सनातनी परम्परा पैरों की छाप... सर्वेश तिवारी श्रीमुख

सनातनी परम्परा पैरों की छाप... सर्वेश तिवारी श्रीमुख

सनातन की परम्परा है, 'नवबधु जब उतरती है तो चौकठ के पास थाल में महावर रखा होता है जिसमें पैर रख कर वह आगे बढ़ती है। अपने पैरों की छाप छोड़ते हुए..."

नववधू लक्ष्मी होती है न! वह अपने साथ धन-धान्य-सौभाग्य-आरोग्य ले कर आती है। उसके चरण लक्ष्मी के चरण होते हैं, उन चरणों की छाप लम्बे समय तक घर में बनी रहनी चाहिए।

अजीब लग रहा है न? पर अजीब है नहीं। आज हरितालिका तीज के दिन जब देश की असँख्य स्त्रीयाँ अपने सौभाग्य और कुल की समृद्धि के लिए निर्जला उपवास में हैं, तो ईश्वर जहाँ भी हों, जिस रूप में हों, उनके आंगन में अवश्य उतरे होंगे। आज देखियेगा अपने घर की ही स्त्री को, सुबह से अन्न जल का त्याग कर के भी नए वस्त्रों में सज कर मुस्कुराती स्त्री के मुख पर आपको लक्ष्मी का तेज न दिखे तो समझियेगा ईश्वर ने आपसे आँखे छीन ली है।

बात तनिक आश्चर्यजनक लगेगी, पर अन्य दिनों के शृंगार की अपेक्षा पर्व के दिन का स्त्री शृंगार अलग होता है। अन्य दिनों में भले उसकी पायल के घुंगरू शृंगार का धुन सुनाएं, व्रत के दिन वे देव-आरती गाते हैं। अन्य दिनों में उसका सिन्दूर, उसका टीका भले सौंदर्य प्रसाधन लगे, पर्व के दिन वह परिवार के सौभाग्य का ध्वज होता है। पर्व के दिन यदि पुरुष स्त्री के पैर की महावर में ही अपना सर्वस्व निहार ले तो तृप्त हो जाये। पर होता नहीं, आखिर पुरुष जो ठहरा...

यदि आप सौंदर्य की सिनेमाई परिभाषा के भ्रम में नहीं फँसे हैं तो मेरी तरह आप भी मानेंगे कि स्त्री के शरीर मे उसके पैर से अधिक सुंदर अंग कोई नहीं होता। और वह जब अपने रङ्ग में हो तो कहर ढाता है। छोड़िये! यह किसी और दिन के लिए रहा...

सनातन के शत्रु एक प्रश्न खड़ा करते हैं कि व्रत केवल स्त्री ही क्यों करे? पुरुष क्यों नहीं? प्रश्न से सहमत हुआ जा सकता है, पर प्रश्न सही है नहीं। ऐसा नहीं है कि पुरुष व्रत नहीं करता। अपने परिवार, पत्नी और बच्चों के सुख के लिए घर की चौकठ के बाहर वह कहाँ-कहाँ लड़ता है, कितना लड़ता है और किस-किस से लड़ता है यह वही जानता है। सुबह सात बजे ही घर से निकल कर शाम को सात बजे घर वापस लौटने वाला पुरुष यदि इन बारह घण्टों तक जीवन की कठिनाइयों से लड़ता है तो केवल और केवल अपने परिवार के लिए ही लड़ता है। तमाम विसंगतियों के बाद भी इस देश के नब्बे प्रतिशत मध्यमवर्गीय पुरुष यदि हाट में वस्त्र क्रय करने जाते हैं तो पहले बच्चों के लिए, फिर पत्नी के लिए और अंत मे स्वयं के लिए कुछ क्रय करते हैं। यदि पैसे कम पड़ गए तो पुरुष अपनी वस्तु छोड़ता है। यह लड़ाई ही उसका व्रत है। इस लड़ाई में उससे ईश्वर की प्रार्थना छूट जाती है और वह प्रार्थना स्त्री के हिस्से में आती है।

गृहस्ती की गाड़ी का एक पहिया पुरुष के श्रम से चलता है तो दूसरा स्त्री की तपस्या से चलता है। घर दोनों की श्रद्धा बनता है। पुरुष कितना भी शक्तिशाली हो, स्त्री के बिना उसका घर भूत का डेरा लगता है। स्त्री कितनी भी परिपक्व हो, पुरुष के बिना उसका अस्तित्व अधूरा लगता है। दोनों का संग ही सौभाग्य है।

दोनों की क्षमताएं अलग हैं। दोनों की कुशलता का क्षेत्र अलग है। पुरुष चाहे भी तो स्त्री नहीं हो सकता, स्त्री चाहे भी तो पुरुष नहीं हो सकती। होने का प्रयास करें तो वे न स्त्री रहते हैं न पुरुष, हिजड़े हो जाते हैं।

आज हरितालिका तीज है न! भारत की सारी स्त्रियों को तीज की शुभकामनाएं... उनका सौभाग्य बना रहे, यह पर्व बना रहे, यह देश बना रहे।

मेरे लिए यह पर्व इसलिए विशेष है क्योंकि आज अर्धांगिनी हमारे चरण छू कर प्रणाम करती हैं। उनकी भी जय हो।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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