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जनवरी उन लड़कियों के हिस्से में पड़ती है....

जनवरी उन लड़कियों के हिस्से में पड़ती है....

पिछले ज़माने में जनवरी लड़कियों के हिस्से में पड़ती थी।खास तौर से उन लड़कियों के हिस्से में, जिनका कहीं कोई हिस्सा नहीं होता था...।

हाँ! जनवरी उन लड़कियों के हिस्से में पड़ती थी, जो रोज़ सुबह नौ बजे तक कपार में गड़ी का तेल लगा कर दोनों चोटियों को ललके रिब्बन से बाँध लेती थीं और हथेली में समाये नारियल तेल की चिकनाई को चेहरे पर रगड़ कर खुश हो लेतीं कि चेहरा चमक गया होगा और फिर निकल आतीं घरों से अपने।

गाँव के टीबुल तक आते-आते उन लड़कियों की संख्या छह-सात हो जाती कि जिनके हिस्से में जनवरी पड़ती थी।

उन लड़कियों को सिखाया गया था चुपचाप गुज़रना... घूरती आँखों से भी, खेत की मेड़ों से भी, पगडंडियों से भी, सड़कों से भी और शायद दुनिया से भी...। इसीलिए वो लड़कियाँ कहीं से भी गुज़र जाएँ कोई शोर नहीं होता। बहुत बार तो मेड़ की बगल में सोए मटर की छीमियों और ऊंघते सरसों के फूलों को भी नहीं पता चलता कि कोई लड़की गुज़र गई।

वो लड़कियाँ किसी टुटहे सड़क में बरियाई से निकल आई कच्ची पगडंडियों के सहारे उस सस्तहवे स्कूल में पढ़ने आतीं थीं, जहाँ उन्हें रीफ़ गाँठ बाँधने से पहले आ जाता था साइकिल की तीलियों से फंदे छानना उन स्कार्फ़ के लिए जो ऊन कम पड़ने से कभी बुने ही नहीं गए।

जिन घरों में नाम दे सकने की ताकत थी वहाँ लड़कियों के नाम रखे जाते - सुमन, शैलजा, गिरिजा, सरस्वती और पार्वती जैसे ताकि भविष्य में 'देवी' मैच खा सके उनके नाम के साथ।

लेकिन भविष्य की वो 'देवियाँ' तब हँस पड़तीं जब उनके बीच कोई सोमारी या मँगरी आ जाती।हँसते-हँसते जब पेट पूरा भर जाता तो कोई गिरिजा पूछ बैठती - ई कैसा नाम है जी?

सपाट जवाब मिलता - मैं सोमार को हुई थी न!

उधर से इठला कर पूछा जाता - और जो बुध को हुई रहती?

- तब बुधिया...

एक हँसी के साथ फिर सवाल - अच्छा सनिचर का बताओ तो!

- सनिचरी...

मने तुम्हारे माई - बाबू ने तुमको एक नाम तक नहीं दिया!

दिया न सोमारी...उसने हँस कर कहा था।

उसकी साँवली हँसी में कोमलता थी, आँखें सलज्ज और गाल पर बनते थे गड्ढे। जिसे देखते ही चौंक कर गिरिजा ने कहा था - अरे! तेरी तो गालों पर जादू बन रहा है...मेरी सखी बनोगी?

- तुम निभाओगी तो क्यों नहीं!

पिछले ज़माने में जनवरी उन लड़कियों के हिस्से में पड़ती थी जो अपनी सखियों का नाम होठों पर नहीं, मेंहदी रचे हथेलियों पर धरतीं थीं। वो भी पूरा-पूरा नहीं, नाम का बस एक अच्छर धीरे-धीरे उठाकर झाड़ू की सींक से.... ।

और जब आती थी ऐसे में जनवरी तो स्कूलों के पास की दुकानों पर बीसेक दिन पहले से झूलने लगते थे लेमनचूस और चूरन के साथ-साथ जैकी श्राफ, मिथुन चक्रवर्ती और कमर में पिस्तौल लगाए अम्ता बच्चन के फोटुओ वाले अठनियाँ ग्रीटिंग कार्ड्स।

जनवरी वाली वो लड़कियाँ जोड़-तोड़ कर बचाए गए पैसों से खरीदती थीं आठ आने वाली हँसती हुई माधुरी दीक्षित, दिव्या भारती या जूही चावला।

फिर सबकी नजरों से बच-बचा कर पढ़ाई-लिखाई के बहाने लिखी जाती थी लाल, पीले, हरे स्केच से ग्रीटिंग कार्ड पर मासूमियत भरी शेरोशायरी।

जो दिन भर अँझुराई रहती थीं कभी न खत्म होने वाले घर के कामकाज में और जिनके लिए बहुत बाद की चीज थी पढ़ाई। वो भी अपने पढ़ाई न कर पाने के दुःख को डाल देती थीं अपनी सखी के कपार पर -

काली काली साड़ी पे कढ़ाई नहीं होती।

सहेली तेरी याद में पढ़ाई नहीं होती।

ऐसे ही भरी-भरी जनवरी की कोई तारीख रही होगी जिस दिन पहली ही क्लास खाली थी। माट्साहब मेज़ पर छड़ी, चश्मा और चाॅक रख कर किसी काम से चले गए थे। पूरी क्लास में शोर मचा था। इसी बीच शैलजा और गिरिजा ने पार्वती से कोई गीत गाने की फरमाइश की। पार्वती ने बगल में बैठी जादू से मनुहार किया - ए तुम भी चलो न!

