रद्दी (कहानी)

रद्दी (कहानी)


गर्मी की छुट्टी आधा बीत गई लेकिन तू किताब खोल कर एक अक्षर नहीं पढ़ा। संवरू की अम्मा ने रोटी बेलना रोक कर संवरू को घूर कर कहा।

अम्मा.... का करें बताओ..... दसवीं की किताब है नहीं। बाऊजी से पन्द्रह दिन से किताब खरीदने को कह रहे हैं वो हैं कि रोज टाल जाते हैं। कहते हैं कल लायेंगे, परसों लायेंगे लेकिन लाते नाहीं हैं। बताओ न अम्मा ! बिना किताब कॉपी के कौन सी पढ़ाई करें ? दुर्गेश और बसंत को किताब खरीदें दस दिन से ऊपर हो गया। अब तो वो सब ट्यूशन भी पढ़ने लगे है।

संवरू की बात गलत कहां थी। पिछले साल जब किताबें थीं तो अम्मा ने कभी पढ़ने के लिये टोंका कहाँ था ? अम्मा के हाथ की चूड़ियाँ दुबारा बजने के साथ चुपचाप रोटियाँ बनाने में लग गयें। गरीबी की चिंता और चूल्हे की पीली लपट की गर्मी चेहरे पर बिखरने लगी।

शाम को खाना खाने के बाद संवरू की अम्मा ने उसके पापा से किताबों का जिक्र छेड़ा- अरे संवरूआ क किताब काहें न खरीद देते... बेचारा किताब के नाते कुछ पढ़ी नाहीं पा रहा।

खर्च का नाम आते ही तीरथ ने बीड़ी के बंडल से एक बीड़ी खींचकर हाथ में निकाल कर बोला-

गये थे दोकान पर कुल साढ़े चार सौ कि किताब है एतना पैईसा जूर नहीं रहा, का करें बताओ ? मजूरी से घर क खर्चा चलाना मुश्किल है किताब-कॉपी की कौन बात।

परधान से भी उधार मांगे लेकिन फट्टे नकार गये इतना कहकर तीरथ ने बीड़ी और आग का मिलन कराकर धुएं में समस्या का हल ढूँढने लगे।

अरे ! तूहूँ तो परधान के घर चौका-बरतन करने जाती हो काहें नाहीं तूही परधाईन से कहती।

ऊँह ! वो भले दे रहीं हैं...

पैसा।चौका-बरतन के हिसाब में तीन-तीन महीने लगा देती हैं पांच सौ रूपया दे रहीं हैं भला। इतना कहकर संवरू की अम्मा उठकर चलीं गई बछिया को नाद से घारी में बांधने।

संवरू के साथ के बहुत संगी-साथी गरीबी से तंग आकर बैंगलूर और दिल्ली पकड़ लिये लेकिन संवरू को शुरू से ही पढ़ने का शौक था। मेहनत-मजूरी के बाद लालटेन जला कर रात देर रात तक पढ़ता था वह भी बिना किसी निर्देश-आदेश के।

दो दिन बात अचानक संवरू दौड़ते हुए अम्मा के पास आया और हाँफते हुए बोला अम्मा आज परधान जी के घर गये थे उनका गेंहूँ पिसवाने। अम्मा ! उनके घर मझले भैया की दसवीं की किताब रखी थी। हम चाची से उन किताबों के बारे में पूछे तो चाची बतायीं कि इसको रद्दी में बेचना है। अम्मा किताब एकदम ठीक है। रद्दी में बेचने पर कितना मिलेगा ? रद्दी वाला पन्द्रह-बीस रूपये से ज्यादा नहीं देगा और हमरे लिये वो किताब पांच सौ रूपये से कम नाहीं। अम्मा, आज सांझ को चाची से तुम्हीं किताबें मांग लो नहीं तो वो रद्दी वाले को बेंच देंगीं। बरामदे के कोने, एक गत्ता में रखी है किताबें।

अम्मा- पता नहीं देंगी कि नाहीं ? ऐसा न हो कि मुंह भी खोलें और नकार जायें। कब्बो-कब्बो बड़ी छोट बात मना कर देतीं हैं। पिछले सोम्मार को एक सेई आटा मांगने गये थे साफे मना कर दीं।

अम्मा ऐसा नहीं करेंगी। आज तक परधाईन चाची क कौउनो बात काटे नाहीं हैं। जै बार बजार चाहे दुकान पर भेंजी होंगी कब्बो हम मना नहीं किये संवरू ने बड़े विश्वास से कहा।

चलो कहेंगे ! बहुत होगा तो मना ही न करेंगी संवरू की अम्मा ने लाचार होकर कहा।

सांझ को संवरू की अम्मा परधान के घर का गेंहूं फटक रही थी और ध्यान केवल रद्दी और गत्ते पर लगा था। गेंहूँ फटकने के बाद परधाइन दो सेई मजूरी देने आयीँ, संवरू के अम्मा को......

मलकिन आज हम मजूरी नहीं लेंगे......

