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सलाम तेरी पहली नज़र को सलाम! (लघुकथा)

सलाम तेरी पहली नज़र को सलाम! (लघुकथा)

साँझ के बेर की बहती फागुनी हवाएँ अथाह दायित्वों के बोझ तले दबे मानव को भी उसके युवावस्था में व्यतीत किये गए वसन्त की याद दिला ही देती हैं।

बड़े ही कुशलता व द्रुत गति से साग काट रही सुमित्रा से पड़ोस के मुँहबोले देवर भानू आधे घण्टे से ही मज़ाक़िया लहजे में बात किये जा रहे हैं। हँसि- ठिठोली के इस चिन्मय आनंद का मोल आज का कथित आधुनिक समाज कभी तय नहीं कर पाएगा अथवा उसे यह अवसर ही न मिलेगा, ये कहना कठिन है।

भानू का गमछा सर पे रख के व एक आँख का आकार छोटा करके बोलने की कला बहुत भाती थी सभी को....! इसी क्रिया क्रम में भानू पैर पसारते हुए बोलें-

"ऐ भौजी , अब तुम्हारे रूप का वो रौनक न रहा...., अब पहले का सब भूल भी गई हो, घर गृहस्थी में क्या अझुरा गई देवर को तनिक लिफ्ट भी न देती हो"।

"देवर कौन दूध का धोआ है जी ? आज पूरा दस रोज बाद आके बैठे हो हमारे पास। और गृहस्थी की बात का कहें बबुआ.., इस गृहस्थ जिनगी में अझुराएँ थोड़े न हैं.... बहुत मजे में जी रहे हैं। इसी की छाँव में सुहाग और सन्तान का अनमोल सुख मिल रहा है...ई कम है का" ?

बहुत दार्शनिक सा उत्तर दिया सुमित्रा ने।

जिस प्रकार एक योगी के अलावां योग का आनंद अन्य कोई नहीं जान सकता , उसी प्रकार "छद्म नारीवाद" के बौद्धिक व्यापारी "गृहस्थ" के आनंद से सदैव अनभिज्ञ रहते हैं।

आज कुछ देर के हँसी मजाक से सुमित्रा का मन आनन्दित हो उठा था, क्योंकि प्रायः पति 'गिरीश' काम पर से देर को आते थें , और बेटा 'राजा' को स्कूल से आने के बाद खेलने से कब फुर्सत थी। अब साग कट चुका था, और वह गुनगुनाते हुए सँझवत (शाम का दिया) जलाते हुए गुनगुना रही थी।

"हमरे बलम जी के बड़ी-बड़ी अंखिया हो,

चोखे चोखे बाटे नैना कोर से बटोहिया,

होठवा त बाटे जइसे कतरल पनवा के,

नकिया सुगनवा के ठोर रे बटोहिया"....

अपने धुन में मस्त उसे आभास भी नहीं हुआ कि, पति गिरीश घर आ चुका था, और चौखट के उसपार ही ठहर के वो गीत सुमित्रा के मुँह से सुन के आल्हादित हो रहा था। इसके पहले वो गीत सुमित्रा ने अपने दाम्पत्य जीवन के पहले फ़ागुन पर गिरीश को सुनाया था।

गिरीश के चौखट लाँघते ही...सुमित्रा शरमा के साड़ी के आँचल में मुँह ढक के ऐसे हँसने लगी...., जैसे किसी छोटी सी बच्ची को सुहागन का श्रृंगार करते उसके पिता ने देख लिया हो।

गिरीश ने झोला फेंक के सुमित्रा को प्रेमवत कुर्सी पर बिठा दिया। और एकटक निहारने के बाद....!

"क्या बात है ? राजा की अम्मा.....! आज भी जब तुम गाती हो न, तो हम अपना सारा थकान भूल जाते हैं, और ऐसे तुम्हें गाता देख तुम में वो सारी शायरी दिख जाती है...जो विवाह ठीक होने के बाद और विवाह होने के बीच हम प्रेम पत्रों में लिख के भानू से तुम तक भिजवाते थें। मेरे उन ख़तों के जबाब में आए हुए तुम्हारे न जाने कितने खत भानू ने मेरे सिरहने से चुरा लिया है, कहता है होली के दिन सब बाचेंगे"।

गिरीश चेहरे पर चमक लाते हुए बोला....!

जवानी वो तालाब होती है,जिसमे पाँव पटकने के बाद इस दुविधा में नही रहना चाहिए कि पाँव के निशान मिट ही जाएँगे।

गिरीश मज़ाक़िया अंदाज में सुमित्रा को वह गीत गाने के लिए फिर से विविश कर रहा था, और सुमित्रा इन बातों को अनसुना कर पति के कंधे पर माथा रखे ही अपने यौवन के प्रथम वसन्त में जा पँहुची थी। सुमित्रा के आँखों से भाव के मोती ढरक रहें थें, और गिरीश के दामन को भिगो कर इश्क़ लिख रहे थें।

गिरीश ने उसे हृदय से लगा लिया, सुमित्रा भावना के आवेग में पति के हृदय में सिमट के फफक के रो पड़ी। गिरीश ने उसके आँसुओ को पोछते हुए कहा -

"चुप चुप......राजा की अम्मा ये आँसू हमसे न देखे जाएंगे! मेरे जीते जी कभी न रोना। क़सम है हमारी !

भारतीय पति समय के साथ ही पत्नी के भीतर की तरुण चंचलता को अपने भाव से आवेशित करते रहता है, कभी पुत्र बनके तो कभी पिता और आज मित्र भी।

"ऐ सुनो न..! एक बार गा दो फिर से वही गीत ,क़सम से करेजा तर हो जाएगा" ।

इस बार गिरीश ने सुमित्रा को हँसाने के लिए ऐसा कहा।

सुमित्रा - बै ! बस थोड़ा सा ही तो गाएँ हैं, और आप हैं कि बस्स.........…!

गिरीश , उसके दाएं हाथ की कलाई को अपने दोनों हथेलियों में लेके बोला- जानती हो….?

सुमित्रा - क्या ?

गिरीश - हम तुम्हारे इसी " थोड़े से " में ही अपना सारा जीवन जी लेते हैं।

अमन पाण्डेय.....

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