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फिर एक कहानी और श्रीमुख "सारंग"

फिर एक कहानी और श्रीमुख    सारंग

झील के तट पर बैठे युवक ने एक कंकड़ उठा कर जल में फेंका, पानी में लहरें उठीं। उसने पास बैठी युवती से पूछा, "क्या सचमुच आपके हृदय में इतनी ही लहरें उठती हैं?"

युवती ने जैसे जल कर कहा, "आप यूँ ही झील की लहरों से हमारे प्रेम को तौलते रहिये, उधर मेरे पिता मेरा विवाह तय कर रहे हैं।"

- "विवाह तय करने से क्या होता है! नदी की जिस लहर के पास सामर्थ्य हो वह तट को छू ही लेती है। अपनी तलवार के एक हाथ से ही ताड़ का पेंड़ काट देने वाले सारंग का प्रेम कोई छीन ले, यह असंभव है।"

युवती मुस्कुरा उठी। "खजूर का पेंड़ काटने वाला क्या मेरे पिता जी का सर काट देगा? आप इतनी बातें क्यों बनाते हैं सारंग? कितने दिनों से कह रही हूं कि अपने पिताजी से कह कर हमारे विवाह की बात चलाइये। वो तो करेंगे नहीं, केवल डींग हांकेंगे।"

सारंग खीज उठा, "तुम समझती नहीं हो! पिता के सामने जाते ही मेरी वीरता कहाँ चली जाती है, मुझे स्वयं समझ नहीं आता। समझ नहीं पाता कि कैसे कहूँ कि, " महान मालवा राज्य के सेनापति कोका! आपके यशस्वी पुत्र सारंग ने प्रेम किया है! आप शीघ्र उसका विवाह अद्वितीय रूपसी सावित्री से कर दीजिए।" सारंग ने भाव बनाते हुए कुछ इस तरह कहा कि सावित्री खिलखिला उठी। कहा, "जो भी हो सारंग, पर कहना तो पड़ेगा। बिना कहे काम भी नहीं चलने वाला।"

सारंग ने हिम्मत कस कर जैसे प्रतिज्ञा के स्वरों में कहा, "कहूंगा। मैं शीघ्र ही दो चार महीने में पिताजी से बात करूंगा। अब हमें कोई रोक नहीं सकता।"

सावित्री ने जल में एक बड़ा कंकड़ फेंका, और चल पड़ी, "आप यहीं बैठ कर लहर गिनिए बीरवर, मैं अपने घर चली।"

सारंग झुंझलाया, "रुकिए न! अभी घर जा के कौन सा पहाड़ तोड़ना है?"

सावित्री थोड़ा रुकी, और मुस्कुराती हुई बोली- "एक शर्त पर, आप मुझे छू कर सौगन्ध खाएं कि आज ही पिताजी से बात करेंगे।"

सारंग ने झिड़का- आपको छू कर? छी... मैं बिना विवाह हुए आपको कैसे स्पर्श करूँ भला?

- फिर तो हम चले। आप लहर गिनिए।

- जाइये। पर स्मरण रहे, मैं पिताजी से शीघ्र ही बात करूंगा।

यह झील उनके प्रेम की साक्षी थी। दोनों यहां नित्य आया करते थे।

******/२-******

सन १३०५ ई। मेवाड़ विजय से उत्साहित अलाउद्दीन खिलजी की विजयी सेना 'मालवा' की ओर मुड़ी। मालवा के शासक 'महलक देव' एक शक्तिशाली और स्वाभिमानी शासक थे, सो उन्होंने सुल्तान के आधिपत्य को स्वीकार नहीं किया। इसका सीधा अर्थ था अलाउद्दीन की सेना से युद्ध। महलक देव ने अपने सेनापति कोका से विमर्श करने के बाद सेना को शीघ्र तैयार करने का आदेश दिया। सेना को तैयार करने जैसी कोई बात तो थी नहीं, क्योंकि राजपूत सैनिकों के लिए युद्ध एक यज्ञ था, वे सदैव इस यज्ञ के लिए लालायित रहते थे।

सेनापति को तैयारियों के बीच कुछ समय मिला था। वे अपने कक्ष में विचारमग्न थे, तभी सारंग ने उनकी तन्द्रा भंग की। "...पिताजी, मुझे आपसे कुछ बात कहनी है।"

सेनापति ने शीश उठाया और मुस्कुरा उठे। बोले, "आओ पुत्र! मुझे भी तुम्हे एक बड़ी जिम्मेवारी देनी है। सम्भव है कि अगले दो तीन दिन में ही हमें अलाउद्दीन खिलजी की सेना से युद्ध करना पड़े। मैंने सेना को कुछ टुकड़ों में बांटा है, जिसमें तुम्हें अपनी टुकड़ी के साथ दुर्ग के अंदर रह कर दुर्ग की रक्षा करनी है। और यदि हमारी सेना युद्ध के मैदान में कमजोर पड़े, तो फिर हमारी सहायता करनी है। अच्छा तुम क्या कह रहे थे?"

- कुछ नहीं पिताजी! खिलजी से युद्ध तो मेरी सबसे बड़ी इच्छा थी। चित्तौड़ के अपराधी को दंडित करने की मेरी चाह अब अवश्य पूरी होगी।

-पर तुम भी कुछ कहने आये थे न बेटा?

