चार गंजेड़ी (व्यंग्य) तस्वीर का लेख से कोई सम्बन्ध नहीं।

चार गंजेड़ी (व्यंग्य)  तस्वीर का लेख से कोई सम्बन्ध नहीं।

किसी गाँव में चार गजेड़ी(गाँजा के पियक्कड़) रहते थे। गंजेड़ी सामान्यतः बुद्धिजीवी होते हैं। ये चारों भी घोर बुद्धिजीवी थे। एक बार चारों ने सोचा कि क्यों न किसी मंदिर-मठ पर रहा जाय, आराम से पड़े पड़े मालपुआ खाएंगे और गाँजा का दम लगाएंगे।

चारों में बात तय हो गयी। चारो अपने मन के राजा थे। 'आगे नाथ न पीछे पगहा' की स्थिति थी, सो किसी से पूछने या आज्ञा लेने का कोई झंझट ही नहीं था। अगले ही दिन घर से निकल जाने की योजना बनाई गयी। चारों ने बाजार से तिलक क्रय कर माथे पर लपेट लिया, जनेव क्रय कर पहन लिया। तभी अचानक उन्हें सूझा, 'मन्दिर पर रहने के लिए धोती भी तो पहननी होती है।' अब तो बड़ा झंझट हो गया, क्योंकि धोती किसी को पहननी नहीं आती थी। चारों ने बुद्धिजीवी कहलाने के लिए जीवन भर मन्दिर और पुजारियों को भला-बुरा कहा था, पुरानी जीवन शैली को मूर्खता बताया था, सो धोती-कुर्ता से कभी मेल ही नहीं बैठ पाया था। अब एकाएक धोती पहनना कहाँ से सीखते? उनके समक्ष गहरा संकट आ गया था।

गंजेड़ीयों का एक सामान्य गुण है, वे जब दम लगा लेते हैं तो स्वयं को जगत का सबसे होशियार प्राणी समझने लगते हैं। ये चारों तो गंजेड़ी के संग-संग बुद्धिजीवी भी थे, ये भला क्यों हार मानते? सो चारों ने ठान लिया कि रात भर में ही धोती पहनना सीख लेंगे।

चारों में जो सबसे अल्प आयु का गंजेड़ी था वह कवि था। हालांकि उसका शब्द विन्यास अत्यंत घटिया स्तर का होता था और वह कविता में मलाला का तुक हलाला से मिलाया करता था, पर स्वयं को आधुनिक कविता का सबसे बड़ा कवि मानता था। उसने कहा- "क्यों न धोती को नए ढंग से पहना जाय! सारे मूर्ख कमर में धोती को लपेटते हैं, हम धोती में कमर को लपेटेंगे। इससे प्रगतिशीलता भी झलकेगी।"

मित्रों ने खूब वाह-वाह की, उन्हें यह ढंग बड़ा पसन्द आया था। अब मित्रों ने धोती में कमर को लपेटने के लिए ढंग निकाला। दो गजेड़ीयो ने हाथ में पकड़ कर धोती को गोल लपेट लिया तो तय किया कि तीसरा गंजेड़ी चौथे गंजेड़ी को गोद मे उठा कर लपेटी गयी धोती में ऊपर से डाल दे।

अब दुर्भाग्य से जिस गंजेड़ी को उठा कर धोती में डाला जाना था वह तनिक भारी था, और जो उठा रहा था वह दुबला-पतला मरियल। फिर क्या था, जैसे ही मरियल गंजेड़ी ने भारी गंजेड़ी को उठाया, उसे लिए हुए ही धड़ाम से गिरा और साथ ही धोती पकड़ कर खड़े हुए गंजेड़ी भी गिर गए। चारो गंजेड़ी चारो खाने चित्त पड़े थे।

कुछ देर बाद चारो कराहते हुए खड़े हुए औऱ कवि गंजेड़ी को खूब गालियां दी। अब धोती पहनने की युक्ति बताने की बारी दूसरे गंजेड़ी की थी। दूसरा गंजेड़ी लेखक था। वह अंग्रेजी के लेखों से चोरी कर के लिखता रहता था। कुछ अलग करने के चक्कर में वह यूपी बिहार के देहाती पात्रों के नाम भी विक्टर, फोतोव, चें-फो आदि रखता था। उसने देर तक सोचने के बाद कहा- "सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम धोती को जमीन पर बिछा दें और एक तरफ उसी पर लेट जाएं। उसके बाद लुढ़कते हुए धोती को देह में लपेटते जांय। इस तरह किसी को ऊपर उठाने का झंझट भी नहीं रहेगा, और बिना हाथ-पैर तुड़वाये हम धोती भी पहन लेंगे।"

मित्र इस युक्ति पर धन्य धन्य कर उठे, किन्तु धोती पर लेट कर लुढ़कने का रिस्क कोई लेना नहीं चाहता था। तीनों मित्रों ने लेखक को ही धोती पहन कर दिखाने की जिम्मेवारी दी। लेखक पूरे ताव में था, वह झटपट धोती बिछा कर उसके किनारे लेट गया और लुढ़कने लगा। अब पता नहीं लेखक का अंदाज गड़बड़ निकला या लुढ़कने में गलती हो गयी, लेखक धोती में कुछ इस तरह लिपट कर फँस गया जैसे किसी लाश को बांध दिया गया हो। लेखक का हाथ, पैर, मुँह सब बुरी तरह दब गया था, वह उसी में फँस कर गोंय-गोंय करने लगा। शेष तीन गंजेडीयो को धोती खोलने का कोई अनुभव तो था नहीं, वे जितना खोलने का प्रयास करते धोती उतनी ही फँसती जाती थी। उधर लेखक छटपटा कर चीख रहा था। किसी तरह बहुत उठा-पटक करने बाद धोती खुली, तबतक लेखक का मुह लाल हो गया था। किसी तरह उसके प्राण बचे...

