साहेब! मरद का हरमपन छुड़ाने."

थानेदार- "अब कौन सा हरमपन बचा है जो तुम छुड़ा नहीं पा रही."

महिला- "सुनीं साहब! हमरे घर शौचालय नहीं था तो हम सब खेत जाते थे.. लेकिन इ..खेत के नाम पर दिन में तीन फेरा जाता था...वह भी पूरे डेढ़ घंटे बाद लौटता था..जब हम पूछें काहें एतना लेट कहता था कि कब्ज हो गया था... हांलांकि हमको मालूम कि इ एक नम्बर का झूट्ठा है.. लेकिन करते का जब घरे शौचालय ही नहीं !"

थानेदार- "अब तो घर-घर शौचालय हो गया है..तुमको नहीं मिला क्या.'

महिला- "मिला है सरकार! पहिले ही लाट में मिला..हम तो शौचालय खातिर सोलह सौ नगद, प्रधान के हाथ में धर आये थे..ए लिए कि अगर हमरे गांव में पहिला शौचालय भी आवे तो हमरे घरे आवे."

थानेदार- "फिर आया कि नहीं शौचालय?"

महिला- "आया भी और बन के तैयार भी है..सितम्बरे से चालू है सरकार."

थानेदार- "तब क्या परेशानी है तुमको?"

महिला-"परेशानी इ है साहब! कि शौचालय बनले के बाद भी इ लोटा लेकर खेत में जाता है."

थानेदार- "खेत में जाता है!!रोकती नहीं हो क्या?"

महिला- "रोकते हैं सरकार! लेकिन कहता है कि परधनवा के शौचालय में गोड़ नाहीं डारब..भले अइठं के मर जाइब.

बतायीं अब एतना पैसा कहां धरा है कि दूसर शौचालय बनवायीं."

थानेदार- "मतलब थाने का यही काम रह गया है कि हम दिनभर इ निगरानी करें की कौन डिब्बा लेकर खेत जा रहा है."

महिला- 'दिनभर नाहीं साहब! सुबह नौ बजे ज्यों डिब्बा उठाइहं हम तुरन्ते फोन कर देब. आप बस दो ठो सिपाही भेज देब. बस एक बार चार ठंडा गिरी अपने आप राही पर आ जइहं."

थानेदार (सिपाही से मुखातिब होकर)- इसको अपना नम्बर नोट करा दो.. और हां! जब इसका फोन आये तो साथ में एक महिला सिपाही भी ले लेना... मुझे लग रहा है मामला कुछ दूसरा है. क्या पता..मौके पर से दो लोग को गिरफ्तार करना पड़े.

रिवेश प्रताप सिंह

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