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गुंजाइश : आशीष त्रिपाठी

गुंजाइश : आशीष त्रिपाठी


खाली पेट नींद क्या आनी थी फिर भी किसी तरह से इधर - उधर करवट बदलते हुए सोने का प्रयास कर रहे फोकट के कान में जब बच्चे के रोने की आवाज तीसरी बार पड़ी तो लाइट जलाकर बीबी पर चिल्लाया - " एक बच्चा नहीं संभलता तुझसे साली ! आधी रात को किसके घर के बच्चे रो रहे होंगे ?"

-"जिनके पेट खाली होंगे !!"...बीबी ने धीरे से कहा , बिना फोकट की ओर देखे ।

फोकट ने देखा कि उसके चिल्लाने से बच्चे ने अपना चेहरा माँ के आँचल में छिपा लिया है , हालाँकि सिसकने की आवाज अभी भी आ रही है । राशन कल से समाप्त था । जहाँ रहता है वह मुहल्ला गरीब मजदूरों का ही है । हालाँकि बाकी मुहल्ले वाले आपस में एक दूसरे की मदद कर अपना निर्वाह कर ले रहे हैं लेकिन फोकट की पिछली जिंदगी ने अभी भी लोगों को उससे दूर ही रखा है । समाज के इस व्यवहार में कोई परिवर्तन आये ,इसके लिए फोकट ने भी कभी अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं किया ।

पुलिस की कोई गाड़ी सायरन बजाती हुई अभी - अभी निकली थी । दरवाजा खोलकर बाहर निकलने से पहले तनिक धीमे स्वर में पूछ लिया - " घर में कुछ भी नहीं है क्या ?"

पत्नी ने जवाब देना उचित न समझा । जानती थी कि अब कुछ नहीं बचा है फिर भी डिब्बों को खोल - खोल कर कुछ ढूँढने का प्रयास करने लगी । आशाभरी निगाह से माँ को निहार रहे बच्चे की तरफ देख फोकट अब और खड़ा न रह सका । "अभी आता हूँ " कहकर उसने अपना झोला छज्जे से उतारा और बाहर निकल गया ।

बीबी ने पीछे से प्रश्न किया - " फिर उसी गंदगी में जा रहे हो ?"

फोकट ने अनसुना कर दिया ।

शायद किसी पुलिस वाले ने पीकर फेंका होगा , फोकट ने सड़क पर पड़ा वह सिगरेट का टुकड़ा उठा लिया । अभी सुलग रहा था अतः एक जोरदार कस खींचा । दूसरे कस की गुंजाइश न थी लेकिन धुँआ छोड़ने के बाद थोड़ी ऊर्जा अवश्य मिली । सिगरेट फेंक आगे बढ़ा , गली के मोड़ पर बिजली के पोल से सटकर बरसाती डाल कर सोए भिखारी के पास पहुँच कर रुक गया , जिस प्रयोजन हेतु निकला था उस पर पानी फेर दिया और भिखारी के पास ही अपने अभीष्ट की सिद्धि मिलती दिखी उसे । भिखारी के सिरहाने एक पतीला ढक कर रखा हुआ था । उसके गिर्द सो रहे दर्जन भर कुत्तों से पैर बचाता हुआ दबे कदमों से फोकट पतीले के पास पहुँचा । अभी हाथ लगाया ही था कि आहट पाकर एक कुत्ता गुर्राया , फोकट ने हाथ पीछे खींचकर उसकी तरफ देखा , इधर भिखारी भी उठ कर बैठ चुका था और तौल कर एक डंडा उसकी पीठ पर धरते हुए बोला - " साला ! लंगड़े भिखारी के यहाँ चोरी करता है ?"

फोकट सकपका गया , धीरे से बोला - " बाबा ! मेरा लड़का भूखा है , उसके लिए कुछ खाना लेने आया था "

-"चुप ***वाले !!! चोट्टा कहीं का !! तेरा लड़का भूखा है तो मैं क्या करूँ बे ? "....कहकर एक और जोरदार डंडा दे मारा भिखारी ने ।

बाकी कुत्ते भी जग चुके थे । उन्होंने फोकट को चारो ओर से घेरकर भौंकना शुरू किया । फोकट दोबारा डंडे के प्रहार से तिलमिलाया हुआ था , एक थप्पड़ भिखारी को जड़ा तो उसे चक्कर आ गया । इधर कुत्तों ने मालिक की यह दशा देखी तो फोकट पर टूट पड़े । ऊपर से भिखारी ने और ललकार दिया - " मार डालो साले को ! कभी भीख में एक चवन्नी तक नहीं दी इसने , व्यवहार ऐसा है कि पूरा मुहल्ला इसकी कटी उँगली पर मूतता तक नहीं । जब कोई चारा नहीं दिखा तो मेरे पास चोरी करने आ गया निर्लज्ज "

