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आपकी क़सम..!

आपकी क़सम..!

एक सुशिक्षित ग्रामीण महिला का गँवारों के बीच पहुंच जाना पता नहीं उसका दुर्भाग्य है या नहीं, किन्तु इतना तो तो सत्य है कि उस समाज का सौभाग्य होता है। ऐसे ही था " सेखुई गाँव " और उस गाँव में कुछ माह पूर्व ब्याह के आई ललिता का सम्बंध।

राज्य सरकार की घोषणा सुनने के बाद कि , सभी प्रवासी कामगारों को उनके घर सरकारी व्यवस्था से वापस बुलाया जा रहा है, खबर की सुगबुगाहट गाँव में तेज हो चुकी थी। ललिता टोले की सभी महिलाओं के साथ मुखिया के दुआर पर आके तड़के ही आठ बजे पहुँच गई। सभी महिलाएँ, कोई अपने पुत्र तो कोई अपने पति की वापसी के लिए विह्वल थी। ललिता भी अपने पति मनोज के आने न आने के आशंकाओं में अधीर हो रही थी।

सभी ने अपनी-अपनी बातें रखी....अब बारी थी ललिता की...!! "ए मुखिया भैया उहाँ के अहमदाबाद रहेनी , खाए पिये कवनो ठेकाना नइखे....उनको के बोलवा लीं भइया "

भावुकता में विनय का भाव लिए ललिता बोली।

"लेकिन आपको पता है, वहाँ से आते समय रास्ते में खतरा है स्वस्थ लोगों को भी संक्रमित होने का"।

व्यवहारिक सा उत्तर दिया मुखिया ने..!!

"नहीं भैया उनको हम बता दिए हैं कि कैसे बच- बचा के आना है, कम से कम हमारे आँख के सामने तो रहेंगे"।

ये गाँव की स्त्रियाँ अपने सुहाग को अपने प्रत्यक्ष रखने के लिए दुनिया की कोई भी कीमत चुका सकतीं हैं।इसीलिए भारत के स्त्रियों के कलाई की चूड़ियाँ वॉशिंगटन के रेडियम लाइट की अपेक्षा अधिक चमकदार लगती हैं।

जहाँ पति के आने की प्रतीक्षा ललिता के धैर्य की परीक्षा ले रही थी , वहीं उसके मन में स्वावलम्बन व स्वरोजगार की बातें भी सूझने लगी थीं..., कि अब उसे अपने पति को किसी पर प्रान्त नहीं जाने देना है...!!

जब एक स्त्री गर्भावस्था में हो, और उसकी देख भाल करने वाला उसके समीप न रहे तो वह एक " स्त्री " की सभी असाधारण शक्तियों का आवाह्न स्वयं कर लेती है।

स्त्रीत्व में मातृत्व का समावेश स्त्रियों को योध्दा बना देती है। ऐसा ही ललिता के साथ भी था।

आज ललिता रसोई मैं ही बैठ के फोन पर मनोज को आने के बारे में समझा रही होती है। और सभी उपयोगी सुझावों को बताती भी है। ऐसे ही स्त्रियाँ मातृत्व से पूर्व भी ममता से भरी होती हैं..., अन्यथा कोई पति अपने सबसे गहरे दुख के बारे में सबसे पहले पत्नी से न कहता। उसे भी अपने पत्नी के हृदय के एक छोटे से कोने में एक "माँ" दिखाई पड़ती है।

स्त्रियों के ममता का आँचल पुत्र के साथ-साथ पति को भी उसके करुणामय वात्सल्य में समेट लेता है।

अब मनोज के प्रश्न का उत्तर देते हुए, उसके स्वर डगमगा रहे होते हैं,....." हाँ मैं अस्पताल गई थी, अल्ट्रासाउंड में सभी चीजें नार्मल है, और आयरन कि गोली ख़तम होने वाली है। सरकारी अस्पताल में कभी दवा रहती ही नहीं...., बाकी दवाओ का क्या, वह भी तो डॉक्टर बाहर से ही लिखते हैं, फार्मेसी वाला खुद कहता है कि डाक्टर साहब का तगड़ा कमीशन बनता है"।

शासन व्यवस्था की नपुंसकता हमेशा से हजारों ललिता के होठों के मुस्कान का गमन कर चुकी है।

लेकिन "तुम ठीक तो हो न?? ....., ललिता अपने होने वाले बच्चे के लिए तुम्हारा स्वस्थ व खुश रहना बहुत जरूरी है"।

मनोज ने कहा...!!

"हाँ हम ठीक हैं भाई ".... आप बस आ जाइये जल्दी से..

ललिता के आँसू फूट पड़ते हैं।

मनोज- मुझे विश्वास नहीं हो रहा , सच बताओ सब ठीक है न ??

ललिता - सब एकदम ठीक है...विश्वास कीजिए..

आपकी क़सम..!!!

✍️ अमन पाण्डेय

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