त्योहारी गुलाब... सर्वेश तिवारी श्रीमुख

त्योहारी गुलाब... सर्वेश तिवारी श्रीमुख

नवम्बर का महीना उदासियों का महीना रहा है। मन नहीं लगता। गाँव उस घर की तरह लगता है, जिस घर से बेटी विदा हुई हो। आदमी उदास, पेंड़ उदास, हवा-पानी उदास... पता नहीं कौन और क्यों घनानंद की कविता गा जाता है।

हालाँकि गाँवों के लिए नवम्बर अब बेटियों से अधिक बेटों के विदा होने का महीना हो गया है। नवम्बर के महीने में गाँव की सड़कें शहर की ओर जाती तो हैं, उधर से आती नहीं हैं। छठ दीवाली के नाम पर बॉस से चिरौरी कर के हप्ते भर की छुट्टी पाए युवकों को यदि किसी तरह रेल का रिजर्वेशन भी मिल जाय तो गाँव में जिनगी को ढो रहे बुजुर्गों के चेहरे पर चार दिन के लिए त्योहारी गुलाब खिलता है। शहर नहीं जानते इस त्योहारी गुलाब का सौंदर्य, गाँव समझता है। तभी चार दिन के बाद फिर शहर की ओर लौटते युवकों को देख कर उदास हो जाता है गाँव... गुलाब कुम्हला जाते हैं।

गाँव में अब कोई नहीं रहता। कोई रहना चाहता ही नहीं। सबके पास गाँव छोड़ने के अपने पर्सनल बहाने हैं। लड़कों को बेरोजगार बनने के लिए शहर जा कर पढ़ाई करनी है। युवकों को शहर में घर बनवाना है। एक घर बनाने के लिए वे अपने मूल घर को छोड़ कर जीवन भर परदेश में खटते रहते हैं। कितना अजीब है कि कोई घर बनाने के लिए बना बनाया घर छोड़ दे...

बहुओं के पास बहाना है कि "उनको खाना बनाने में बड़ी गजन होता है, उपासे डिप्टी चले जाते हैं। हम रहेंगे तो खाने-पीने का दिक्कत नहीं होगा।"

गाँव के बुजुर्गों के पास शहर जाने के लिए कोई बहाना नहीं। छठ में घर आया बेटा पिता का दुख देख कर उनका मन रखने के लिए कभी कह देता है, "आप भी चलिए न बाबूजी! का रक्खा है गाँव में?" लेकिन कहते हुए मन ही मन डरता है कि बाबूजी कहीं चलने की हामी न भर दें। वह जानता है कि साढ़े सात हजार के किराए पर मिले, एक कमरे के फ्लैट में बाबूजी के लिए कहीं से भी एक खटिया भर की जगह नहीं बन सकती। उसका भी क्या दोष... पर बाप भी बाप होता है, सब समझता है वह। वह अपना बहाना खोज लेता है, "चलने का मन तो बहुत है बबुआ, लेकिन चले गए तो झमड़ा पर का सारा कोंहड़ा तूर ले जाएगा सब। फिर तीनकठवा खेत मे मकई भी बोना है। इस बार छोड़ दो, अगली बार पक्का चलेंगे। तुम चिन्ता जन करो, हमको इहाँ तनिको गजन नहीं है।"

दोनों जानते हैं कि यह "अगली बार" कभी नहीं आएगा। दोनों झूठ में जीते हैं। उनके झूठ को सुन कर मौसम और उदास हो जाता है।

इतिहास कहता है कि भारत गाँवों का देश है, वर्तमान कह रहा है कि भारत अभावों का देश है। वस्तुतः गाँव से शहर की यात्रा मूलतः सम्पन्नता से अभाव की यात्रा है। गाँव सीमित आवश्यकताओं के साथ सुखी जीवन का क्षेत्र है, शहर असीमित इच्छाओं के पीछे पागलों की तरह भागने वालों की भीड़! पहले औद्योगिकरण ने, और फिर संचार क्रांति ने गाँवों में भी शहरी इच्छाओं का बीज बो दिया, सो गाँव भागने लगे शहर की ओर! कौन रोके... कैसे रोके...

कभी कभी तो लगता है कि सिर्फ नवम्बर क्यों, गाँव हमेशा ही उदास रहने लगे हैं, पर कभी लगता है कि गाँव कभी उदास नहीं होते। गाँव अब भी हँसते हैं। पहले एक साथ सौ लोग हँसते थे अब दस लोग हँसते हैं, पर हँसते जरूर हैं। यह नवम्बर शायद यूँ ही मनफेर के लिए आता है।

कभी हिन्दी का साहित्य गाँव का साहित्य होता था। आज भी होता है, लेकिन गाँव की कथा शहर में बैठ कर लिखी जाती है। साहित्यकार अब गाँव में नहीं रहते, दिल्ली में रहते हैं। शायद इसीलिए झूठ का पोटला लिखा जा रहा है... झूठा समय, झूठा साहित्य!खैर...

छठ बीत गया है। मेरे गाँव के बूढ़ों के चेहरे पर खिले त्योहारी गुलाब अब कुम्हलाने लगे हैं। बेटे वापस जा रहे हैं न!

मुझे कहीं नहीं जाना। मेरी माँ के चेहरे पर खिले गुलाब नहीं कुम्हलायेंगे। मैं सौभाग्यशाली हूँ शायद! ईश्वर की कृपा...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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