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पुलवामा के शहीद अमर रहें, यह राष्ट्र अमर रहे... जय हो!

पुलवामा के शहीद अमर रहें, यह राष्ट्र अमर रहे... जय हो!

पुलवामा आक्रमण केवल एक घटना नहीं थी, पुलवामा आक्रमण एक सबक था कि जबतक आपके पड़ोस में पाकिस्तान जैसा क्रूर आतंकी देश है, तबतक शांति, सद्भाव और भाईचारे की बात सिवाय बौद्धिक छिनरपन के और कुछ नहीं।

पाकिस्तान किसी देश का नाम नहीं है, एक आतंकी विचार का नाम है। एक ऐसा विचार, जो जन्म लेने के बाद से भारत को केवल और केवल कष्ट देता रहा है। पाकिस्तान वह क्रूर देश है, जिसका जन्म ही एक करोड़ हत्याओं की नींव पर हुआ था। आप मानें न मानें, पर जबतक भारत के पड़ोस में पाकिस्तान है, भारत तबतक अघोषित युद्ध में है। उसे अपनी हर नीति इसी आधार पर बनानी होगी।

कृष्ण का स्मरण कीजिये! महाभारत युद्ध के पूर्व जो कृष्ण युद्ध को रोकने के लिए असँख्य प्रयास करते हैं, स्वयं दूत तक बनते हैं, युद्धभूमि में वही कृष्ण केवल और केवल मृत्यु की बात करते हैं। न भागते जयद्रथ को छोड़ते हैं, न निहत्थे कर्ण को... न समर्पण कर चुके भीष्म को छोड़ते हैं, न पुत्रशोक में तड़पते द्रोण को... यही युद्ध का नियम है, यही राष्ट्र की रक्षा की नीति है।

राष्ट्र बलिदान मांगता है। कोई भी राष्ट्र बलिदानों की नींव पर ही खड़ा होता है। पर बलिदान युद्धभूमि में शोभता है, शहर की सड़कों पर नहीं। पुलवामा में हमारे नायक सड़कों पर बलि चढ़े थे। दोष हमारा था, हमने स्वीकार ही नहीं किया कि पाकिस्तान के लिए हमारी धरती युद्धभूमि है। उसने कभी हमें अपना पड़ोसी नहीं समझा, वह हमेशा भारत को जीतने की महत्वकांक्षा के साथ जीता आया है... जाने क्यों हम इस सच को जान कर भी स्वीकार नहीं कर पाते।

पुलवामा की चर्चा हमें हमेशा भावुक कर जाती है, पर हमें पुलवामा पर गर्व करना होगा! केवल गर्व... युद्ध भावुकता के बल पर नहीं जीता जा सकता, युद्ध कठोर हो कर जीता जाता है। युद्ध में शत्रु से पहले अपने हृदय को मारना पड़ता है।

कुछ लोग भावुक आलेख लिखते हैं कि सैनिक भी साधारण मनुष्य ही होता है। नहीं मित्र! सैनिक भारत का हो या पाकिस्तान का, इधर का हो या उधर का, वह साधारण मनुष्य नहीं होता। यदि होता तो मात्र कुछ हजार रुपयों के लिए माईनस चालीस डिग्री तापमान में सियाचिन में खड़ा नहीं हो पाता। सैनिक साधारण मनुष्य होता तो शमशान बनी युद्धभूमि में भी उसे अपना कर्तव्य याद नहीं रहता... मृत्यु सबको तोड़ देती है, बस सैनिक नहीं टूटता। शमशान में होली या तो शिव मनाते हैं, या सैनिक मनाता है। सैनिक साधारण नहीं होता, उसे ईश्वर स्वयं अपनी बलिष्ठ भुजाओं से गढ़ते हैं। वह तनख्वाह के लिए काम नहीं करता, वह राष्ट्र के प्रति अपनी अतुल्य निष्ठा के लिए कार्य करता है। पुलवामा में वीरगति पाये लोग साधारण नहीं थे, वे हम सब से बहुत ऊँचे स्तर के मनुष्य थे।

इस राष्ट्र के लिए जिसने भी अपने प्राण दिए हैं, उनके लिए शीश झुकना चाहिए। राष्ट्र के लिए जिस माँ ने भी अपना बेटा दिया हो, वही राष्ट्रमाता है। हर वह पिता राष्ट्रपिता है, जिसने अपने कंधे पर अपने सैनिक पुत्र की अर्थी उठाई है। उनके लिए हृदय में हमेशा सम्मान होना चाहिए... यही पुलवामा के वीरों के लिए श्रद्धांजलि होगी... हम ऋणी हैं उनके, राष्ट्र ऋणी है उनका...


सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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