लखनू पंडित...गायन मंडली . रिवेश प्रताप सिंह

लखनू पंडित...गायन मंडली . रिवेश प्रताप सिंह


लखनू पंडित और उनकी गायन मंडली दस बीस गाँवों में अपने गीत-गुंजन हारमोनियम, तबले और खजड़ी से खूब जानी पहचानी जाती थी. पंडीजी के दुआर पर सुबह दो- चार लोग सट्टा बुक करने के लिए खड़े ही मिलते क्योंकि सुबह के बाद मंडली किस गांव या चौराहे पर भजन-कीर्तन गा रही है यह पता करना एक टेढ़ी खीर थी.

लखनू पंडित का कोई भी सट्टा पन्द्रह सौ से कम में बुक नहीं होता उसमें बयाना, कम से कम पाँच सौ रुपैय्या! मंडली में गांव के दो हम उमरिया (मंगरू-केसरी) खजड़ी पीटते. बराबर के गांव के विष्णु कहार, बांसुरी बजाने में माहिर तथा पंडीजी के सगे साढ़ू (कैलाश बाबू) ढोलक बजाते..लेकिन हारमोनियम और माइक पर एकाधिकार सिर्फ एक व्यक्ति का था वो थे अपने 'लखनू पंडित'.

मंडली जब सज कर निकलती तो पंडीजी की शारीरिक साजसज्जा देखने लायक रहती. घुटने तक कुर्ता. चुनट काढ़ती धोती. माथे पर चंदन, पीछे सिंगल गांठ की चुटिया..पूरा आभा मंडल दूर से चमकता था पंडीजी का.

मंडली में पैसे के बंटवारा कुछ यूं था कि सौ-सौ रूपये खजड़ी पीटने वाले को. सौ ही.. बांसुरी वादक विष्णु को. लेकिन अपने साढ़ू को दो सौ रूपये देते थे लखनू पंडित.. शेष पन्द्रह सौ और ईनामी रकम के पूरे हकदार अकेले होते.. लखनू बाबा.

इलाके में लखनू पंडित अकेले गवैया थे सो खूब चटकी थी मंडली. सट्टे पर सट्टा लड़ जाता था. रोज खजड़ी बजती थी. लाउडस्पीकर में पंडीजी की वेदवाणी पूरे गाँव जवार में सबको हाथ जोड़कर खड़ा करने पर विवश कर देती.

अब जिन्दगी कोई जलेबी की चाशनी तो नहीं की रोज एक तार की उतरे.. देखते ही देखते खजड़ी पीटने वाले के भीतर हारमोनियम बजाने का ख्वाब पलने लगा.. पिछले बारह बरीस में ऐसा कोई श्लोक, भजन और देववाणी बची ही नहीं थी जिसे मंगरू एक सांस से उतार न लें.

बगावत का बिगुल बज चुका था.. मंगरू और केसरी की पार्टनरशिप में योजना तैयार हो गयी. सीखना था सिर्फ हारमोनियम बजाना..अब हारमोनियम कोई अपरिचित चीज तो थी नहीं सिर्फ हाथ लगाकर साजने की देरी थी.. उधर मंगरू पन्द्रह दिन रिश्तेदारी का बहाना बनाकर शहर धर लिये और पन्द्रह दिन के रियाज़ में इतना तो सीख ही लिये की लखनू पंडित के सीने पर मूंग दल सकें. मंगरू जब पन्द्रह दिन बाद लौटे तो पुरानी लुंगी में एक सेकेंड हैंड हारमोनियम बांधकर उतरे.

नई मंडली सजी.. मंगरू हारमोनियम पर नियुक्त हुए.. केसरी अकेले खजड़ी का विभाग थाम लिये.. विष्णु एक सौ साठ रुपये की वेतनवृद्धि पर लखनू बाबा की मंडली से बगावत करके मंगरू पंडित के मंडली में शामिल हो गये. बस एक ढोलकिया की नई नियुक्ति हुई और हो गई दूसरी मंडली तैयार! हांलाकि लखनू बाबा तक विद्रोह की इतनी लपट तो नहीं पहुंचीं थी लेकिन बगावत के तपन से पसीने की कुछ बूंदें माथे पर बराबर देखे जा सकते थे.

मंगरू ने पहला ही सट्टा आठ सौ में बुक करके बाज़ार में एक रियायती विकल्प खोल दिया. चौराहे पर जब पहली बार माइक से आवाज़ फूटी तो लखनू बाबा की खटिया कांप उठी. पान की पीक थूककर साइकिल चौराहे की तरफ दौड़ा दिये बाबा.. अब जैसे-जैसे चौराहा करीब आ रहा था लाउडस्पीकर की आवाज़ युद्धघोष की तरह ललकार रही थी..

