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इस्कियुज मी डार्लिंग...: सर्वेश तिवारी श्रीमुख

इस्कियुज मी डार्लिंग...: सर्वेश तिवारी श्रीमुख

सुबह सुबह जब आलोक पाण्डेय की नींद टूटी तो नित्य की भांति सबसे पहले मोबाईल का दर्शन किये। कोई मिस्डकॉल तो नही था, पर एक मैसेज बिना बताए पाकिस्तानी सेकुलर आतंकवादी की तरह मोबाईल में घुस गया था। पांडेजी ने मैसेज खोल कर देखा तो कांप गये, यह बबिता का मैसेज था। उसने इन्हें मकर संक्रान्ति पर दही चिउड़ा खाने के लिए आमंत्रित किया था। मैसेज में एक बड़ा दिल बना कर लिखा गया था- "जब तक आप नही खा लेंगे हम भी दही चिउड़ा नही खाएंगे पंडीजी"।आलोक पाण्डेय का कलेजा मैसेज पढ़ते ही समाजवादी पार्टी की तरह डोलने लगा। मन का मुलायम हिस्सा कह रहा था कि "चलो ना पंडित, किसी का दिल नही तोड़ते", तो रामगोपाली धड़ा कह रहा था- अबे ठहर जा, जायेगा तो दिल बचाने के चक्कर में हड्डियां टूट जाएँगी। बड़ी उलझन थी, आलोक जी कोई निर्णय नही ले पा रहे थे।आखिर डेढ़ घंटे की कसमकश के बाद मन का मुलायम धड़ा जीत गया। आलोक जी तुरंत मोबाईल उठा कर बबिता के मैसेज का रिप्लाई टाइप करने लगे। अचानक उन्हें याद आया कि मोबाईल का मैसेज हमेशा अंग्रेजी में लिखना चाहिए। यह नये युग का चलन है कि पांचवी में पांच बार फेल लड़का भी जब प्रेयसी के पास मैसेज लिखता है तो अंग्रेजी में ही लिखता है, मैं तो फिर भी मास्टर हूँ। उन्होंने लिखा- ओके डार्लिंग, आई विल मस्ट कम टू योर होम ऑन साढ़े आठ बजे।

आलोक पाण्डेय जब बिछावन से उतरे तो उनका मुखड़ा मोदी के नाम पर भाजपा से चुनाव जीते किसी किसी पूर्व कांग्रेसी की तरह चमक रहा था। अचानक उन्हें याद आया कि आज खिंचड़ी है, आज तो नहाना पड़ेगा। उनके चेहरे की चमक एकाएक ऐसे गायब हो गयी जैसे बैनर पोस्टर लगवाने के बाद अचानक पार्टी ने उनका टिकट ही काट दिया हो। पर यहां कोई उपाय तो था नहीं, बिना नहाये बबिता के घर जाते तो बीडीओ से पहले वही थुरने लगती। आखिर हार कर आलोक 'जय हनुमान ज्ञान गुण सागर' गाते बाथरूम में घुसे। जब पहला लोटा का पानी गिराये तो अचानक उनका स्वर डेढ़ बैटरी के रेडियो से डीजे में बदल गया। वे जोर से चिल्लाने लगे- हाथ बज्र और ध्वजा बिराजे, कांधे मूज जनेऊ साजे... जब जब लोटा का पानी गिरता उनका स्वर तेज हो जाता। छः लोटा पानी से पौने डेढ़ मिनट के स्नान में ही पूरा रतसड़ गांव जान गया कि आज आलोक बाबा नहाएं है।

बाथरूम से निकल कर आलोक जी ने पत्नी को हाँक लगाई- इस्किउज मी बितू, पिलिज गिभ मी माइ बनियाइन।

बितू सुन कर पिनकी अर्धांगिनी ने उसी तेवर के साथ बेटे से कहा- इस्किउज मी बेटा, पिलिज गिभ मी माइ बेलन। योर पापा इज बबितवासिंग टुडे।

बेलन का नाम सुनते ही आलोक जी सट से भागे और पांच मिनट में सूट बूट चढ़ा कर छैला बाबु बने गाड़ी निकालने लगे। उन्होंने जाते जाते पत्नी से कहा- आई ऍम गोइंग टू माइ ओल्ड फ्रेंड्स होम फॉर इट दही चूड़ा।

पत्नी ने अंदर से जवाब दिया। न हो तो डॉक्टर नित्यानंद शुक्ला को लेते जाइये, चरण लुटैया छंद सुनायेंगे।

आलोक जी अंग्रेजी छोड़ कर हिन्दी में बोले- अरे शुभ शुभ बोल कम्बख्त, फिर थुरवायेगी क्या।

गाड़ी ले कर भागे आलोक पौन घंटे में बबिता के दरवाजे पर थे। दरवाजे पर ही दरबान ने बताया कि साहेब कहीं जाँच में गये हैं। आलोक जी ने मन ही मन कहा- भगवान करे कि उधर ही ऊफर पर जाये ससुर, और मन ही मन खुश होते घर में घुस गए।