मित्रों ने लेखक की युक्ति को भी नकार दिया।

अब तीसरे गंजेड़ी की बारी थी। तीसरा गंजेड़ी इतिहासकार था। वह वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक के किसी भी व्यक्ति के माता-पिता का नाम बता सकता था। पर उसकी एक कमजोरी थी, वह स्वयं को इस जगत का एकमात्र ज्ञानी व्यक्ति समझता था और इसी चक्कर में हमेशा लोगों को गालियां देता फिरता था। उसने कहा- क्यों न हम धोती को ऐतिहासिक ढंग से पहनें? मैंने अपने चचिआउत फूफा के मौसीआउत भाई की लाइब्रेरी में एक किताब देखी थी जिसमें लिखा था कि प्राचीन युग मे लोग धोती को कमर में नहीं बल्कि माथे पर बाँधते थे। मैं चाहता हूँ कि हमें उसी पद्धति से धोती पहननी चाहिए।

मित्रों ने इतिहासकार गंजेड़ी की जयकार लगाई और उन्हें धोती पहनने को कहा। इतिहासकार ने झट से अपना सारा वस्त्र उतारा और माथे पर धोती बांध ली। उसकी तीव्रता पर मित्र लहालोट हो गए। देखने में भी उसकी धोती किसी नवाब की पगड़ी जैसी लग रही थी, पर शरीर का निचला हिस्सा सूना-सूना लग रहा था। मित्रों को धोती पहनने का ढंग पसन्द तो आया पर उन्होंने इस पद्धति से धोती पहनने से इनकार कर दिया।

तीसरा गंजेड़ी इतनी सरलता से पराजय स्वीकार करने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने दूसरी युक्ति सुझाई। कहा, "क्यों न हम धोती आगे की जगह पीछे से पहनें? धोती का फेटा पीछे बाँधा जाय और पीछे बाँधे जाने वाले पोंछिटा को आगे की ओर बाँधे। "

मित्र अबकी भी सहमत थे। यह तरीका सुनने भी दुर्घटना-मुक्त लग रहा था, सो चारों ने एक साथ ही धोती पहनने का निर्णय लिया। चारों ने धोती में चून लगाया और पीछे की ओर लपेट दिया। अब पोछिटा बांधने की बारी थी। पोछिटा पीछे बाँधने के लिए पैर को घुटने पर से पीछे की ओर मोड़ना पड़ता है, अब यदि आगे बाँधना हो तो पैर को घुटने पर से आगे की ओर मोड़ना होगा। आदमी कितना भी ज्ञानी क्यों न हो, वह अपने पैर को घुटने पर से आगे की ओर नहीं मोड़ सकता। अब ये चारों तो गजेड़ी थे, चारों ने पैर को घुटने से आगे मोड़ने के लिए बल लगाया और समान गति से समान समय मे ही धड़ाम से गिरे। गिरने के साथ साथ एक काम और हुआ, इतिहासकार को छोड़ कर शेष गंजेडीयो ने एक सुर में गरियाया- भों.....

अब अंतिम गंजेड़ी की बारी थी। वह इन चारों में सबसे बुजुर्ग था। कहा गया है कि नई तवायफ और बुड्ढे वामपंथी का भाव अधिक होता है। इस बूढ़े गंजेड़ी की बुद्धिजीविता भी अतिप्रसिद्ध थी। उसने देर तक सोचने के बाद कहा- "धोती पहनने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि हम पैर ऊपर और सर नीचे कर के धोती पहनें। दो व्यक्ति धोती पहनने वाले को उल्टा कर के पकड़ लें और तीसरा उसकी कमर में धोती लपेट दे।"

वैसे तो बार बार गिरने पड़ने के कारण अब किसी के अंदर धोती पहनने की इच्छा थी नहीं, पर बुड्ढे गजेड़ी की बात काट सकने का साहस भी किसी के पास नहीं था। सो झट से दो गजेड़ीयो ने बुड्ढे की टँगड़ी पकड़ी और उल्टा खड़ा कर दिया। चौथे गंजेड़ी ने उसके कमर में झट से धोती लपेट दी। पर यहां एक गड़बड़ी हो गयी। चौथा गजेड़ी ज्यों ही धोती को छोड़ता, झट से धोती नीचे की ओर लटक कर बुड्ढे गजेड़ी के मुह पर लटक जाती। धोती मुह पर आने पर बुड्ढ़ा गजेड़ी गालियां देने लगता था, सो चौथा गजेड़ी झट से धोती को पकड़ कर ऊपर कर देता। इस तरह बार बार धोती ऊपर की जाती, पर छोड़ते ही नीचे आ जाती और बुड्ढ़ा गाली देने लगता। गालियों से ऊब कर अंत में तीनों गजेड़ीयो ने समवेत स्वर में बुड्ढे की तीन पुश्तों को पुकारा, और एक ही साथ लात चला कर उसका अंतिम अभिवादन कर दिया।

चारों गंजेड़ी रात भर यूँ ही कमरे में भूमि पर पड़े रहे। अगली सुबह जब वे जगे तो उन्होंने मन्दिर पर रहने का विचार त्याग दिया था।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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