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सुनो दो अक्षरों वाली...

सुनो दो अक्षरों वाली...

सूरज कई दिनों के बाद निकला है आज, ठीक वैसे ही जैसे हमें बहुत पसंद है। इसीलिए हम सरयू के घाट पर निकल आए हैं अकेले। क्योंकि यही वो जगह है जो हम दोनों को पसंद है। और सरयू के बारे तुलसीदास ने लिखा है कि - कोटि कल्प काशी बसै... नहीं! नहीं ।कुछ नहीं लिखा है तुलसी ने।

याद है? यहीं टकराए थे न! हम दोनों पहली बार। हम पूरब देख रहे थे और तुम पश्चिम। फिर पहल तुम्हारी ओर से ही हुई थी - एकदम से आन्हर हो क्या?

हमारे मुँह से निकला था - एकदम से यही बात गुँजा ने चंदन से भी कही थी।

तुमने व्यंग्य में कहा था कि - एक्जेक्टली! मतलब 'नदिया के पार' वाले डायरेक्टर आप ही हैं?

हम कहना तो चाहते थे कि - नहीं। ये हमने 'कोहबर की शर्त' उपन्यास में पढ़ा था... ।

लेकिन जैसे ही हमारी नज़र तुम्हारी भौंहों के इन्द्रधनुष में अटकी उस शिल्पा की चार नंबर वाली बिंदी पर गई, तो लगा कि जैसे ये सूरज ही अटक गया हो वहाँ। एकदम छोटा होकर।

फिर हम भूल गए कि हमें कहना क्या था और सुनना क्या! और सच कहूँ तो कहना-सुनना, वाणी व्यापार की क्रिया है, प्रेम की भाषा तो शब्द रहित है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि... ओह! नहीं। कुछ भी नहीं कहा है उन्होंने।

तुम अमावस्या के दिन तिल और अक्षत प्रवाहित करने के लिए जहाँ बैठी थी न, मैं एकदम वहीं बैठा हूँ। यहीं तुम्हारी गुलाबी चूड़ियाँ गिनने के बहाने तुम्हारी कलाई स्पर्श हुई थी। मेरी उँगलियों ने आलिंगन किया था तुम्हारी कलाई का। आह! वह एक क्षण का आलिंगन! पता है यही कथन 'ध्रुवस्वामिनी' का भी है और इसके बाद आगे प्रसाद जी लिखते हैं.... नहीं! नहीं । कुछ नहीं लिखते हैं।

तुमने पूछा था कि आपको गुलाबी चूड़ियाँ इतनी अच्छी क्यों लगतीं हैं?

हमने तुम्हारी आँखों में आँखें डालकर प्यार से कहा था कि - पता है इन गुलाबी चूड़ियों पर 'नागार्जुन' ने क्या लिखा है...

तुम अचानक से हमसे लड़ने लगी थी। शायद तुम्हारा सवाल था कि बस हिंदी... हिंदी... हिंदी! मैं कहाँ हूँ?

पता है हिंदी साहित्य में "मैं कहाँ हूँ" को लेकर क्या-क्या लिखा है लोगों ने?खैर! हम बोलने ही वाले थे कि तुमने कह दिया - एक्जेक्टली!

और पता है तुम्हें! जब तुम यूँ 'एक्जेक्टली' कहती हो, तो जैसे इंद्रधनुष के बीच में अटका ये सूरज थरथराने लगता है। और हम कमबख़्त आज तक उसी को बचाने में बरबाद होते रहे।तुमने जो भी आरोप लगाए मुझ पर, वो हम सुन ही नहीं पाए कभी। और कमाल देखो कि हर सज़ा कुबूल भी की 'जी हाँ' कह कर।

खैर! कुछ भी हो। हम मानते हैं ग़लती अपनी। बाईस अक्टूबर की सुबह तुमने फोन किया था,नमस्ते के बाद पूछा भी था कि अच्छा आज किसका जन्मदिन है?

हम झूठ नहीं बोलेंगे हमारे मुँह से 'अदम गोंडवी' ही निकला था।और इसी के साथ तुमने फोन काट दिया था।

यकीन करो हमें अगले मिनट ही याद आ गया था कि उस दिन तुम्हारा भी जन्म दिन होता है और हम लगे फोन करने, लेकिन तुमने आॅफ कर दिया था फोन।

पता है! उस दिन भी हम यहीं आकर बैठे थे चुपचाप। और देखते रहे थे आकाश के माथे पर सजी यही तुम्हारी बिंदी...