पिली साड़ी में लिपटी बबिता को देखते ही आलोक को आभास हुआ कि बसंत आ गया। बसंत के पहले झोंके से हिल उठी सरसो की फूल भरी डाली की तरह लचकती बबिता ने जब कहा- "परनाम पंडीजी" तो आलोकजी को लगा जैसे भारत के प्रधानमन्त्री मोदी नहीं बल्कि श्रीयुत आलोक पाण्डेय ही हैं। उन्होंने छाती पर धीरे से एक मुक्का मार कर कहा- यूँ ही चमकती रहो बबिता।

बबिता ने तुरंत ही आलोक जी के लिए आसन लगाया और पत्तल परोस दिया। साढ़े सात सौ ग्राम चिउड़ा, डेढ़ किलो दही और ढाई सौ ग्राम चीनी के बाद एक कटोरा आलू-गोभी-ढेंढ़ी की तरकारी दबाने के बाद जब आलोक जी ने लम्बी डकार मारी, तो बबिता ने उनके चरणों पर एक सौ इक्यावन रुपया रख कर प्रणाम किया। रूपये को जेब के हवाले करते आलोक बोले- इस्कियुज मी डार्लिंग, मे यु गिभ मी योर दिल फॉर पांच मिनट इन भोजन दक्षिणा?

इसके पहले कि बबिता कुछ कहे, पीछे से आवाज आई- यस यस मिस्टर चरित्रहीन पाण्डेय, आई विल गिभ यु मोर थिंग। दिल क्या हम तो तुमको आज उ भोजन दक्षिणा देंगे कि अगले जन्म तक याद रखोगे।

आलोक जी ने नजर घुमाई तो देखे- हाथ में नँगी तलवार लिए बीडियो कमरे में घुस रहा है।

भोजन के आसन पर बैठे आलोक ने अभी हाथ भी नही धोया था, कि उन्हें चार मोटी मोटी रस्सियों से खम्बे में कस दिया गया। हाथ में तलवार लिए बीडियो गरजा- क्यों बे चरित्रहीन, इतनी मार खाने के बाद भी तेरे को शर्म नही आती? ये कम्बख्त तो गधी है। मैंने इससे कहा था कि गोपालगंज से किसी श्रीमुख शांडिल्य गोत्रीय पवित्र ब्राह्मण को बुलाते हैं, तो इसने कहा ना, मेरे आलोक जी हैं न! ये तो मुर्ख है हीं, पर इतना छीछालेदर होने के बाद भी तुझे दूसरे की बीबी को लाइन मारते शर्म नही आती? अबे साफ नेता है क्या बे?

आलोक गिड़गिड़ाए- देखिये हाकिम, भले हमको चार कोड़ा अधिक पीट लीजिये पर बबिता को गधी मत कहिये। उसको कोई कुछ कहे तो हमारे कलेजे में आग लग जाती है। और देखिये, हम बबिता को लाइन नही मारते, हम उससे प्यार करते हैं।

बीडियो गरजा- अबे चुप्प टकले, मेरे ही सामने मेरी बीबी से प्यार की बात करता है? अरे सिपाही, तनिक कोड़ा लाओ तो...

अचानक बबिता ने बीडियो का हाथ पकड़ा और बड़े प्यार से बोली- सुनिये न, बचपन में मैंने सुरुज महाराज से मन्नत मांगी थी कि यदि मुझे बहुत प्यारा पति मिला तो एक बाभन चढ़ाऊंगी। तो क्यों न हम आलोक बाबा को हीं...

बीडियो चिहुका- बाभन चढ़ाने का क्या मतलब हुआ जी? क्या बलदान चढ़ाना है?

बबिता ने मुस्कुरा कर कहा- हाँ।

बीडियो बोला- अरे पागल तो नही हो गयी? मडर केस में बीस साल के लिए जेल जाना पड़ जाएगा।

- उसका भी उपाय है मेरे पास। कभी कभी बलदान भाखने के बाद भी बकरे का सिर्फ कान काट कर छोड़ देते हैं गांव में। तो उसी तरह हम भी आलोक बाबा का दोनों कान काट देते हैं। मन्नत भी पूरी हो जायेगी, केस भी नही होगा, और आलोक बाबा को भी ज्यादा कष्ट नही होगा।

बीडियो ने मुस्कुरा कर कहा- यह ठीक है, रुक जाओ अभी माला ले कर आ रहा हूँ। बलदान के समय बकरे को माला पहनाना जरुरी होता है न।

बीडियो माला लाने गया, और इधर आलोक बाबा ने एक निरीह दृष्टि बबिता पर ऐसे डाली जैसे बकरा कसाई को देखता है।

अचानक उन्हें जाने कहाँ से वह जोश आया कि जोर "या बबिता" चिल्ला कर एक ही बार में सारी रस्सियां तोड़ दिए, और ऐसा भागे कि सीधे घर आ कर रुके। उनकी साँस धौंकनी की तरह फूल रही थी।

पत्नी ने पूछा- क्या हुआ? साँस क्यों फूल रही है जी?

आलोक बोले- वो दही थोड़ा खट्टा था, सो हाँफ बढ़ गया है। एक लोटा पानी दो न पिलिज।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

मोतीझील वाले बाबा

गोपालगंज, बिहार।

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