पूरे चौराहे पर एक ही स्वर

"हरि बोल"

"हरि बोल"

लखनू बाबा जब मंडली के सामने की भीड़ चीरकर घुसे तो उनके शागिर्द ने एक क्षण मंडली रोककर अपने गुरु का अभिवादन किया और फिर हाथ ऊपर उठाकर बोला-

"हरि बोल"

लखनू बाबा के पैर काँपने लगे. पूरा शरीर शक्तिहीन हो गया लेकिन खुद को किसी तरह सम्भालकर साइकिल को टहलाते हुए अपने दुआर पर पहुंच पाये. दोपहरी का खाना, मानो पाथर चबाना.. खटिया पर इतने करवट बदले की दर्जनों खटमल सिर्फ उनके करवट के उठापटक से अपने ही जमीन से बेदखल हो गये.

कार्यक्रम खतम होने के बाद लखनू बाबा अपने साढ़ू के साथ मंगरू के घर आ धमके. जहाँ नई मंडली नवीन वेतन बंटवारे पर हर्ष मना रही थी.

लखनू बाबा को देखते ही पूरी मंडली ने उनके चरण छू कर अभिवादन किया-

लखनू बाबा झटके से दो फिट पीछे हटे और चीखकर बोले- कपार पर जूता बरसाकर चले हो गोड़ धरने..

मंगरू- " बाबा हम कवन गलती किये? बताइए तनिक!"

लखनू- " तुम्हारी यह मजाल कि तुम हारमोनियम बजाओगे?"

मंगरू- " काहें हारमोनियम सिर्फ आपे के हाथे बजी हम बजायेंगे तो पाप लग जायेगा कि अछूत हो जायेगा.

लखनू- " हमार नकल करके भले दू-चार सौ रूपया लूट लो लेकिन लखनू पंडित बने में सात जनम लग जायेगा मंगरूवा"

मगरू- " मतलब हम केवल खजड़ी बजायें और सब रूपया-पईसा आप चांप के रख्खे"

लखनू- " ठीक है देख लेंगे तुमकों"

मगंरू- " अरे! देखना का है बाबा, हमार हारमोनियम, हमार खजड़ी, हमार बाजा और हमारे 'हरि'..कवनो एहसास नाहीं है आपका... आप अपना बजाइए, हम अपना बजायें जेकी जितनी भाग्य-तकदीर होगी... पायेगा.. ठीक है बाबा...पायलागूं

लखनू हारे हुए सिपाही की तरह लड़खडाते हुए अपने दुआर पर आ गये. प्रतिशोध कि ज्वाला में बराबर सुलगते हुए कभी हारमोनियम सेट करें कभी माइक लेकिन अन्दर इतनी आग थी की अन्दर के भाव जलकर राख बनकर उड़ जाते थे.

वक्त बीता.. नई मंडली की बगावत ने दो चार और मंडलियों के मार्ग प्रशस्त किये. पांच सौ से लेकर दो हजार तक की भक्ति मंडली ने सबके लिए गायन कीर्तन के कार्यक्रम का काम आसान किया.

अब लखनू बाबा की मंडली उस मूल्य पर उठती नहीं थी और बाबा अपने रेट से नीचे आने में अपना हिनाई समझने लगे.. सो हारमोनियम पुरानी धोती में बांधकर किनारे रख दिया.

चौराहे पर जब कोई पूछता " बाबा अब आप काहें नाहीं गाते" तो लखनू बाबा अधीर होकर कहते जब गांव जवार के लोग खजड़ी बजाने वाले से भजन सुनना भाने लगा तो का जरूरत हमारी.. दुनिया को भगवान और भजन से कोई मतलब ही नहीं रहा बस दू पईसा कम हो जाये.. लाउडस्पीकर टंग जाये.. हो गया भजन.

रामप्रीत-"बाबा! आपे का तो चेला रहा है पिछले बारह साल से. ठीक गावत बा..ओकर आवाज़ बड़ी फार के निकरेले माइकवा में.. पूरा रंग जमा देला मंगरूवा'

लखनू- जो सब मुंह मारव! जब तो सबके पीतर और सोना में फरक न पता त का मुंह जोरी करीं.

परदेशी- " ऐ बाबा! सुरेशवा क मंडली सुनलें बानी ? ऊ त मंगरूवो क कान कटले बा.

लखनू बाबा, कुल्हड़ की चाय आधे पर छोड़, तमतमाते हुए खड़े होकर बोले... जब सब पूरा गांव गवईया हो गईल त हमार कवन काम.. जाके सुने पूरा गांव कीर्तन.

रामप्रीत- "बाबा तब बाकी जिनगी का करेंगे आप ?"

लखनू बाबा- बाग रखायेंगे...आम का कुसली घीसकर शंख बजायेंगे.. तुहार करेजा काहें फट रहा है.

रिवेश प्रताप सिंह

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