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हम ईहाँ बिआह करे आये हैं कि पेशाब...हद्द है एकदम्मै .. का घरभर के सबूत चाही

हम ईहाँ बिआह करे आये हैं कि पेशाब...हद्द है एकदम्मै .. का घरभर के सबूत चाही

कुछ सच्ची घटनाएं ऐसी होती हैं जिसके प्रकाशन का एक माकूल वक्त खुदबखुद चला आता है-

एक सज्जन के बिटिया का बिआह था. बारात जनवासे पर पहुंच गई. बारात के स्वागत-सत्कार के बाद लड़की के पिता दुल्हे के समक्ष बैठे और इधर-उधर की तमाम बातों के बाद दुल्हे से बोले- " ए पहुना!जाईं तनि लघुशंका कर लीं"

दुल्हा ने अपने ससुर की बात सुन कर बोेला- "अबहीं लगल नाहीं बा बाबूजी"

लड़की के पिता- "जायीं कोशिश करब त जरूर कुछ शंका उतरी"

दुल्हा- " ना बाबूजी जरको ना लगल बा".

लड़की के पिताजी कुछ देर और हालचाल लेकर पुनः उसी अनुरोध पर लौटे आये.." बाबू देखीं एकरे बात रऊरा के मौका ना मिली..गाड़ी में बइठले के बाद उतरते द्वारपूजा फिर जयमाल... चार घंटा ले एतना मनई घेरले ररहीहैं कि रऊरा के उठतै ना बनी.

दुल्हा- "अरे कवनो बात न बाबूजी द्वारपूजा के बाद हम लपककर कहीं हो लेंगे आप जरको न चिंता करें।"

भावी ससुर- "बाबू दुआर पर ऐतना अजोर है कि जगह नाहीं मिली.. उप्पर से एतना मेहरारू कि आप लाजन न कहीं खड़ा हो पाईब। अ शेरवानी और सलवार खोल कर हर जगहीं बइठलो न जायी..एहीं हों लीं पहुना.

दुल्हा खीजकर.." आप परेशान न होईं बाऊजी अब हम विदाई के बादे हल्लुक होब"

लड़की के पिता जब सारी हिकमत लगाकर फेल हो गये तो पसीना पोछते हुए पाण्डाल में टहलने लगे. अपने जीजा को हैरान-परेशान देखकर लड़की के मामा उनके पास पहुंचे.

"का बात है जीजा.. परेशान लगत बांटीं"

लड़की के पिता (अधीर होकर) - " हां यार दुल्हवा त लघुशंका करे जाते नाहीं बा.बड़ी जोगाड़ लगा के देख लेहलीं.

लड़की के मामा-अच्छा रुकीं हम जात बानीं

लड़की के मामा दुल्हे के पास पहुंच कर-

" नमस्ते पहुंना! हम लड़की क मामा"

" नमस्ते मामा जी"

"नाश्ता-पानी हो गईल"

" हाँ मामाजी"

"पानी पीये हैं न हींकभर"

" पिये हैं मामाजी..तब से तीन गिलास पी चुके"

"और पेशाब !" मामाजी ने जुबान दबाकर पूछा.

दुल्हा (झल्लाकर)- " क्या 'पेशाब-पेशाब' किये हैं घर भर, हम ईहाँ बिआह करे आये हैं कि पेशाब...हद्द है एकदम्मै ..

लड़की के मामा- " पहुना! खिसियाई न राऊर, आप इ समझीं कि हमरे जीजा बहुत परेशान बानीं. दरअसल भईल इ कि हमरे भगिनी क आप से पहिले ए ठो अऊर बिआह तय रहल.. सब तय-तमाम, सट्टा बयाना होइले के बाद खबर भयल कि लरिका में सब रहल लेकिन अभाग देखीं कि मूत्र-टोटी नदारद रहल....पहुना ! गाँंव-जवार में बड़ी बदमानी भईल. हमे जीजा महीन्ना न गाँव में निकलल बंद करी देहलं. आप समझीं कि हमरे जीजा क बस एतना तमन्ना बा कि द्वार पूजा से पहिले उनके इ खबर मिल जाये कि आप बाहर- भित्तर दूनो से पोख्ता बानीं ..आप मनबें नाहीं कि ए मैदनवा में तीन ठो वेटर पानी पियावे के खातिर बानें और तेरह मनई केवल इ अगोरत बानं कि राऊर लघुशंका के जायीं और घर में इ खबर पहुंचे कि पहुना 'बंदूक लेके आईल हवं'.."

दुल्हा- "मामाजी सीधे- सीधे बोलीं न कि आप सब घरभर के सबूत चाही"

रिवेश प्रताप सिंह

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