-भक्क! हमको गीत गाने कहाँ आता है जी?

पार्वती ने जिद भरी आँखों से पूछा - यही सखी बनती हो मेरी?

कुछ देर बाद क्लास में मेज से पीठ टिकाए दोनों मूर्तियाँ गीत गाने लगीं। मेज़ पर पड़े निर्जीव छड़ी, चश्मे और चाॅक में जैसे हरकत होने लगी। जाने कब पार्वती के हाथ से छू भर गया चश्मा और नीचे गिर गया।

गिरते ही चश्मे के काँच टूट गए जिसकी खनक दोनों मूर्तियों के कलेजे में समा गई... गीत अधूरा रह गया।

मेज़ पर फिर से सब कुछ वैसे का वैसा रख तो दिया गया लेकिन कलेजा था कि पसलियाँ तोड़ कर मूर्तियों से बाहर आ जाना चाहता था।

थोड़ी देर बाद जैसा कि होना था एक जादू भरी मूर्ति पर लगातार थप्पड़ों की बारिश हो रही थी और बीच - बीच में माट्साहब की गालियाँ भी - बहुत गीत गाने का शौक चढ़ा है... बोल तुम्हारे साथ और कौन थी हरामजादी... ।

लेकिन मूर्ति की आँखों से आँसू ही गिरे शब्द नहीं।

माट्साहब ने इस बार बाल पकड़ कर गाल पर एक तमाचा लगाया और दाँत पीसते हुए बोले - कब तक नहीं बोलेगी...!

लगातार थप्पड़ों की चोट से दरक रही मूर्ति के मुँह से निकला - अरुन की दीदी।

फिर एक थप्पड़ की आवाज़ गूँज गई थी कमरे में - कौन है रे कुत्ती अरुन की दीदी ? तेरी माँ? नाम बता नाम...!

लेकिन मूर्ति ने फिर कुछ नहीं कहा और पिटती रही... पिटती रही।

टूटा हुआ चश्मा लेकर माट्साहब कब के चले गए थे। रोते-रोते जादू की आँखें लाल हो गई थीं, चुप कराते हुए पार्वती की आँखें भी भर आईं - तुमने मेरा नाम ले लिया होता। आखिर गिरा तो मुझसे ही था चश्मा...।

सुबकती हुई मूर्ति के मुँह से शब्द झरे - भक्क! मर जाते पर मुँह से सखी का नाम न धरते...।

तब दो तीन सालों के अन्तर पर गाँव से अनगिनत डोलियाँ गईं जिनमें भर के चले गए कुछ दुसुत्ती के पर्दे, कुछ क्रोशिए के मेजपोश और कुछ घर-घर से जुटाए गए फ्यूज़ बल्ब जिन्हें प्लास्टिक से बनाया गया था गुलदस्ता।

यूरिया वाली प्लास्टिक की बोरी पर ललके ऊन से लिखे 'वेलकम' वाले झोले में बैठकर दर्जन भर दिलफरेब ग्रीटिंग और जानशीं जनवरी भी चली गई।कभी न आने के लिए।

आज बदले हुए जमाने के साथ बदले-बदले रूप में अब भी आती है जनवरी और बदली-बदली रूप में वो लड़कियाँ भी हैं फेसबुक और व्हाट्स-ऐप पर। कुछ-कुछ तो ट्विटर और इंस्ट्राग्राम पर भी...।जहाँ जनवरी की आज भी धूम है।

लेकिन इन जगहों की जनवरी उन लड़कियों को उदास कर जाती है, जिनकी कोई न कोई सखी 'जादू' हुआ करती थी।

और यूँ ही किसी रोज़ जब पुरनके बक्से से निकल आती है कोई माधुरी दीक्षित या जूही चावला की हँसी वाली फोटो, जिसके पीछे तबकी लिखी हुई उस सखी की शेरोशायरी, जिसका नाम अब भी नहीं लिया जाता...।

तो मन जैसे उड़ कर उसी जनवरी तक चला जाता है जो इन लड़कियों की होती थी।

हाँ! जनवरी उन लड़कियों के हिस्से में पड़ती है जिनकी उँगलियों को ऊन के गोले से मुहब्बत थी और क्रोशिए से इश्क़। जिन्हें आज भी उस पहले स्कार्फ़ के अधूरे रह जाने का मलाल है.... ।

हाँ! जनवरी उन लड़कियों के हिस्से में पड़ती है जो आज सालों बाद भी अनचाहे दिख गए उस अठनियाँ ग्रीटिंग के मोह से निकल नहीं पाईं हैं .... और साल दर साल जनवरी की पड़ती हुई शीत आँखों की नमी के साथ मिलकर उनके अठनियाँ ग्रीटिंग को थोड़ी-थोड़ी हर साल भिगोती चली जाती है.... ।

हाँ! जनवरी उन लड़कियों के हिस्से में पड़ती है .... ।

असित कुमार मिश्र

बलिया

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