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जेकर पियवा बसे परदेस सखी

जेकर पियवा बसे परदेस सखी
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वैसे टाई आज भी सही से बंध तो नहीं पाई थी लेकिन बिल्लू और झिनकी को उनके अँग्रेजी मीडियम वाले स्कूल ड्रेस में देख के धनेसरी का हृदय गर्व से उन्नत हुआ जा रहा था ।

दोनों बच्चों की बाहें पकड़े घर से बाहर निकली तो दरवाजे पर कुंडी लगाते हुए , कुएं पर बर्तन मांज रही प्रभावती को सुनाकर बोली - थोड़ा जल्दी जल्दी कदम बढ़ाओ तुम लोग ! कोई देहाती स्कूल में थोड़े ही नाम लिखाया है । मोटी फीस वाला अंगरेजी स्कूल है , वहाँ टाइम से जाना पड़ता है , और खनडिब्बा रख लिया है ना ? वो देहाती स्कूल थोड़े है जहाँ खिचड़ी के भरोसे बच्चों को छोड़ दूँ ।

बच्चे मौन रहते हुए आगे बढ़ गए लेकिन पड़ोसन प्रभावती को नवसमृद्ध धनेसरी की बातें अच्छी नहीं लगीं थीं शायद , झटके से उठी और अपने घर की तरफ बढ़ी ही थी कि साड़ी का पल्लू पानी भरी एल्मुनियम की बाल्टी में कहीं फंसा और एक कोना चर्र की आवाज के साथ शेष साड़ी से विदा हो लिया ।

धनेसरी अपने उद्देश्य की सफलता पर मुग्ध बच्चों को साथ लिए एक किलोमीटर दूर कस्बे के प्राइवेट स्कूल में छोड़ने के बाद गेट से बाहर आई तो उसकी नजर सड़क के उस पार बनारसी साड़ी भंडार के उठते शटर पर पड़ी ।

दुकानदारों में ग्राहकों को पहचानने की अद्भुत कला होती है , अतः अपनी दुकान की ओर देख रही धनेसरी को सेठ ने पुकारा - आ जाओ बहन जी ! अभी कल ही नये फैशन की साड़ियों का गट्ठर आया है , शुरुआत आपके हाथ से बोहनी कराकर करता हूँ ।

थोड़ी झिझक तो हुई लेकिन धनेसरी सेठ के आमंत्रण को अस्वीकार न कर पाई और दुकान में बिछी मैली सी जाजिम पर अपना आसन जमा लिया ।

सेठ ने एक से बढ़कर एक साड़ियां दिखानी शुरू की , जिनमें से दो तो उसे इतनी पसन्द आईं कि कीमत अधिक होने के बावजूद उसने उन्हें अलग रखवा लिया था । सेठ उत्साहित था और चार साड़ियों की खरीद पर एकमुश्त 500 के डिस्काउंट का प्रलोभन देते हुए और साड़ियां दिखाए जा रहा था । तब तक बगल में स्थित चंदू नाई की दुकान से आ रहे भरत शर्मा के गाने की टेर धनेसरी के कानों में पड़ी -

जेकर पियवा बसे परदेश सखी

ओकर ससुरा ले नीक नइहरवे बा , जेकर .......

धनेसरी के चेहरे का रंग एकदम से फीका हो चुका था , छाँट के अलग की हुई दोनों साड़ियों को उसने जाजिम पर फैली बाकी साड़ियों में मिला दिया और उठकर बाहर निकल गई , सेठ रोकता रहा , चिल्लाता रहा , सुबह सुबह बोहनी खराब होने पर खरी खोटी भी बोला मगर धनेसरी नहीं रुकी ।

चौराहे से कुछ सब्जी लेने थी लेकिन रुकने का मन नहीं हुआ और सीधे घर ही पहुंची । प्रभावती सुबह कोई जवाब नहीं दे पाई थी जिसके कारण उसके पेट में गैस बन गया था , अतः उसे देखते ही काम पर जा रहे अपने पति नारद से बोली - मरद को कोल्हू का बैल बनाकर मुझे राज नहीं करना है जी ! गांव में भले ही कम मजूरी मिलती हो लेकिन अपने बाल बच्चों के साथ तो रहते हो , शाम को आते वक्त पुड़िया वाला ठंडा तेल लेते आना ,कई दिन हो गए आज तुम्हारी मालिश कर दूंगी ।

धनेशरी ने सुना तो आंख भर आई थी , लेकिन कुछ बोली नहीं । दरवाजा खोल अंदर आई और बिस्तर पर गिर गई , उसकी आँखों मे बहुत दिन बाद आंसुओं की बारिश आई थी अतः आसुओं ने सूनी आंखों वाली उसकी पलकों को लांघने में कुछ ज्यादा ही वक्त लिया । उसे खूब अच्छे से याद है कि बैजू के बाहर जाते वक्त भी उसकी आंखों में आँसू नहीं आये थे ।

याद आ गया उसे वो दिन जब खाने बैठे बैजू ने अचानक रुमाली दीदी और जीजा जी को अंदर आते देखा था तो भात और लहसुन मिर्च की चटनी वाली थाली को अपने पीछे छुपाने का असफल प्रयास करते हुए पकड़ा गया था और जब रुमाली दीदी ने व्यंग मारते हुए कहा कि - अरे खाइये भइया , हम लोग भी जब पार्टियों और होटलों के खाने से ऊब जाते हैं तो घर में महाराज से कहकर जबरदस्ती यही सब बनवाते हैं ।

जीजा जी भी चुप न रह सके थे , और वहीं बैजू के बगल में मिठाई का बड़ा डिब्बा रखते हुए बोले - और नहीं तो क्या ? अभी पिछले साल ही तो तुमने बनवाया था शायद ...

