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शराब बंदी, दो फेज का लॉक डाउन खैनी पर काट दिए लेकिन : आशीष त्रिपाठी

शराब बंदी, दो फेज का लॉक डाउन खैनी पर काट दिए लेकिन  : आशीष त्रिपाठी


ऑरेंज जोन में पड़े थे चरित्तर बाबू । दो फेज का लॉक डाउन खैनी पर काट दिए लेकिन कभी माथे पर शिकन नहीं आने दिया कि कहीं बाबूजी ताड़ न लें और चार बात न सुना दें । तसल्ली इस बात की भी थी कि दारू बन्द होने के कारण अगर उनका गला सूखा है तो आस - पड़ोस में भी कौन सी हरियाली छाई हुई है ? दर्शन महतो का दामाद पियारे सूख कर सरपुतिया हो गया है वरना पहले कैसा कोहड़ा बना फिरता था । मगर आज जैसे ही घोषणा हुई कि अब कुछ क्षेत्रों में कुछ प्रतिबन्धों के साथ मदिरा उपलब्ध हो सकेगी , चरित्तर एकदम से व्यग्र हो उठे । कभी अंदर आ रहे हैं , कभी ओसारे से एड़ी उठाकर झाँक रहे हैं तो कभी छत पर भी टहल आ रहे हैं । बाबूजी ने पूछ लिया - " दारू कल से न मिलेगा जी ? अभिये से काहें बेकलाये हो ?"

-"आपको हम दारूबाज बुझाते हैं ? कभी नाली से उठाकर लाए हैं हमको ? कभी कहीं दारू पीकर बलवा करते सुने हैं हमारे बारे में ? किसी पतुरिया के साथ स्टेज पर नथुनिया पर गोली मारे वाला गाना गाते देखे हैं ?...बोलिये ? चुपाई काहें मार लिए ? "....चोरी पकड़े जाने पर चरित्तर बाबू ने बाबूजी को धर लिया ।

बाबूजी की बोलती बंद हो गई । सही भी था । चरित्तर बाबू अपने नाम का खूब इज्जत रखे । दारू को कभी भी अपने चरित्र पर हावी नहीं होने दिए । मंडी में आलू के छोटे व्यापारी हैं , दिन भर की किच - किच के बाद शाम को थोड़ी चढा लेते हैं तो करेजा हरियर हो उठता है । आज तक कभी भी भीड़ में या दोस्तों के साथ नहीं पिये । सोलो ड्रिंकना और उसके बाद ख्यालों में डूब कर दशवीं में साथ पढ़ने वाली मुमताज के साथ ग्रेजुएशन पूरा करने (हालाँकि दशवीं के बाद इन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी) के बाद उसके साथ अंग्रेजी में बतियाने में उन्हें जो आनन्द आता था वो पीकर सड़कों पर हू हल्ला करने और नाली में लोटने में कहाँ था ? वह खयालों में रूठती थी , ये मनाते थे , वो शर्माती थी , ये इठलाते थे । अपनी कमाई से छत पर एक अदद कमरा बनवा लिया था इन्होंने और शाम वहीं रंगीन कर लिया करते थे , बिना किसी शोर - शराबे के । इधर एक महीने से ऊपर हो गया , बिना नशे के मुमताज की याद नहीं आती , एकदम से अलोन फील कर रहे हैं ।

बाबूजी चुप हुए तो ये घर के बाहर निकल आये , उसी वक्त दर्शन महतो का दामाद पियारे लघुशंका हेतु बाहर निकला था । चरित्तर की बाछें खिलीं - " का जी ! कुछ सुने की नहीं ?"

पियारे की धंसी हुई आँखें खुशी से चमक रही थीं - " भगवान के घर देर है अंधेर नहीं भैया , कल एक टाँग पर खड़े होकर दुइ घण्टा भगवान से विनती किये थे , आज देखो कैसी दया दिखाई है ऊपर वाले ने ? "

- " वो सब तो ठीक है यार लेकिन कल जैसे ही ठेका खुलेगा लोग कुत्ते की तरह टूटेंगे , ऐसे में कहीं ऐसा न हो कि हम लोगों को मिलने से रह जाये ?"

