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झुमके : आशीष त्रिपाठी

झुमके : आशीष त्रिपाठी


शहर के समृद्ध सेठ और समाजसेवी , चौधरी रामनाथ की पत्नी भगवन्ता देवी इस बार मायके गईं तो दूसरे दिन दही मिले गन्ने का रस लेकर आई मंझली और उसके छोटे भाई बीरू को देख मुस्कुरा उठीं । मँझली और बीरू उनके चचेरे भाई गोविंद के बच्चे थे । भगवन्ता देवी के पिता दो भाई थे । दोनों ने अपनी मेहनत के बल पर खूब उन्नति की और यह बड़ा सा मकान बनवाया । बड़े भाई के दो बच्चे हुए एक पुत्र सुभाष और दूसरी कन्या भगवन्ता । छोटे भाई के केवल एक पुत्र , गोविन्द । दोनों बुजुर्ग जब तक जीवित रहे तब तक प्रेम पूर्वक रहे , उनके मृत्योपरांत सुभाष और गोविन्द में नहीं बनी और घर के बीच एक विभाजन की दीवार चल गई । नौकरीपेशा सुभाष की गृहस्थी अच्छी चल रही है जबकि किसानी के सहारे परिवार चला रहे गोविंद की हालत तंग रहती है । गोविंद की पत्नी जानती है कि जीजी की प्रिय यह वस्तुएं शहर में उन्हें आसानी से सुलभ नहीं हो पाती होंगी , सो मँझली के हाथ पठा दिया , साथ में गोनसारी से आज ही भुनवा कर लाया गया चावल और चने का भूजा भी था ।

उनकी सगी भौजाई अर्थात सुभाष की पत्नी ने यह सामान देखते ही मुँह बिचकाया - " जैसे हम लोग नहीं देते आपको ? दिखाती फिरती है कि उसे बड़ा नेह है आपसे ".....कहते हुए बीरू का शर्ट खींच कर अपने लड़के की बैटरी से चलने वाली ट्राई साइकिल से दूर किया । चार साल का बीरू दूर तो हट गया था लेकिन उसकी निगाहें अभी भी उस साइकिल पर गड़ी हुई थीं , जैसे ही सुभाष बहू रसोई की तरफ गिलास लाने के लिए गई , बीरू मौका पाकर फिर साइकिल की तरफ बढ़ने लगा था ।

भगवन्ता देवी मुस्कुराते हुए बोलीं - " जाने दो भौजी ! मुझे पता है कि तुम हमको सबसे ज्यादा मानती हो "

रस और भूजे का आनंद ले रही भगवन्ता देवी ने देखा कि मंझली उनके समीप आकर कभी उनके कान के बड़े - बड़े झुमके हाथ से छूकर देखती तो कभी गले में पड़ी सोने की चेन को । सुभाष बहू ने देखा तो झपट पड़ी - " चल दूर हट हरामजादी ! लेकर भगेगी क्या ?"

बालिका सिहर उठी कदम पीछे हटे और सांवले चेहरे पर अब तक जो हर्ष विद्यमान था उस पर तिरस्कार की कालिमा चढ़ गई । पेट पर फट चुके फ्रॉक को उसकी माँ ने सिल तो रखा था लेकिन मँझली को भान था कि यह सिलाई उसकी गरीबी को ढँक नहीं रही बल्कि और भी उजागर कर रही है । उस सिलाई को हथेलियों से ढकने का प्रयास करने के साथ ही अपने ऊपर लगे आरोप को भी निराधार साबित करना आवश्यक जान पड़ा उसे - " इसीलिए तुम्हारे घर नहीं आते हैं अम्मा , और आज तक तुम्हारा कौन सा समान चुराए जो हमको गाली दे रही हो ?"

भगवन्ता देवी सरल हृदया महिला थीं , बच्ची को प्रताड़ित होते देखा तो गन्ने के रस से मीठा हुआ मुँह कसैला हो गया । भौजाई की तरफ आरक्त नेत्रों से देखा - " ये क्या तरीका है भौजी ? बच्चों से ऐसे बात करते हैं क्या ? देख ही तो रही थी बेचारी " कहते हुए मँझली की तरफ देख दोनों बाँहें फैला दीं ।

मँझली , जो अभी क्षण भर पूर्व ही घृणा की अग्नि से झुलसी थी , भगवन्ता देवी का स्नेहिल आमंत्रण उसके लिए श्रीखंड के समान लगा। बड़े वेग से दौड़ी और भगवन्ता देवी ने उसे कलेजे से सटा लिया ।

उसे लेकर अपने कमरे में गईं , माथे पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा - " स्कूल जाती है ?"