- कुछ नहीं पिताजी, अब युद्ध के बाद कहेंगे।

पिता-पुत्र दोनों मुस्कुरा उठे थे, पर सारंग में माथे पर उत्साह चमक रहा था।

तीजहरिया के समय झील के तट पर सारंग ने सावित्री को अपने अतुल्य साहस की कथा सुनाई, कि आज तो वह पिता के पास विवाह की बात करने पहुँच ही गया था, पर युद्ध के कारण उसने इसे उचित नहीं समझा।

सावित्री के मुखड़े पर वही चिरपरिचित मुस्कान उभर आयी थी।

******/३-******

युद्ध को दो दिन गुजर गए थे और सदैव की तरह फल वही था, राजपूत हार रहे थे। राजपूतों की आधी से अधिक सेना वीरगति प्राप्त कर चुकी थी। कारण वही; भारतीय अतिबुद्धिजीविता! सबके प्रति मानवता का भाव। राजपूत युद्ध करने के लिए युद्ध कर रहे थे, वे जीतने के लिए लड़ रहे थे। राजपूत धर्मयुद्ध कर रहे थे, और खिलजी सेना को किसी भी तरह जीतना था। युगों युगों से भारत केवल एक ही भूल करता रहा है, और वह है हर "आदमी" को मनुष्य समझना। मानवता के स्थापित मानकों पर खरे उतरने की चाह में मस्त भारतीयों पर इसी कारण हर बार बर्बरों की जीत होती रही है। वे कभी समझ ही नहीं पाये कि दुष्ट दया के नहीं दंड के अधिकारी होते हैं। दूर देश से निरीह बन कर शरण मांगते आये बर्बर भी कुछ दिनों बाद कत्लेआम का ही खेल खेलते हैं। मालवा की सीमा पर बसे विधर्मियों ने खिलजियों की भरपूर सहायता की थी, जिसका फल था कि....

शाम का समय था। दुर्ग में दूत ने सन्देश पहुचाया कि सेना आधी से भी कम रह गयी है, अतः दुर्ग के लिए आरक्षित सारंग की टुकड़ी को भी शीघ्र ही युद्ध के लिए निकलना होगा। सारंग के लिए यह जीवन का सबसे गौरवशाली क्षण था।

संध्या हो आयी थी, युद्ध के लिए प्रस्थान को तैयार सारंग को कुछ स्मरण हो आया। उसने सेना को कुछ देर प्रतीक्षा करने को कह कर घोड़े को झील की तरफ दौड़ा दिया।

आज झील के पानी में बिना पत्थर मारे ही लहरों की भागा-दौड़ी लगी हुई थी। युवक ने कहा, "युद्ध की दशा विपरीत है सावित्री, शायद यह अंतिम हो।

सारंग ने देखा, सावित्री के मुख पर वही परिचित मुस्कान! वह भी मुस्कुरा उठा।

सावित्री ने पूछा, "फिर मुझे क्या कहते हैं सारंग?"

-यही तो सोच रहा हूँ कि तुम्हे क्या कहूँ?

- युद्ध के बाद वे हिन्दू नारियों के साथ कैसा व्यवहार करते रहे हैं, स्मरण है न?

-सब स्मरण है, तभी तो किंकर्तव्यविमूढ़ हूँ।

- एक बात कहूँ! मानेंगे?

सारंग ने झांका सावित्री की आंखों में, और हड़बड़ा कर कह उठा- यह सम्भव नहीं...

- क्यों सम्भव नहीं? आपको याद है कि सिंध विजय के बाद कासिम ने महाराज दाहिर की पुत्रियों के साथ क्या किया था? आपको याद है कच्छ विजय के बाद महाराज कर्ण देव की महारानी कमला देवी के साथ क्या व्यवहार हुआ था? क्या आप भूल गए कि रणथंभोर नरेश हमीरदेव और चित्तौड़ नरेश रतन सिंह के अंतःपुर की नारियों ने क्यों जौहर किया था? क्या आप भूल गए...

- चुप होइए सावित्री! मेरे कान फट जाएंगे।

- फिर अपना कर्तव्य पूरा करो वीर, आज की संध्या देखेगी कि राजपूत प्रेम कैसे करते हैं। आज धरती और आकाश हमारे प्रेम का चरम देखेंगे।

- पर हमारा विवाह भी नहीं हुआ सावित्री।

सावित्री ने कुछ क्षण देखा सारंग की ओर, और झटके के साथ उसका मुँह खींच कर चूम लिया। फिर कहा, " हो गया विवाह। अब?"

भौंचक सारंग ने कहा, "कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ सावित्री।"

सावित्री मुस्कुरा उठी। आप प्रेम की महागाथा लिखने जा रहे हैं सारंग! उस डूबते सूर्य ने कभी ऐसा प्रेम नहीं देखा होगा। आप अपना कर्तव्य पूरा कीजिये।

सारंग ने देखा, सावित्री के मुखड़े पर देवियों जैसा तेज झलक रहा था। उसने कुछ पल सोचा, फिर एक झटके के साथ म्यान से तलवार खींच कर एक हाथ दिया। सावित्री का धड़ झील के जल में और शीश सारंग की गोद मे पड़ा था। उसके कटे शीश के मुख पर अब भी वही मुस्कुराहट पसरी हुई थी। सारंग की आंखों से दो बूंद गंगाजल सावित्री के मुख में गिर पड़ा।

*******/४-*****

अब युद्ध क्या था, हार जीत की लालसा से परे आत्मोत्सर्ग की पराकाष्ठा पर खड़े सारंग ने अपना तांडव दिखाया था। युद्ध के अंतिम क्षणों में राजपूतों की बीरता देवताओं को भी मात करती रही है। एक एक सैनिक सौ को काट कर कटते हैं। पहले कोका गिरे, फिर सारंग, और अंत मे महाराज महलक देव। अलाउद्दीन का मालवा पर अधिकार हो गया और उसने अपने सेनापति मुल्तानी को मालवा का प्रान्तपति नियुक्त कर दिया।

युग बीत गए। सारंग और सावित्री के प्रेम की कथा किसी को याद नहीं। भारत की स्मरणशक्ति बहुत कमजोर है।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज बिहार।

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