नजदीक आ गया पियारे -"ये शंका हमारे मन में भी थी भैया इसलिए अभिये से जुगाड़ सेट कर लिए हैं । ठेके के बगल वाले कटरे में अभी से जाकर सो जाएंगे और सुबह सबसे पहले लाइन में लग जाएंगे "

चरित्तर खुश हुए -"अरे वाह ! फिर तो हमारे लिए भी ले लेना भाई "

पियारे ने हाथ खड़ा कर दिया -"माफ करना दादा ! सुना है कि एक को एक ही पौवा मिलेगा । मेरी मानो तो तुम भी मुँह पर गमछा बांधो और हमारे साथ हो लो "

दूसरा कोई चारा न था । रात में सबके सो जाने के बाद चरित्तर और पियारे धीरे से निकले और कटरे में आसन जमा लिया । सुबह हुआ । दुकान भी समय से खुली । दोनों को दारू भी मिल गई । चरित्तर बड़े अचरज में थे । घर लौटते हुए पियारे से बोले - " बड़ा बेज्जती महसूस हो रहा है बे ?"

- "काहें भैया ?"

-"हमको लग रहा है कि इस दारूबन्दी में सब सुधर गए , हमी दोनों गंदगी में ऐसे नहाए हैं कि हमसे नहीं छूट रही । तुझे हम दोनों के अलावा और दिखा कोई ?"

पियारे शीशी खोलते खोलते रुक गया - " बात तो सही कहे भैया ! लेकिन सब लोग दारू कैसे छोड़ सकते हैं ? कहीं हम लोग गलत दुकान पर तो नहीं पहुँच गए ?"

- "अबे यार ! ऐसा थोड़े ही होता है , रुक ठेके वाले से ही पूछते हैं "

तसल्ली हुई वहाँ दो ग्राहक और देखकर । चरित्तर बाबू ने ठेके वाले से पूछा - " जैसा चाहिए था वैसी भीड़ दिख नहीं रही ठेके पर "

ठेके वाला मुस्कुराया - " दिन के टाइम भीड़ काहें दिखेगी भला ?"

चरित्तर को आश्चर्य हुआ -"अरे क्या बात करते हो ? इतने दिन से दारू बन्द है । आज खुली है तो लोग दिन रात की परवाह करेंगे क्या ?"

- "दारुबन्दी !!"...कहकर ठेकेदार जोर से हँसा ।

चरित्तर गरमाये - " कौनो मजाक किये हैं क्या ?"

- "मजाक नहीं तो और क्या है ? बिहार और गुजरात में कबका दारुबन्दी लागू हुआ है । वहाँ पीने वालों को कमी बुझाया है ? किसी से पता करने की कोशिश किये हैं कभी ?"

-"तो ई बिहार है क्या ?"

-"नहीं है तो क्या हुआ ?अभी हालत तो वहाँ के जैसी ही है । जब यहाँ लॉक डाउन हुआ तो हम भी सोच में थे कि कैसे काम चलेगा लेकिन पियक्कड़ लोग गजब का जुगाड़ निकाल लिया । थोड़ा पैसा बढ़ाकर हम दारू किराना और सब्जी की दुकान से बिकवा देता हूँ । पीने वाले भी खुश और हमको भी दू पैसा ज्यादा मिल जा रहा है ।"

एक महीना से शराब से महरूम चरित्तर इस खेल पर बौराये -"लेकिन ई तो कानून का उल्लंघन है बे !

-"कानून !!"....कहकर ठेकेदार फिर हँसा ।

चरित्तर फिर बौराये - " बहुत हँसी छूट रहा है तुमको ? अभी एक ट्वीट मारेंगे और तुम्हारा सारा अकड़ हवाई जहाज हो जाएगा "

ठेकेदार गंभीर स्वर में बोला - " अरे महाराज ! कानून - वानून कुछ नहीं होता । इधर पैसा वाला और बिना पैसा वाला होता है । पैसे वाला घर पर दारू मँगा कर आराम से लॉक डाउन काट रहा है और तुम्हारे जैसा बिना पैसा वाला बैठ कर ट्वीट - ट्वीट खेल रहा है "

चरित्तर बाबू ने आँखें तरेरीं - " मतलब हम कानून का पालन करके आज तक बिना दारू के रहे तो हम बकलोल हैं । "

ठेकेदार मुस्कुराया - "सही बूझे हैं , अब जरा किनारे होइए आप ही के जैसे और बकलोल भी हैं पीछे लाइन में "

इधर चरित्तर का मोबाइल बजने लगा , उधर बाबूजी थे - " कहाँ हो बे बकलोल ?"

-" आ ही गए बाबूजी ! जरा खेत की तरफ फराकित के लिए निकल आये थे "

आशीष त्रिपाठी

गोरखपुर

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