मँझली ने हाँ में सिर हिलाया ।

-"और तेरा भाई ?"

- "वो तो छोटा है अभी बुआ ! "

- " तो क्या हुआ ? प्ले वे में तो जा ही सकता है "

गाँव की बच्ची प्ले वे से सर्वथा अनभिज्ञ थी । शब्द तो नहीं फूटे लेकिन मुखमंडल बता रहा था कि वो इसके बारे में जानना चाहती है । भगवन्ता देवी ने बताया - " वहाँ छोटे बच्चों को खेल - खेल में पढ़ना सिखाया जाता है , खूब सारे खिलौने होते हैं वहाँ , तरह - तरह के झूले ....."

मँझली ने बीच में ही टोका - " आँगन में जैसी खड़ी है वैसी साइकिल भी होती है क्या बुआ ?"

भगवन्ता देवी मुस्कुराईं - " तुझे पसन्द है वो ?"

-"मुझे नहीं , बाबू को । घर में अम्मा को इसके लिए परेशान करता है "

भगवन्ता देवी को उनकी भौजाई उबटन लगाने के लिए बुलाने लगी थीं । उन्होंने अपने झुमके और अन्य आभूषण निकाल कर पलंग के सिरहाने रखा और मँझली से बोलीं - " अच्छा आज तेरी अम्मा से बात करती हूँ , बहुत जल्द वो तेरे भाई के लिए ऐसी ही साइकिल खरीद देंगी "

मँझली जानती थी कि ये कोरी बातें हैं - " अम्मा के पास पैसे कहाँ हैं बुआ ?"

भगवन्ता देवी ने उसके गालों को अपनी हथेलियों में लिया - " मैं उनको वो तरीका बताऊँगी , जिससे भगवान जी खुश हो जाते हैं और सच्ची प्रार्थनाएं सुन लेते हैं "...भगवन्ता देवी ने निश्चय किया था कि गोविंद की पत्नी को कुछ रुपये देंगी । छोटी है , मना नहीं करेगी ।

-" तो फिर बाबूजी के लिए साइकिल खरीदने के लिए भी कह देना बुआ , रोज शाम को बाजार से गुड़ बेचकर आते हैं तो थक जाते हैं , साइकिल रहेगी तो आने - जाने में भी आसानी रहेगी और ज्यादा गुड़ भी बेचने ले जा सकेंगे "....बालिका की आँखें चमक उठी थीं ।

"बहुत अच्छी बात बेटा ! मैं बोल दूँगी तुम्हारी अम्मा को "...भगवन्ता देवी मुस्कुराए जा रही थीं ।

दो दिन बीत गए थे । भगवन्ता देवी को तो कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा था लेकिन उनकी भौजाई को चैन नहीं । रह - रह कर वही बात छेड़ देती । आज भगवन्ता देवी दोपहर के भोजन के बाद आराम कर रही थीं कि धड़धड़ाते हुए आई कमरे में - " देखा बीबी ! आप कहती थीं कि कहीं इधर - उधर गिर गया होगा झुमका , चल कर बाहर देखिए । वो बिरुआ नई साइकिल चला रहा है , मँझली भी नई फ्रॉक पहने इतरा रही है और सुबह पकवानों की गंध तो आपकी नाक में भी आई ही होगी "

भगवन्ता देवी भी चौंक गईं । उन्हें अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि मँझली उनका एक झुमका चुरा ले जाएगी । दुःख झुमके की चोरी का नहीं था अपितु पीड़ा यह थी कि उनका मेहनतकश मायका जो अपनी ईमानदारी के लिए इलाके में जाना जाता था , उस परिवार की बच्ची ने यह नीच हरकत की । उसने लड़कपन में यह गलती कर ही दी तो क्या गोविंद और उसकी पत्नी का यह धर्म नहीं था कि झुमका वापस कर जाते ? उन्होंने तो खुद सोच रखा था कि जबरदस्ती वो उन्हें कुछ पैसे देंगी जिससे बीरू की साइकिल और कपड़े खरीदे जा सकें ।

सुभाष की पत्नी आवेश में थी - " अब मुझे रोकना मत बीबी ! मैं जा रही हूँ उनकी लंका लगाने "