खाना छोड़कर आंगन में हाथ धो रहे बैजू पर उस वक्त धनेसरी को खूब गुस्सा आया था ....बोली - अरे दीदी ! मेरे भाग में तो रोज ही यही खाने को लिखा है , ये तो कहो बच्चों के भाग्य से ये भी मिल जाए रहा है , वरना 4000 रुपल्ली की तनख्वाह और इस महंगाई के जमाने मे किसी का गुजारा हो पाया है भला ?

बैजू कुछ बोला नहीं था बल्कि दीदी और जीजाजी के पांव छूकर सेठ धनीराम के धर्मकांटे पर तौलबाबू की अपनी ड्यूटी बजाने चला गया ।

उसके जाने के बाद फ्रूटी के डिब्बे बिल्लू और झिनकी को पकड़ाते हुए रुमाली दीदी ने पूछा था - इन्हें स्कूल नहीं भेजती क्या ? इतने फूल से सलोने बच्चों को यूँ घर बिठाकर इनका जीवन क्यों बर्बाद कर रही हो ?

तब तक धनेसरी दो गिलास में पानी और जीजाजी के लाये मिठाई के डिब्बे में से दो मिठाईयां एक कटोरी में निकाल उनके सामने रख चुकी थी ।

बच्चे भी मिठाई के लिए जिद करने लगे तो उन्हें एक एक मिठाई देकर खदेड़ने के बाद बोली - स्कूल दस बजे लगता है न दीदी ! यहीं घर के पास ही है तो अभी जाएंगे सब ।

जीजा जी मिठाई में से एक बहुत छोटा सा टुकड़ा खाकर अपनी लाई बोतल से पानी पीने के बाद आश्चर्यचकित भाव से बोले - हे भगवान ! तुम लोग उस घटिया सरकारी स्कूल में पढ़ाते हो क्या बच्चों को ?

तब तक रुमाली दीदी उन्हें घूरते हुए बोली - तो क्या करे बेचारी ? अच्छे स्कूलों की फीस बैजू भैया दे पाएंगे भला ?

धनेसरी कुछ न बोली , जीजा जी ने अपने रुमाल से हवा करते हुए कहा - मैं तो कितनी बार उससे कह चुका हूँ कि आ जाओ हैदराबाद , वहां मेरा अच्छा खासा बिजनेस है , शुरुआत में 12000 मिलेंगे और बाद में बढ़ाता रहूंगा , लेकिन मेरी सुनता कौन है ?

रुमाली दीदी को पति की बात अच्छी लगी - हाँ धनेसरी ! तू समझाती क्यों नहीं बैजू भैया को ? ऐसे कैसे चलेगा ?

खैर छोड़ हमारा यहाँ का मकान बनकर तैयार हो गया है जिसका अगले शुक्रवार को गृहप्रवेश है उसमें तुमको , बैजू भैया को और बच्चों को जरूर आना पड़ेगा ।

थोड़ी देर बाद लोग जाने लगे तो रुमाली दीदी ने रुककर धनेसरी को 2000 का नोट देते हुए कहा था - थोड़े ठीक ठाक कपड़े पहन कर आना तुम लोग , वहां सारे बड़े लोग आएंगे , तो उनके बीच तुम लोगों की वजह से बेइज्जती न हो हमारी ।

उस दिन शाम को धनेसरी ने चूल्हा नहीं जलाया था , बैजनाथ घर आया तो धनेसरी को बिस्तर पर पड़ा देख माजरा समझ गया था , हंसते हुए बोला - क्या हुआ ? आज फिर तुम्हारी दीदी जीजा ने तुम्हारी गरीबी का मजाक उड़ा डाला क्या ?

धनेसरी का खून खौल उठा था - तुम्हें क्या लगता है ? तुम्हारी दरिद्रता की शान में कसीदे पढ़े जाएंगे ? जबसे यहाँ ब्याह के आई हूँ जीवन नरक कर रखा है तुमने । तुम्हारी सरकारी नौकरी की तैयारी न जाने कब पूरी होगी ? कहीं ऐसा न हो कि उसके पहले ही मेरे बच्चे भूखों मर जाएं । जीजाजी जब 12000 रुपये की नौकरी देने को बार बार कहते हैं तो क्यों नहीं जाते ?

