बिहार.... जहाँ आज भी ख़नक जिंदा है!

बिहार.... जहाँ आज भी ख़नक जिंदा है!

हमें जीवन में जब किसी भौगोलिक क्षेत्र की सामाजिक व सांस्कृतिक आत्मा को जानने समझने की जिज्ञासा होती है तो "बिहार" की। उसी बिहार में जहाँ आधा जीवन बुद्ध व महावीर भटक के बिता दिए, वही बिहार जहाँ से राजेन्द्र बाबू जैसे सहज निःस्वार्थ महात्मा हुए, वही बिहार जो प्रत्येक कालखण्ड में शासन की निरंकुशता का स्पष्ट प्रतिकार किया है। क्या -2 बताएं.......!!

शैक्षणिक प्रयोजन से बिहार जाने का अवसर मिला , मेरे भौतिक गरीबी का सम्मान करती हुई गरीब रथ ने हमें पटना स्टेशन पर उतार तो दिया लेकिन महावीर मंदिर के आगे से आई मानवीकृत बाढ ने सारा प्लास्टिक का अंबार सड़को पर लाकर जमा कर दिया है .......!! मानो शी चिनफिंग के भव्य स्वागत हेतु पटना में प्लास्टिक श्रृंखला बनाई गई हो। वहाँ एक हितेच्छ के वहाँ आतिथ्योपान भी हुआ, मन जितना हर्षित था , उसी अनुपात में अस्थियों व माँसपेशियों में पीड़ा भी । लेकिन अभी जाना बाकी था सीतामढ़ी , वहीं जहाँ विदेह राज जनक को हल चलाते समय माटी के गगरी में जानकी की प्राप्ति हुई थी। पटना से बस में सवार हुए मुजफ्फरपुर से हाजीपुर होके सीतामढ़ी के निकट आ पहुँचा ।तभी एक चालीस वर्षीय दम्पति हमारे दाहिने तरफ की सीट पर आ बैठे.....बस जिस स्थान पर थी वहाँ से मैं पूर्णतः अनभिज्ञ था।

मैं बस की खिड़कियों से बाहर देखते हुए वहां की हरीतिमा को स्वयं में समेट लेने का विफल प्रयास कर रहा था, और वो चचा अपने दाहिने हाथ से बायें ओर की जेब से हरे रंग की चमचमाती "खैनी निधि" चुनौटी को बाहर निकाल चुके थे। बस के शीशे पूर्णतः बन्द थें...., इधर वो हथेली में खैनी लेकर उसमे मिलाने के लिए अंगूठे के नाखून से कैल्शियम ऑक्साइड काट रहें थें...., और उधर मैं चार- पांच बार छींक सकने हेतु शक्ति संचय कर रहा था।

सहसा मेरी दृष्टि बस के टीवी में चल रहे बागवान के उस सीन पर जा टिकी जब " अपने बच्चों के साथ अमिताभ और हेमा की अलग रहने की तैयारी हो रही थी, और हेमा अपने बहते अश्रुओं को सम्हालती हुई अमिताभ से खहतीं है...".गले में रुद्राक्ष पहने रहना , कहतें है कि दिल के पास रुद्राक्ष रहने से ब्लडप्रेशर ठीक रहता है, ठंढ़ी चीज से परहेज है आपको !!" ....उन दोनो की भावुकता अब चौबीस इंच के टीवी स्क्रीन से होकर मेरे आँखों से बह जाना चाहती थी।

यहाँ खैनी का सर्वश्रेष्ठ मिश्रण तैयार हो चुका था, जैसे ही चचा ने खैनी को मुँह की ओर दिशा दिया और उनकी जिह्वा उसे व्यवस्थित करने लगी..., मैं पूछ पड़ा...."अच्छा चचा ई सीतामढ़ी डिस्ट्रिक हs का"?

वे निर्वेद भाव से खैनी के परमानन्द में निमग्न रहें, तबतक उनकी भार्या अपने आँचल को पुनः सर पे स्थापित करते हुए बोली "भक्क ई त जिल्ला है न" !!!

हम स्तम्भित रह गएं ......बोल पड़े "अच्छा"...!!

अब वापस जाना है, दिल्ली बस मिल गई है सीधा दिल्ली के लिए ही.....!! धूप की तपिश और मेरे शरीर के ज्वरताप ने मानो मुखमण्डल की आभा ही मार दी हो !!

वहीं एक पचास वर्षीय चचा जी भी बस के खुलने की प्रतीक्षा में थें.....उनको निहारने में तल्लीन होता गया....!

साँवले रंगत की एकहरी शरीर थी उनकी....पसीना उनके कर्णपल्लव के समीप से निकल कर उनके पिचके गाल के गड्ढों में ठहर कर गले तक बह रहा था। और चचा इस पसीने के ज़ुल्म को दरकिनार करतें हुए ना जाने क्या बिचारे जा रहें थें!! मुझे अपनी ओर देखता देख मुस्कुराने लगे..., उस चेहरे पे पसीने अब उनके जुझारूपन, संघर्ष, और जीवटता का प्रमाणपत्र प्रकाशित कर रहें थें।

उनके श्रीमुख पर बिहार के अतीत का गौरव, व वर्तमान का संघर्ष सहित " अन्य राज्य में बिहारी शब्द के साथ तिरस्कार" की लज्जा साथ ही भविष्य के उत्कर्ष की किरणें स्पष्ट झलक रहीं थीं। शायद यह दृश्य मेरे इस यात्रा सबसे प्रभावी क्षण होगा जिसे सरलता से विस्मृत न कर पाऊँगा।

बड़भागी रहा वो चचा मेरे ही बगल में बैठ कर यात्रा कर रहें हैं..... मेरे बात-चीत से काफी सझज अनुभव कर रहें हैं...! उन्होंने बस में आए नारियल वाले से दो कतरी नारियल भी खरीदा.....एक मेरी ओर बढ़ा दिए.....!!

आज मैं पहली बार किसी यात्रा में कुछ खाने के प्रस्ताव को मना न कर सका....क्योंकि उन्हें लग जाता कि इतने सहृदयता से बात करने वाला युवक मेरी दी हुई चीज न खाकर मुझपर सन्देह कर रहा है , और हाँ मैं उस "बिहार के बिहारी" के हृदय की विशालता को कमतर नही करना चाहता था, जो पंजाब में ग्यारह हजार की पगार पर अधेड़ आयु में अपनी अस्थियाँ गला कर भी प्रशांत महासागर सा कलेजा रखता हो!! मन मे यही उद्गार उठ रहें थें, धन्य हो बिहार मात्र तुम्हारी ही उर्वरता ऐसे विशाल हृदय के मनुष्यों को जन्म देती है। बिहार से तो आ गये लेकिन सहयात्री चचा के साथ होने से ऐसा लग रहा है कि बिहार और बिहार का यथार्थ साथ लिए जा रहा हूँ !!

चचा सो रहें हैं..., इनको नही पता कि इन्हीं के ताकत से बिहार सूरज के सतह पर भी "बिहार" लिखने का जज़्बा रखता है।

अमन पाण्डेय

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