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सहोदर...


वर्षों छोटी अदालतों में काम करने के बाद अंततः प्रमोशन पाकर जिला जज के यहां पेशकार हो गए डबलू पाँड़े । सो इस बार जब गाँव पधारे तो रंग - ढंग और मोटरसाइकिल नया - नया लग रहा था ।

फराकित होकर लौट रहे मास्टर सुरेश पाँड़े की नजर उन पर पड़ी तो पूछ बैठे - " का रे डबलू ! खूब तरक्की पा गये बचवा ? "

डबलू पाँड़े मुस्कुराये और उनके साथ ही गाँव की ओर बढ़ने लगे । मास्टर साहब ने ताड़ लिया कि मामला कुछ गड़बड़ है । 200 रुपये के इंक्रीमेंट पर जो आदमी बड़े भाई महँगू के हाथों 2000 का लड्डू बंटवा देता है वो आज प्रमोशन और नई मोटरसाइकिल के बावजूद अगर इतना शांत है तो इसके पीछे जरूर कोई बड़ी वजह होगी । अतः पूछ लिया - " तबियत ठीक नहीं है क्या बिटवा ? "

डबलू पाँड़े जैसे इसी प्रश्न की बाट जोह रहे थे । मास्टर काका को अँकवार में पकड़ लिया और चिल्ला - चिल्ला कर रोने लगे ।

सुरेश पाँड़े सन्न थे - "अरे बताओ तो क्या बात है ? अइसे अधीर थोड़े न होते हैं ?"

काका के गमछे से ही आंख पोंछ डबलू ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया - '' कल घर आया तो दो किलो काजू , अखरोट , बादाम और किशमिश लेता आया कि भैया खाएंगे तो उनकी सेहत में सुधार आएगा । बीमारी में एकदम टूट से गए हैं । टिंकिया कि अम्मा के लाख मना करने के बावजूद अगले हफ्ते एम्स में दिखाने का जुगाड़ भी कर लिया था । लेकिन सुबह क्या देखता हूँ कि सारा काजू - किशमिश मोहल्ले के बच्चों में बैना की तरह बाँटा जा रहा है । यह देखकर मेरा तो खून जल गया था काका । आव देखा न ताव , भैया को चौकी पर से उठाकर पटका और दो मुक्का पीठ पर जड़ दिया "....कहकर डबलू पाँड़े फिर रोने लगे ।

सुरेश पाँड़े भौचक्के से देखते रहे -" बड़े भाई को कोई पीटता है क्या ? और तुम दोनों के लिए तो राम - लक्ष्मण की मिसाल दी जाती है गाँव में ?"

अब बबलू पाँड़े वहाँ न रुक सके , दौड़ते हुए घर पहुँचे । देखा कि बड़े भाई महंगू पाँड़े अभी भी वहीं पड़े हुए हैं जहाँ पीटे गए थे । जाकर उन्हें उठाया , कपड़े झाड़ कर उन्हें फिर से चौकी पर बिठाते हुए बोले - " माफ कर दो भैया ! ज्यादा चोट तो नहीं लगी ?"

बीमार महँगू ने अपनी शक्ल अब तक नाराज बच्चों जैसी बनाई हुई थी , सुना तो चौकी पर लेट गए । डबलू पाँड़े उसी दम भीतर गए और सरसो का तेल गरम कर लाये । पूरे बदन में मालिश करने के बाद बोले - " भैया माफ कर दो ना ! , अब कान पकड़ कर कहता हूँ कभी नहीं मारूँगा"

महँगू अब भी गुस्से में ही थे , मौन रहे । डबलू चाय बना लाये , उनकी तरफ बढ़ाया तो गिलास पकड़ कर चौकी पर एक किनारे रख दिया और घूरते हुए बोले - " पावरोटी नहीं खिलायेगा ?"