फिर तीन दिन बाद मतलब जिस दिन मृदुला गर्ग जी का जन्म दिन पड़ता है, उस दिन तुमने फोन किया था। और कहा था कि - हमें अलग हो जाना चाहिए। क्योंकि हम दोनों में बहुत अंतर है। जिस दिन आप मिले थे उस दिन भी आप पूरब देख रहे थे और मैं पश्चिम। मेरी लंबाई भी आपके बराबर नहीं। मेरे नाम में दो अक्षर है और आपमें तीन... हम कहीं से भी एक नहीं हो सकते।

हाँ! हमने अपनी पुरानी हर गलती की माफी माँगी थी और तुमसे वादा भी किया था कि अब आगे से हमारी जिंदगी में हिंदी की कोई जगह नहीं होगी। अबसे बस तुम्हारे बारे में ही सोचना है... एक्जेक्टली।

लेकिन सच बताऊँ! हमारे अंदर से जैसे कोई बोल रहा था कि बलिया वाले कभी नहीं सुधरते।

और देखो हुआ भी वही न! कल जब तुम्हारा फोन आया था तो हम सबसे पहले दौड़ कर बाहर निकले थे कि न दिखेंगी घर में हिंदी की किताबें और न हमारे मुँह से निकलेगी हिंदी। चारों ओर घना कुहरा था जैसे बादल घिर आए हों। और जैसे ही तुमने हाल-चाल लेने के बाद पूछा कि आज कौन सा दिन है?

तभी बगल से परभुनाथ चचा रजाई में से बोले थे - एकदम आषाढ़ जइसे दिन हो गया है हो ... ।

अब वही सुनकर हमारे मुँह से निकल गया था कि- हाँ! आज मोहन राकेश का दिन है।

तुमने फिर फोन काट दिया था। कसम से कह रहे हैं हम खूब डाँटे थे कि परभुनाथ चचा को कि जनवरी में 'आषाढ़ का एक दिन' घुसाना जरूरी था? कभी चुप नहीं रह सकते हैं... वगैरह-वगैरह।

लेकिन सच कहें तो, आँखें भर आईं थीं हमारी। सच में, हम एकदम अलग-अलग हैं न!

जानता हूँ हर लड़की की ख़्वाहिश होगी कि वो जिसे चाहती है वो बस उसी के बारे में सोचे। और हमारे साथ रह कर तुम्हें आखिर मिलेगा क्या। चलो हम खुद कोई अच्छा सा लड़का देखेंगे तुम्हारे लिए। आखिर 'गुनाहों का देवता' में भी तो सुधा के लिए... नहीं! नहीं। कुछ नहीं ।

याद है तुम्हें! जब तुम नदी में पाँव डाल कर हिलाती थी तो सूरज तुम्हें देखने के लिए कितना नीचे उतर आता था? आया तो आज भी था उतर कर। लेकिन हमें अकेले देखकर कोहरे में छुप गया है।

इसे क्या पता आज हम कितने खुश हैं! पता है आज सुबह जब मोबाइल बजा न! तो मन किया कि पटक दें। लेकिन स्क्रीन पर नाम तुम्हारा था दो अक्षरों वाला...

हमने एकदम सतर्कता रखी थी आज, कि कहीं से भी कोई लेखक कवि या कविता कहानी याद न आए। और खुद ही पहले कह भी दिया कि - सुनिए! आज दस जनवरी है। और आज किसी भी हिंदी वाले का न जनम हुआ न मृत्यु....

उधर से तुम्हारी हँसी सुनाई दी। पता है तुम्हारी हँसी में हरसिंगार की महक है। मन्नू भंडारी ने एक कहानी लिखी है उसमें 'दीपा' को भी...नहीं! नहीं ।कुछ नहीं।

और हँसी के साथ ही उधर से कहा था तुमने कि - सुनिए! आज 'विश्व हिंदी दिवस है'...हिंदी में लिखना अच्छा लगता है। याद कर लीजिएगा दस जनवरी को विश्व हिंदी दिवस होता है...

पता है तभी से यहाँ नदी के किनारे बैठे हैं हम। जी रहे हैं उस खुशी को कि, जब हम अपनी लाख असमानताओं और विभिन्नताओं के बावजूद भी मिलेंगे। तुमने कहा था न कि हम दोनों एकदम अलग-अलग हैं, तो सुनो - आज के बाद हम कभी नहीं कहेंगे कि किस कवि ने क्या कहा और किस लेखक ने क्या कहा। ठीक न!

हम बन जाएँगे पूरब से पश्चिम तुम्हारे लिए।

और 'असित' में से 'अ' हटा कर 'सित' भी कर देंगे हम। ... हो जाएँगे न अक्षर बराबर।

और जब तुम वरमाला डालने के लिए हाथ उठाओगी तो झुक भी जाएँगे हम चार इंच। ... हो गया न सब बराबर।

हम हमेशा तुम्हारी इस चार नंबर वाली बिंदी से प्यार करेंगे तुम बस मेरी हिंदी से प्यार करना। क्योंकि 'धूमिल' ने कहा है कि भाषा कविता में... नहीं! नहीं!! किसी ने कुछ नहीं कहा है....

हिंदी के बाद तुम्हारा - "सित"

असित कुमार मिश्र

बलिया

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