"छुट गइल इनरा ,मड़इया ए बाबा"

छुट गइल इनरा ,मड़इया ए बाबा

माननीय मुख्यमंत्री !
नीतीश कुमार जी ,

हम नहीं जानते हैं कि हम खुद से किस जन्म का बदला चुका रहे अपनी माटी छोड़ ,
हम यह भी नही जानते कि हमे हमारे जीवन मे अपने लोगो के बीच रहने का सुख कभी मिलेगा कि नहीं ,
हम ये भी तो नहीं जानते कि हम बिहारियों की नियति से बेदखली का ग्रहण कब छटेगा ...
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पर हमको ये लगता है कि शायद ...,शायद....,शायद...आप उस भ्रम को पंख दे सकते हैं जो एक आम बिहारी रोज घर के दुआरी पर बैठ , दुख के झंझोरा को भूल भविष्य के सुख पाल लेता है !

हम कैसे बतायें कि हमारा दम घुटता है दिल्ली-बम्बे के फैक्ट्रियों वाली आबोहवा में...,
हम कैसे बतायें कि हम पीछे छूट जाते हैं इस बेताहशा रफ्तार में भागती जिंदगियों के रेस में ...,
हम कैसे बतायें इन चमचमाते ऑफिस वाली नौकरी ने कितना भूचाल लाया है हमारे रिश्तों में...,
और बता के भी करेंगे क्या ?
आख़िर रास्ता ही क्या है हम बिहारियों के पास ...?
हम तो पैदा ही होते हैं 'माटीबदर' होने के लिये.😢

मुख्यमंत्री जी !
काश आप समझ पाते कितना कचोटती है हमको हमारे खेतों की लहलहाती याद...,
काश आप समझ पाते कि हमको माँ के हाथ का वो चूल्हा वाला खीर कितना तड़पा जाता है ...,
काश आप समझ पाते कि अपने घर छठ-दीवाली-दशहरा पर न जाने का सीलन क्या होता है...,
समझना ही है तो समझिए न वो खाली पड़े मैदान , वो पीपल के नीचे का चबूतरा वीरान , वो शांत हो चुकी नदी , वो बंजर खेत , निर्जन होते आम के बागान ,आदमी बिहीन दलान ,
झूठी उम्मीद में टँगी घरवालों की सुनी आंखे !!

नीतीश कुमार जी आप तो जानते ही होंगे !
एक बिहारी बाप अपने बेटे को इंजीनियर - डाकडर- अफसर बनाने के लिये अपना सबकुछ दाँव पर लगा देता है... , ये सोचकर कि बेटा काबिल होगा नाम होगा सुख होगा !
अरे काहें का सुख जब बेटा ताउम्र अंगुलियों पर छुट्टियाँ गिनता रहे घर जाने को ?
तरस जाए घर के आलू के पराठे , लिट्टी चोखा खाने को ?
बस सोचकर तृप्त हो जाना पड़े उस बचपन वाली गिलास में बनी चूल्हे की खीर को ?

क्या यहीं है सुख ?
मन तो करता है अभी सब छोड़ छाड़ के आ जायें उस अपने गांव में जहां की हर गली हमें पहचानती हैं...अपनाती है ।
पर ये भी तो नहीं कर सकते हम बिहारी बेटे , ज़िम्मेदारी को कांधे लादने का खुद का खुद से वादा जो किये हैं !

मुख्यमंत्री जी !
हमें रेस्टुरेंट का विलायती मेनू नहीं , माँ के हाथ की रोटी में स्वाद मिलता है..,
हमें ऑफिस के बॉस संग क्लब में ठुमके नहीं , पिता जी के साथ बारात में जाना अच्छा लगता है ....,
हमें कुल ड्यूड वाला डेट वेट में नहीं बल्कि अपनी प्रेमिका संग गुप्ता चाट भंडार के चाट में प्रेम नजर आता है...,
हमें स्पॉट पिकनिक में नहीं बल्कि दोस्तों यारों संग मिल बैठ लिट्टी चोखा बनाने खाने में आनंद आता है ....,
थक से गये हैं इस जहर भरे माहौल में ।

सर ,
राजनीति तो सब करते हैं ....
एक बार बस एक बार उस सपने को रंग भरिये जो आपने कभी दिखाया था हम बिहारियों को और शायद जो आप भी चाहते हैं पर राजनीति तले दब सा गया !

हम भी आना चाहते हैं अपने गांव ,अपनी माटी...अपने खेत , अपने बगान , अपनी दलान ।
सालती हैं अंदर ही अंदर हमे अपनों की याद ।
कुछ तो समझिए...
समझ रहे हैं न मुख्यमंत्री जी ...?

'एक बिहारी'
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संदीप तिवारी 'अनगढ़'
"आरा"

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