भगवन्ता देवी ने भौजाई का हाथ पकड़ कर बिठाया - " ईश्वर की कृपा से मुझे धन की कमी नहीं है भौजी , ऐसे - ऐसे पचास झुमके गायब हो जाएं तो भी मेरी आर्थिक स्थिति पर कोई आँच नहीं आने वाली , लेकिन इन झुमकों की वजह से मेरे भाइयों में तू - तू , मैं - मैं होता देखना मेरे लिए मृत्युतुल्य कष्ट के समान होगा । तुम बेइज्जत गोविंद की दुल्हन को करोगी और शर्म के मारे मैं गड़ जाऊँगी । इसलिए हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हूँ कि झुमके के बारे में आज के बाद तुम कोई बात नहीं करोगी "

इधर भौजाई कुछ कहे बिना पैर पटकती बाहर निकली उधर गोविंद की पत्नी नई साड़ी पहने ,भगवन्ता देवी के कमरे में दाखिल हुई , पांव छूने के बाद बोली - " जीजी ! आज शाम को भोजन मेरे यहाँ करना है "

भगवन्ता देवी बेमन से मुस्कुराईं - " कोई खास बात है क्या बहू ?"

- "क्यों ? कोई खास बात रहेगी तभी भाई - भौजाई का घर पवित्तर करेंगी ? वैसे आपके आशीष से कल इनके बनाये गुड़ की सारी खेप एक साथ बिक गई । दाम भी अच्छे मिले हैं तो इन्होंने कहा कि दीदी को आज खाने पर नेवत आओ "...कहते हुए मुस्कुरा दी गोविंद बहू ।

हालाँकि झुमके की चोरी वाकई उनके लिए महत्त्वहीन था फिर भी भगवन्ता देवी का मन पता नहीं क्यों विषाद से भर गया था - " माफ करना दूल्हन ! आज तो जी में अच्छा ही नहीं लग रहा । लगता नहीं कि शाम को भोजन कर पाऊँगी । अभी तो एक हफ्ते हूँ यहाँ , फिर किसी दिन खा लूँगी "

गोविन्द बहू निराश हुई - " कोई बात नहीं जीजी ! मैं फिर किसी दिन आ जाऊँगी "

भगवन्ता देवी मुस्कुराईं और गोविंद की पत्नी चली गई । उसके जाते ही सुभाष बहू फिर आ धमकी - " देख रही हैं बीबी ! लाज शर्म सब घोल कर पी लिया कमीनी ने , आप ही का झुमका चुराकर आपको ही दावत कराने आ गई "

भगवन्ता देवी कुछ बोलीं तो नहीं लेकिन अब उन्हें यहाँ उद्विग्नता महसूस होने लगी थी । अद्भुत संयोग था , उधर चौधरी रामनाथ को पत्नी की याद ने बेकरार किया और कुछ रात गए मोटर लिए ससुराल आ धमके । भाई - भौजाई ने रोकने की बहुत कोशिश लेकिन भगवन्ता देवी न रुकीं । जाने लगीं तो सबकी नजर बचाकर दूसरा झुमका भी आँगन में विभाजन हेतु चली दीवार के उस पार , गोविंद के आंगन में फेंक दिया और चली गईं ।

सुबह आँगन में झाड़ू लगाते वक्त वह झुमका मँझली ने देखा और देखते ही पहचान गई । बुआ ने नहाते वक्त दीवार पर रखा होगा और इधर गिर गया होगा , यह सोचकर बिना किसी को बताए झुमका लिए तेजी से भागी ।

सुभाष के घर आकर बुआ - बुआ चिल्लाने लगी तो उनकी पत्नी झल्लाई - " क्यों सुबह - सुबह गला फाड़े जा रही है ? वो कल शाम को ही चली गईं "

-"उन्हें उनका झुमका देना था , आँगन में गिरा मिला ".. कहकर मंझली ने उनके सामने हथेली खोल दी ।

सुभाष बहू ने इधर - उधर देखा , घर में सब सो रहे थे । झुमका झपट कर ले लिया - " ठीक है ठीक है , मैं कल तक उनके घर भिजवा दूँगी , अब तू जा यहाँ से ।"

मँझली के जाने के बाद वो अपने कमरे में गई और बक्से में रखे पहले झुमके के साथ यह दूसरा झुमका भी रख दिया ।

चित्र गूगल से

आशीष त्रिपाठी

गोरखपुर

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