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(कहानी) मंहगी प्रसिद्धि... : अमन पाण्डेय

(कहानी) मंहगी प्रसिद्धि... : अमन पाण्डेय

नए- नए सुखद एहसास पुराने घाव को भी भरने का प्रयास करतें हैं..., लेकिन फागुन के मारे को वसन्त कितना तृप्त कर सकता है ? अब तो मन और आत्मा को भी सन्धियाँ करनी पड़ती हैं.... हँसने के लिए , प्रेम को जीने के लिए , और जीवित रहने के लिये..!!

अच्छा आज जीवित ही कितने बचें हैं..? पीड़ा और असंतोष ने सचमुख निगल लिया है , मानवीय माधुर्य को।

आज लोगों के आंखों के नीचे पड़े काले गड्ढे और उनके होठ की कृत्रिम हँसी बताती हैं...., कि इन्होंने आज तक समझा ही नही कि "जीना किसे कहतें हैं"....

पवन आज पत्नी रीता के पास उसके किराए के मकान पर आता है...., जहाँ वह रेलवे विभाग में कार्यरत थी..पवन दूसरे प्रांत में शिक्षक था।

"मनुष्य जब चार दिन के जीवन में चार सौ वर्ष की उपलब्धियों के पीछे भागता है तो ...., ऐसे ही लोग मिलतें तो हैं लेकिन आत्मा नहीं मिलती, लोगों का जीवन मर जाता , बस उस रिश्ते का नाम चलता है..और सम्बन्धी जनों के मुख से उनके भ्रम के संसार की प्रशंसा..!

" ट्रेन इतना देर कैसे कर दी..., आज मैंने विभाग से छुट्टी ले रखी है , कल वैसे भी छुट्टी है दो दिन पूरा है हमारे पास" ।। रीता ने चाय रखते हुए कहा।

पवन निर्वेद भाव से चाय पीता रहा...! इतने में रीता का फोन बजा......, ...!

रीता - गुड इवीनिंग सर...! वो मैं आज बता नही पाई , एक्चुअली मैंने आपके रैक में अपना एप्लिकेशन रख दिया है उसको सब्मिट कर दीजिएगा प्लीज....!

फिर लगातार..... रीता के कई फोन आए..!

ओह्ह..! मैं तो भूल ही गई...खाना परोसें ??

पवन - नही...! ( अनमने ढंग से...)

"अच्छा बताओ कैसी हो ? तबियत अब कैसा है तुम्हारा" ? पवन ने पूछा...

"एकदम ठीक हूँ...., वो हेड सर ने डॉक्टर को बोल दिया है..., तो नम्बर भी आराम से लग जाता है..इंतजार नहीं करना पड़ता। और वैसे यहाँ बहुत से लोग हैं, आप एकदम निश्चिंत रहिए...! सब बहुत अच्छे हैं।

एक आपकी कमी हमेशा रहती है......, पर क्या करें? जीवन को यही मंजूर है..! यहाँ अच्छी सैलरी , इज्जत, और इतनी बढ़िया सोशाइटी भी नही छोड़

सकती न "!

रीता ने बोलते हुए पवन के कंधे पर अपना सर रख दिया....!

रीता आज पवन से ढेर सारी बातें करना चाह रही थी..लेकिन उस समय आने वाले फ़ोन कॉल से एकदम चिढ़ जा रही थी...!! उसे पता था उसके दाम्पत्य में कुछ बढ़िया नही चल रहा है....., बस उसके वैवाहिक जीवन का नाम ही अस्तित्व में था बाकी कुछ नही..! लेकिन वह जानबूझ कर अंजान बनी थी ,परिवार से दूर इस जीवन में खुद को उलझा के खुश रखती थीं।

अज्ञानता यदि समाज के बड़े तबके द्वारा पोषित होती है तो ....वह अज्ञानता प्रतिष्ठा के भूखे लोगों द्वारा और अधिक सम्मान पाती है।

पवन - जानती हो रीता....., तुम्हारी ख़ुशी के लिए मैने कभी बच्चे की ज़िद नही की....., वरना वो तुम्हारे वास्तविक व कृत्रिम परिवेश में पिस के रह जाता। जो मुझे सहन नहीं होता...!

एक दुर्जेय योद्धा भी तब एक पल में पराजित हो जाता है, जब कोई अपना ही उसके प्रतिकूल हो जाए....!

रीता इन बातों को सोचती तबतक....उसका अगला फ़ोन आ गया....., उधर से आवाज आई कि , "कल जी एम साहब का दौरा है...सभी को उपस्थित रहना होगा" । रीता ने पवन से जबतक कुछ कहना चाहा......! पवन उठते हुए बोला....!

अब चलता हूँ रीता.....आठ बजे की ट्रेन है..! कल बाबूजी को डॉक्टर से दिखवाने ले जाना है...!

लेकिन , आज ही तो आए, एक रात भी नहीं रुके ऐसे कैसे जाएंगे आप? आज आपको अपने दोस्तों से मिलवाती.... विभाग के भी कई लोग अक्सर आपको पूछतें रहतें हैं.... (रीता ने झिड़क कर कहा..)

"तुम मुझे पहचानती हो न ??? बस यही देखने आया था , कि इस प्रसिद्धि ने "कहीं तुम्हारे माँग में लगने वाले सिंदूर का क्षेत्रफल " तो घटा नही दिया है....,अब चलने दो."...,! पवन पिड़ामिश्रित मुस्कान के साथ बोला....

शब्द के ये घूंट , रीता को बेचैन करने वाले थें...वो तिलमिला कर खड़ी हो गई..!

यही प्रेम करते हैं आप हमसे....एक दिन भी नही मेरे पास रुक सकतें , आपको शायद नहीं पता कितना चोट देते हैं आप ऐसा बोल के....!

देखो रीता...! ये चुनाव तुम्हारा था...तुमने मेरे प्रेम, मेरे सुखद दाम्पत्य के बदले ये जीवन चुना..! तुमने मेरे उपस्थिति में सावन को ठुकरा कर ......, कागज पर लिखे सावन के कहानियों का चुनाव किया था...! तुम मेरी अर्धांगिनी तो हो, लेकिन कभी मुझमे खुद को नही देखी। तुम मेरे उन आभासों को हमेशा कल्पना ही समझी जिन्हें मैं अपना जीवन समझकर लिखता रहा...!

हैरान तो मैं भी हूँ..... तुम वो गीत कैसे भूल गई..जो अक्सर मुझे सुनाया करती थी....!

"तूही मेरी चूड़ियां तूँ ही कलइयां ...

पग पग लिए जाऊं तोहरी बलइयां"

अमन पाण्डेय

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