अब तक थोड़े निराश डबलू पाँड़े ने भाई की बात सुनी तो दौड़ते हुए बनिये की दुकान पर गए और दो पावरोटी खरीद लाये । आकर देखते हैं कि आधी चाय एक कटोरी में निकाल कर महँगू पाँड़े ने पड़ोसी दुखारी की विधवा को दे दिया है , बुढ़िया वहीं नीचे बैठकर बड़े प्रेम से चाय सुड़क रही थी । कुछ नहीं बोले , पावरोटी महँगू पाँड़े को पकड़ाया और भीतर चले गए ।

डबलू पाँड़े का मन आज ग्लानि से भरा हुआ है । कहने को तो दो पुत्रों के पिता हैं विधुर महँगू पाँड़े लेकिन खेती - बाड़ी सब बेंचवा कर दोनों शहर में खुद को स्थापित कर चुके हैं । बिक तो यह छोटा सा मकान भी जाता लेकिन डबलू पाँड़े ने जबर लोहा लिया और साफ - साफ कह दिया - " अगर यह सोचते हो कि मैं भैया की संपत्ति हड़पने की वजह से अड़ंगा लगा रहा हूँ तो खर्चा मैं देता हूँ , जाकर अपने नाम रजिस्टर्ड वसीयत करवा लो , लेकिन भैया के जीते जी यह मकान नहीं बिकने दूँगा । "

लड़के भुनभुनाते हुए चले गए थे । महँगू पाँड़े के लिए बनाने - खिलाने वाली की तनख्वाह व दवाइयों के खर्च से टिंकिया की अम्मा भी डबलू पाँड़े पर कम नहीं भुनभुनाती थी , लेकिन सारे अवरोधों के बावजूद सनिवार की शाम को जब डबलू पाँड़े गाँव के लिए निकलते तो उनका उत्साह देखते ही बनता था । रविवार को बड़े भाई की मालिश , उनको मल मल के नहलाना , उनका मनपसंद खाना बनवाना डबलू पाँड़े के लिए किसी उत्सव से कम न था । कल घर से जब निकले थे तो टिंकिया की अम्मा से खूब लड़ाई हुई थी ,उसने गुस्से में कह दिया था - "जाने कब इस बिपत से छुटकारा मिलेगा ?"...डबलू पाँड़े का मन तो हुआ कि मोटरसाइकिल से उतर कर दो कंटाप बजा दें लेकिन सह कर आगे बढ़ गए थे । दिमाग पहले से खराब था और आज महँगू पाँड़े को मेवे बाँटते देखा तो गुस्सा उन्हीं के ऊपर फुट पड़ा । अब पछता रहे हैं और आँखों से अश्रुधारा बही जा रही है ।

दुखारी की विधवा भीतर आकर बोली - " ये बाबू ! भैया तुमको बुला रहे हैं "

आँसू पोंछ बाहर गए तो महँगू बैठे मुस्कुरा रहे थे , बोले - " आजकल खाता - पीता नहीं है क्या ?, मैं बीमारी में हूँ लेकिन तुझे दो मुक्के जड़ दूँ तो हिल नहीं पायेगा"...कहकर ठहाका लगाया

डबलू दौड़कर आये और बड़े भाई से लिपट गए , फूट -फूट कर रोते हुए बोले - " माफ कर दो भैया ! मैं बहुत बड़ा पापी हूँ "

महँगू ने भी उन्हें कस कर जकड़ लिया था , उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए बोले - " मुझे इसका जरा भी दुःख नहीं है पगले ! , अब अगर तू चुप न हुआ और दुबारा माफी माँगी तो जरूर दुःख होगा "

दोनों भाई बड़ी देर तक ऐसे ही गले लगकर बैठे रहे । अचानक महँगू पाँड़े का हाथ छोटे भाई के कंधे से सरक कर नीचे झूल गया , डबलू पाँड़े सशंकित हुए , बड़े भाई को पकड़ कर धीरे से अलग किया तो देखा कि चेहरे पर असीम संतुष्टि लिए महँगू पाँड़े संसार से विदा हो चुके हैं । जोर से चिल्लाए - " अब कौन सा मुँह लेकर गांव आऊँगा ये भैया ?"

Ashish Tripathi

गोरखपुर

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