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मुल्ला का बकरा : रिवेश प्रताप सिंह

मुल्ला का बकरा : रिवेश प्रताप सिंह

मुल्ला जी ने एक बकरा पाल रखा था..आप यूं समझें कि मुल्ला जी ने अपने उम्मीदों का एक बकरा पाल रखा था. बकरा, मुल्ला जी के परिवार का कमाऊँ सदस्य था.. उस बकरे पर ही मुल्ला जी के पूरे परिवार के खर्चे का वजन था.

वैसे मुल्ला जी का बकरा पेशेवर था! पेशा कुनबापरस्ती का था लेकिन वो अपने पेशे में ईमानदार था. मुल्ला जी जब भी ललकारते, बकरा उनके हुक्म पर कोण बना लेता और उसके कोण की जो रकम मिलती वो जाती मुल्ला जी के जेब में...

शुरु में तो बकरे में जोश और जवानी थी और उस वक्त मुल्ला जी खर्चे कम हुआ करते थे. सो गाड़ी सरपट दौडती थी. सो मुल्ला और उनका बकरा दोनों खुशहाल थे.

धीरे -धीरे मुल्ला जी का कुनबा बढ़ा, सो खर्चे भी बढ़ने लगे. उधर बकरे की जवानी दिनबदिन ढलती रही. मतलब बकरे का जोश ढलान पकड़ लिया और मुल्ला जी का खर्चा आसमान.. अब मुल्ला जी अपने बकरे पर अधिक कमाई का दबाव बनाने लगे.

मुल्ला जी के कुनबे से जब भी कोई खर्चे की मांग आती तो मुल्ला जी सबसे पहले अपने बकरे की तरफ देखते... ऊधर खर्चे की बात सुनते ही बकरा मारे डर के अपनी पूंछ सिकोड़ने लगता..

बकरे के मालिक यानी मुल्ला जी अपने परिवार के खर्चे के दबाव में अपने करोबार का इजाफ़ा करने के लिए बकरे के कुनबापरस्ती के लिए दबाव डालने लगे और अपने आस-पास के दो-चार गांव का भी बयाना उठाने लगे.... बेचारा बकरा, अकेली जान और उसपर उतना वजन!

अब होने यूं लगा कि सुबह होते ही बकरे की धड़कने बढ़ जातीं.. कि पता नहीं आज कितनी बार अपने पिछले पैर पर खड़ा होना होगा कितने राउंड फायरिंग झोंकनी पड़ेगी.

ऐसा नहीं था कि बकरे ने अपने मालिक के उम्मीद और आदेशों को अपने सिर आंखो न लगाया लेकिन मालिक की उम्मीदों और बकरे की ताकत के दर्मियां एक फासला आने लगा और इस फासले ने बकरे को बगावत का बिगुल बजाने को मजबूर कर दिया.

हुआ कुछ यूं की...मुल्ला जी उम्मीदों तथा बकरे की थकान-ढलान में एक दिन संघर्ष हो गया...मुल्ला जी ने ज्यों ही अपने बकरे को खूंटे से खोल, उसकी रस्सी खींची.. बकरा उन्हें अपने सीगों से हूरपेट, पटक उनके सीने पर चढ़कर बोला-

तेरे घर का पूरा ठेका मैं ही लिया हूँ क्या? मैं सुबह से लेकर रात तक तेरे कहने पर पहाड़ ढकेलूं और इक तूं है जो सिर्फ मेरी पूंछ निहारता रहे. अबे! मुझे जो करना है वो तो मैं कर ही रहा हूँ... तुम मेरे पीछे-पीछे काहें अपनी दाढ़ी पका रहे हो.. जाओ मियां! कुछ मेहनत मजदूरी करो.. थोड़ा तुम कमाओ, थोड़ा हम.. अकेले मेरे दम पर पूरा परिवार पालोगे तो... तुम भूखे मरोगे और हम भी जान से जायेंगे, दिन में आठ बार दो टांग पर खड़े होके..

चलो मान लिया तुम्हारी मुहब्बत और हिफाज़त से से हम सबकी नसों में उतरते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम निठल्ले होकर मेरी नस ही ढीली कर दो.. जाओ अपना कुछ काम धाम करो.. सिर्फ मेरे चक्कर में अपनी जवानी मत जलाओं...हमारा जो काम है वो करेंगे ही लेकिन मुझसे इतनी भी उम्मीद न करो की मेरे पिछले पांव में फालिज मार दे..

हम तो जी लगाकर अपना काम कर ही रहें हैं लेकिन तुम्हें मेरी हिलती पूंछ निहार कर क्या मिलेगा... जाओ... कमाओ यार... शाम को लौटेंगे तब भी मेरी कमाई तुम्हारी...बस इतना होगा कि तुम्हें मेरी हिलती पूंछ नहीं दिखेगी.

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रिवेश प्रताप सिंह

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