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हार नहीं मानूँगा...

हार नहीं मानूँगा...

गुलबदन बाबू अभी - अभी आये । आते ही किसी अनाम को बद्दुआएं देने लगे । कारण पूछे जाने पर रुंआसे होकर बोले - " आपको तो मालूम है न कि घर से निकाल दिए जाने के बाद मैं अपना जीवन कैसे काट रहा हूँ ? "

- " हाँ , यहाँ किसे नहीं मालूम आपके संघर्ष पूर्ण जीवन के बारे में ?"

- " मगर उसे इसकी जरा भी कद्र भी नहीं है । साला दिन भर इधर - उधर घूम - घूम कर प्रीपेड सिम के लिए लोगों की मनुहार करता हूँ , तब जाकर किसी तरह 100 - 50 का जुगाड़ हो पाता है । परसो रात और कल सुबह खाना नहीं खाया , उन्हीं पैसों को जोड़कर कल गुलाब खरीदा , बंदी ने ले भी लिया । आज प्रपोज मारने नहा धोकर पहुँचा हूँ तो क्या देखता हूँ कि मेरे ही सीनियर के साथ इठला कर बात कर ही है "

-" बात करने से क्या होता है ?"

गुलबदन ने घूर कर देखा - " नाबालिग नहीं हूँ ! मुझे भी पता है कि बात करने से कुछ नहीं होता लेकिन मेरा दिया गुलदस्ता मेरे सीनियर के हाथ में कैसे पहुँचा ?"

-"फिर ?"

-" फिर क्या , गुलदस्ता छीन लिया ।"

- "सीनियर ने कुछ कहा नहीँ ?"

-"कुछ कहता तो सारा गुस्सा उसी को पटक कर निकाल लेता , यही होता न कि नौकरी से निकाल देता ?"

-"मतलब यह लड़की भी धोखा दे गई ?"

गुलबदन बाबू का ध्यान सड़क की तरफ था , मेरी ओर देखकर बोले - " अच्छा भैया ! वो जो जा रही है , मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई है न ?"

-"मैने ध्यान नहीं दिया ?"

गुलबदन आश्वस्त थे - " अरे भैया पक्का मेरी ही तरफ देखकर मुस्कुराई है । "....कहकर गुलबदन बाबू अपना बैग टांग लिए हैं , और बढ़ चले हैं सड़क की ओर ।

आशीष त्रिपाठी

गोरखपुर

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