परधाइन चौंकी ! काहें रे आज काहें मजूरी नहीं लेगी।

मलकिन... आज हमको मजूरी के बदले मझिला बाबू वाली पुरनकी किताबिया दे दिजिये, जो आप रद्दी में बेचे के लिये रक्खी हैं।

अरे! पुरान, रद्दी किताब लेके का करेगी... उ सब फटहा-पुरान किताब।

मालकिन हम सब गरीब आदमी हैं रोज आपके घर का बासी खाना लेकर जाते हैं। परधान जी का बुशर्ट और आपकी साड़ी-कपड़ा पहनते हैं और कभी खाने और पहनने से मना नहीं करते। मालकिन जब आपके घर का बासी खाना हम बड़े चाव से खाते हैं। आपकी दी हुई पुरानी साड़ी हम बियाह-शादी में पहन लेते हैं तो किताब कैसे पुरान हो गयी।

मालकिन निरुत्तर हो गयीं और चुपचाप संवरू के अम्मा को देखने लगीं।

मलकिन हमरे संवरू का मन पढ़ाई में बहुत लगता है। एही किताब के लिये कल से आठ बार हमसे कह चुका है एकदम बैठल-उठल हराम कर देहले बा।

अच्छा जा बुला के लाओ संवरू को जौन मन करे ले जाये किताब।

संवरू की अम्मा रोज से तेज भाग कर, घर पंहुची और संवरूवा को चिल्ला कर बोलीं- संवरूवा किताब मिल गई ..झोरा लेकर जल्दी आओ।

संवरू साइकिल के कैरियर में झोला दबा कर चेतक की रफ्तार पकड़ कर परधान के दुवार पर ही रूका....

संवरूवा...देख कौन किताब चाही जाके छांट ले... संवरू को देखकर परधाईन बोलीं।

मझिला भैया के लिये तो आज तक वह रद्दी ही थीं लेकिन संवरूवा कि व्यग्रता ने मझिला को रद्दी की तरफ दुबारा खींच लिया। फिर वह रद्दी में न जाने क्या ढूँढने बैठ गये। न जाने उन पुरानी किताबों में क्या छुपा है जो संवरूवा को बवला बना रखा है। इसी खोजबीन में दो-तीन किताबें अपने काम की निकाल लिया मझिला भैया ने।

उधर संवरू के लिये वह रद्दी, अल्ली बाबा का खजाना था.. समझ ही नहीं पा रहा था कि किताब कहां से निकालें... कभी गणित की किताब उलटता-पलटता कभी विज्ञान और कभी अंग्रेज़ी-संस्कृत. ...पन्द्रह दिन के मन की मुराद आज पूरी हो गई।

उसमें कुछ अधूरी कापियां भी थीं जिसमें दस-बीस पन्ने छूटे पड़े थे।

अम्मा पूछो...इ कॉपी भी ले लें सब मे से पन्ना निकाल कर एक कापी बना लेंगे..... जब तक अम्मा पूछतीं तब तक परधाइन बोल पड़ीं अरे ले जो न का पूछत बाटे।

आधे घंटे तो संवरू को किताबों को उलटने-पलटने और उनसे मिलने में लग गया कौन किताब ऊपर रख कर बांधे, कौन नीचे। अभी से चिंता कि किसको सीना है किसको साटना किसके गायब दो पन्नों को बसंत के किताब से लिखना है।

अरे ! गणित की तो उत्तरमाला ही नदारद है। फिर चिंता कैसे सवाल जांचेंगे ? चलो बसंत से गणित की उत्तर माला मांग कर एक कापी में लिख लेगें इ कौन बहुत कठिन चीज है। तब तक जनरल नॉलेज की एक किताब मिल गयी.... पूरी दुनिया के सवाल-जबाब देखकर अचंभित हो गया संवरू। अंग्रेज़ी की कुंजी भी है चलो मुई अंग्रेज़ी बहुत परेशान करती है। फ्री का एक मास्टर मिल गया। किताब बांधने के बाद संवरू को घर जाने इतनी जल्दी हो गई जैसे खूंटे से छूटते बछड़े को नाद पर जाने की।अम्मा जल्दी चलो घर....

अम्मा भी बहुत खुश थी रोज के बासी पर आज का रद्दी बहुत भारी था। संवरू साइकिल की अधिकतम रफ्तार पर था अम्मा अपने पैर के... हांफ रहीं थीं लेकिन खुशी वाली हांफ चेहरे पर फैल रही थी।

रात तक संवरू किताबों को साटने, सीने और जिल्द चढ़ाने में खोया रहा और अम्मा किताबें उलट-पलट कर देखतीं रहीं। संवरू की अम्मा निरक्षर जरूर थीं लेकिन अक्षरों की कीमत वह सोने बराबर समझती थीं।

सुबह तक रद्दी की शक्ल बदल चुकी थी सभी किताबों को अखबार के परिधान पहना कर ऊपर एक चिप्पी लग गई थी।

हर किताब के ऊपर पर लिखा था

नाम- संवरू कुमार

पिता का नाम- तीरथ कुमार

कक्षा- 10

वर्ग- ब

स्कूल- किसान इंटर कालेज

देवरिया

रिवेश प्रताप सिंह

गोरखपुर

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