कुत्ते अब कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो चुके थे । शोर - गुल पर किसी के आने का भी डर था , अतः फोकट ने भागने में ही भलाई समझी । भागते - भागते मुख्य सड़क पर पहुँच गया , कुत्तों ने पीछा करना बंद कर दिया था । थोड़ी देर साँस लेने के बाद अचानक नजर सड़क के उस पार गंगाराम एंड सन्स के बोर्ड पर पड़ी । बहुत पहले से मन में दबे गुस्से ने बदले के लिए उचित अवसर होने का निर्देश दिया । उसकी बीबी गंगाराम सेठ के यहाँ ही झाड़ू पोंछे का काम करती थी । बीमारी लग जायेगी इसलिए उन्होंने उसे काम पर आने से मना कर दिया , बाकी कामवालियां भी छुट्टी पर थीं लेकिन उनके मालिकों ने छुट्टी देने से पहले महीने भर का पगार भी दिया था , कई तो बीच - बीच में आकर हाल - चाल भी लेते रहते हैं , लेकिन इस मक्खीचूस के जिस्म में लगता है कलेजा ही नहीं दिया भगवान ने ।

सेठ गंगाराम की यह बहुत बड़ी किराने की दुकान थी । फोकट ने निश्चय कर लिया कि आज वह इस दुकान का ताला तोड़ेगा , सेठ को उसके किये की सजा मिलनी ही चाहिए । इधर - उधर देखते हुए अब वह दुकान के सामने था । तुरन्त झोले से अपना चाबियों वाला गुच्छा निकाला और ताला खोलने में भिड़ गया । महँगे विलायती ताले थे , आधे घण्टे में फोकट सारा उपाय करके पसीने से तर हो चुका था लेकिन ताले खुलने का नाम नहीं ले रहे थे । वो फिर भी अपना प्रयास जारी रखे हुआ था कि पीछे से किसी की आवाज आई - " क्यों बे **वाले फोकटिये !! पिछली तुड़ाई भूल गया क्या ?"

फोकट का चेहरा फक्क ! पीछे पलट कर देखने की आवश्यकता नहीं थी , ये जानी पहचानी आवाज एस. आई. माधव की थी । फोकट फिर से उसके हाथ नहीं लगना चाहता था , झटके के साथ उठा और बिना पीछे देखे , चाबी का गुच्छा वहीं छोड़ सड़क पर दौड़ लगा दी । भागता रहा... भागता रहा । पुलिस के बूटों की आवाज आनी बन्द हो गई थी , वह फिर भी भागता रहा और जब कदमों ने आगे बढ़ने से एकदम मना कर दिया तो एक बार पीछे पलट कर देखा । दूर - दूर तक किसी का पता नहीं था , उखड़ती साँसों को संयत करने का प्रयास करता हुआ वहीं सड़क के किनारे बैठ गया । वह दूसरा रास्ता पकड़ कर घर की ओर दौड़ा था । वहीं बैठ कर कुछ देर तक जायजा लेता रहा । जब सुबह हो जाने के बाद भी किसी पुलिस वाले का उधर आना नहीं हुआ तो धीरे - धीरे घर की ओर बढ़ा ।

कुंडी खड़काने के बाद ज्यादा देर इंतजार नहीं करना पड़ा , बीबी शायद पहले से जग ही रही थी । भीतर आकर देखा कि बच्चा गहरी नींद में सोया है और बगल में बिस्किट का खाली पैकेट पड़ा है । पूछा - " ये पड़ा था क्या घर में?"

-"सोओगे या कुछ बना दूँ ?"

फोकट ने आश्चर्य से पत्नी की ओर देखा । उसने एक कोने की तरफ इशारा किया - " तुम्हारे जाने के बाद कोई माधव साब इधर आये थे । ये राशन और बिस्किट देकर बोले कि अपने मरद को समझा दो , जो काम छोड़ चुका है उसमें वापस जाने की जरूरत नहीं । कुछ दिनों का मसला है शांत हो जाएगा तो जिंदगी फिर पटरी पर आ जायेगी , आगे भी राशन मिलता रहेगा "

फोकट कुछ न बोला । घर आने तक चाबियों को सेठ गंगाराम की दुकान पर छोड़ आने का एक दुःख था उसके मन में , वो दुःख अब जाता रहा । भिखारी की बात याद आ रही थी "कोई इसकी कटी उंगली पर मूतता तक नहीं " । आज अपने व्यवहार में असीमित परिवर्तन लाने की गुंजाइश महसूस हो रही थी उसे । इधर पत्नी ने चाय का पतीला चढ़ा दिया था ।

आशीष त्रिपाठी

गोरखपुर

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