बैजू ने देखा कि मामला गंभीर है तो प्रत्युत्तर देना उचित न समझा , और कपड़े बदलकर बच्चों को पढ़ाने के लिए बैठ गया । लगभग एक घण्टा गुजर गया , बच्चे ऊँघने लगे थे , लेकिन धनेसरी अपने जगह से हिली नहीं ।

बैजू प्रथम श्रेणी में विज्ञान स्नातक था , कई बार वो विभिन्न पदों हेतु इंटरव्यू तक पहुंच चुका था लेकिन सफलता उसे अभी तक मिल न पाई थी , महत्वाकांक्षी बैजू ने अभी हिम्मत न हारी थी , उसे विश्वास था कि एक न एक दिन वो अवश्य सफल होगा । सेठ धनीराम की नौकरी वो इसीलिए करता था कि वहाँ खाली समय में उसे अपनी तैयारियों के लिए कोई रोक टोक नहीं थी और समय से घर आकर यहां भी तैयारी कर ले रहा था ।

बच्चे भूखे ही सो गए थे , धनेसरी अब भी रह रह कर अपने दुर्भाग्य का रोना रो रही थी । बैजू अब भी कुछ न बोला , अपनी चारपाई उठाई और बाहर डालकर लेट गया इस विश्वास के साथ हर बार की तरह इस बार भी सुबह तक धनेसरी का गुस्सा शांत हो जाएगा ।

इस बार धनेसरी का क्रोध शांत होने वाला नहीं था , सुबह भी उसे भोजन का कोई प्रबन्ध न करते देख बैजू ने गांव की दुकान से चाय और ब्रेड लाकर बच्चों को दे दिया , एक गिलास चाय धनेसरी की तरफ बढ़ाया तो उसने चाय समेत वही गिलास बैजू के मुंह पर फेंक दिया ।

शान्त हृदय बैजू के लिए धनेसरी का यह रूप अप्रत्याशित और असहनीय था , जी में आया कि एक जोरदार थप्पड़ कान के नीचे बजा दे लेकिन मुहल्ले में वो अपना तमाशा नहीं बनवाना चाहता था ।

हाथ मुंह धोकर उसने कपड़े बदले और धनेसरी से बोला - मानता हूँ कि मुझसे शादी के बाद तुम्हारा जीवन नरक हो चुका है , मैं तुम्हे महंगे भोजन और कपड़े नहीं दिला पा रहा , मेरे बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में नहीं पढ़ पा रहे लेकिन इन सात सालों में मेरा यही प्रयास रहा है कि तुम लोगों को इसके बदले वो सुख दूँ जिसकी कल्पना भी तुमने न की हो । तुम्हें यदि लगता है कि 12000 रुपये महीने से तुम्हारी जिंदगी एकदम से बदल जाएगी तो अब यही सही । लेकिन रिश्तेदारों से एहसान लेना मेरे आत्मसम्मान को गंवारा नहीं , इस योग्य हूँ कि अगर घर छोड़ के किसी भी शहर में जाऊँ तो तुम्हारी इस क्षणिक अभिलाषा को पूरा कर सकता हूँ , जाता इसलिए नहीं था कि मुझे लगा था कि मेरे प्रयासों में तुम मुझे आत्मबल दोगी, किन्तु मैं गलत था , अतः मुझे माफ़ करना , और हाँ बच्चों का ख्याल रखना , 12000 तुम्हें हर महीने मिलते रहेंगे ।

इतना कहकर बैजू चला गया था , मुड़ के देखा भी नहीं ।

इन यादों में खोई धनेसरी की तंद्रा मोबाइल की घण्टी बजने से टूटी , ये बैजू का नम्बर था , फोन उठाया तो भावुक हो उठी , उधर से बैजू हैलो हैलो कर रहा था और इधर धनेसरी फूट फूट कर रोये जा रही थी , कुछ सहज हुई तो बोली - मुझे माफ़ कर दो बिल्लू के बापू ! मुझे नहीं चाहिए 12000 रुपये हर महीने , मैं 4000 में काम चला लूंगी , लेकिन भगवान के लिए तुम घर आ जाओ ।

फोन पर कुछ देर खामोशी छाई रही , फिर बैजू की आवाज आई - अब मेरा आना सम्भव नहीं पगली ! भगवान को भी शायद ये मंजूर नहीं कि मैं गांव वापस आऊं । अलबत्ता टिकट भेज दिया हूँ , एक दो दिन में तुम्हें मिल जाएगा, 7 तारीख की ट्रेन है । बच्चों को साथ लेकर चली आना , अब यहीं सरकारी आवास में रहेंगे , तुम्हारा पति अब सरकारी अफसर बन चुका है ।

फोन कट चुका था , लेकिन धनेसरी की अश्रुधारा रुक नहीं रही थी , उसके रोने का क्रम पता नहीं कब तक जारी रहता यदि उसकी नजर दीवाल घड़ी पर नहीं पड़ती ....बच्चों को स्कूल से लेने का समय हो चुका था ।

आशीष त्रिपाठी

गोरखपुर

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