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(कहानी) बड़बोला.........: आशीष त्रिपाठी

(कहानी) बड़बोला.........: आशीष त्रिपाठी

-"ये भैंस है ? एक खाँची खाती होगी और चार खाँची पोंक देती होगी । दूध तो देने से रही , खाली गोबर देने के काम आवेगी ये "....खूबलाल ने नई नवेली भैंस के भविष्य के बारे में भविष्यवाणी कर दी ।

भैंस के स्वामी हुकुमदेव मिशिर , तीस हजार नगद खर्च कर यह भैस लाये थे । आते ही तारीफ तो सुनने से रहे , अलबत्ता बेइज्जती जरूर हो गई । पट्टीदारी के रमेसर चाचा के दामाद न होते इनकी जो गत बनाते कि यही बुझते लेकिन गुस्से पर काबू कर लिया । इधर खूबलाल ने जब देखा कि हुकुमदेव बैठने तक को न पूछ रहे तो जाते हुए कहने लगे - " हमारी बात झूठी निकल जाए तो मूँछ मुड़वा देना साले साहब ! भैंस तो हमारे घर थी । तीन - तीन दिन तक लोग गोबर को तरस जाते थे , जब ग्वाला दूध दुहने बैठता था तो पसीने छूट जाते थे उसके । दस - दस लीटर की दो बाल्टियां भर जाती थीं ।"

पूरा गाँव बड़बोले खूबलाल से तंग था । घर जमाई थे सो लिहाज के कारण कोई कुछ न कहता लेकिन ये उस लिहाज का दुरुपयोग करते और अपने को श्रेष्ठ तथा दूसरे को गौड़ दिखाने का कोई मौका न छोड़ते ।

एक बार कम्युनल राइट हो गया । उसके कुछ ही महीने बाद चुनाव का समय आया तो खूबलाल के गांव के पोलिंग बूथ को संवेदनशील घोषित कर दिया गया । केंद्रीय सुरक्षा बल की कंपनी समेत उत्तर प्रदेश पुलिस के जवान भी भारी संख्या में तैनात थे । वोट करने गए कुछ लोग लौटे तो वहाँ की सख्ती का बखान करने लगे " किसी को फालतू खड़ा नहीं होने दे रहे , मनबढ़ों को दौड़ा कर पीट दे रहे , आदि आदि ।"

खूबलाल अपना नया कुर्ता पाजामा पहने तैयार थे । लोगों की बात सुनी तो मुस्कुराए - " कैसे फटीचर गाँव में आकर बस गया , दो - चार वर्दीधारी क्या देख लिए आप लोग , कलेजा दहल गया ? अरे हमारे गाँव में कत्ल करके लोग पुलिस वालों की आँखों में आँखें डाले ,मूँछ ऐंठते हुए चलते हैं । आइये चलिए हमारे साथ , देखते हैं कौन पुलिसिया कुछ कहता है ।"

कुछ लोग जो पुलिस देखते ही भयभीत हो जाते हैं , उन्हें खूबलाल की बातों से बल मिला , हो लिए इनके पीछे - पीछे । मतदान स्थल ज्यादा दूर न था , वहाँ पहुँचे तो दोनों बाहें भाँजते मस्ती में चले । मुँह में गुटखा लिए आगे बढ़ ही रहे थे कि किसी ने कॉलर पकड़ कर पीछे से खींचा - " किधर बढ़ा जा रहा बावले ?"

खूबलाल पलटे - " अजी ! वोट देने जा रहे हैं और क्या ?"

-"तो लाइन तेरे ताऊ के लिए लगवाई है के ?"

खूबलाल ने लाइन पर ध्यान नहीं दिया था , इनके पीछे आये लोगों ने चतुराई दिखाई , झट से लाइन में लग गए । इन्हें साथ आये लोगों के सामने अपनी इज्जत बचानी थी - " मेरे चाचा के दामाद रेल कारखाने में फोरमैन हैं "

-"तो ?"

-"बड़ी ऊँची पहुँच है उनकी "

फौजी का माथा सनका , एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर के पूछा - " इतनी ऊँची पहुँच है उसकी ?"

खूबलाल पैजामे में एक नम्बर कर चुके थे । फौजी इनका जवाब जानने को आतुर था , दूसरा थप्पड़ जड़ा - " इब बोल भी दे भूतनी के , इससे भी ऊँची पहुँच है के तेरे जीजे की ?"

इस बार खूबलाल का सफेद पाजामा पीछे से पीला हो चुका था , भागने लगे , फौजी ने दौड़ाया लेकिन हाथ नहीं आये । वो दिन है और आज का दिन , खूबलाल अपनी ससुराल नहीं आये । अपने गाँव में खुश हैं ।

आशीष त्रिपाठी

गोरखपुर

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