कृष्ण गोकुल से गए ....सिसकियां और आह बची

कृष्ण गोकुल से गए ....सिसकियां और आह बची

कृष्ण गोकुल से जा चुके थे, और साथ ही गोकुल से जा चुका था आनंद। लोगों की हँसी जा चुकी थी, आपसी चुहल जा चुकी थी, पर्व-त्योहार-उत्सव जा चुके थे। गोकुल में यदि कुछ बचा था तो केवल सिसकियां और आह बची थी।

पूरे गोकुल में एक ही व्यक्ति था जो सबकुछ सामान्य करने का प्रयत्न करता फिरता था, वे थे नंद। किसी ने उन्हें उदास नहीं देखा, किसी ने उन्हें रोते हुए नहीं देखा। वे अपने स्वभाव के विपरीत कभी किसी बुजुर्ग से परिहास कर उसे हँसाने का प्रयत्न करते तो कभी किसी गोप बालक को छेड़ते, पर उन्हें कभी सफलता नहीं मिलती थी।

यशोदा जानती थीं कि नंद अपना कर्तव्य निभाने का प्रयत्न मात्र कर रहे हैं। कृष्ण के वियोग ने उनके हृदय को भी औरों की भाँति ही तोड़ा है, किन्तु...

रात्रि का तीसरा प्रहर था, अचानक यशोदा की आँख खुली। देखा, कक्ष के कोने में भूमि पर बैठे नंद तड़प कर रो रहे हैं। उनकी आँखों से अश्रुधारा लगातार बह रही है जिसे वे पोंछने का प्रयत्न भी नहीं करते। यशोदा ने नंद को कभी रोते नहीं देखा था, वे तड़प उठीं। लगभग दौड़ती हुई नंद के पास पहुँची और उनके कंधे पर हाथ रख कर बैठ गईं। कहा- "आप भी रो रहे हैं? आप न रोइये..."

अद्भुत होती हैं स्त्रियां। स्वयं भले ही दुख के गहन अंधकार में डूबी हुई हों पर उसे दुखी नहीं देख सकतीं जिसे प्रेम करती हैं। नंद को रोते देख यशोदा अपना सारा दुख भूल गयीं थीं। छन भर के लिए भूल गयीं कि वे कृष्ण की मैया हैं, बस यह स्मरण रहा कि वे नंद की पत्नी हैं।

नंद ने आश्चर्य से देखा यशोदा की ओर, महीनों से स्वयं निरन्तर रोने और उदास रहने वाली स्त्री आज उन्हें चुप करा रही थी। बोले, "यह तुम कह रही हो यशोदा?"

यशोदा ने प्रेम से झिड़कते हुए कहा, "मुझसे कैसी तुलना! मैं तो स्त्री हूँ, माया नहीं टूटती सो रो पड़ती हूँ। पर आप भला क्यों रोएं? और कन्हैया यदि दुख में होता तब रोते तो बात समझ में भी आती, वह तो वहाँ राजकुमार बना बैठा होगा। यहाँ गाँव मे क्या था जो रहता? उसके लिए दुखी न होइए।"

नंद के मुख पर हृदय को फाड़ देने वाली एक निरीह उदासी छा गयी। बोले, " मैं कन्हैया के लिए नहीं रोता यशोदा! उसके लिए तो सारा गोकुल रो रहा है। मैं उसके लिए रो रहा हूँ जिसके जाने पर कोई नहीं रोया था। पिछले बारह वर्षों में जब-जब रोया हूँ तो केवल उसी के लिए रोया हूँ यशोदा।"

यशोदा की आँखे खुली रह गईं। धीरे से बोलीं, "कौन? माया?"

रोते नंद ने कहा, "आप तो केवल कन्हैया की माँ बन कर रह गईं यशोदा! आपको तो स्मरण भी न रहा कि उस रात्रि आपके गर्भ से एक कन्या ने भी जन्म लिया था जिसकी वास्तविक माँ थीं आप। आप तो यह भी भूल गयीं कि यदि हमारा कृष्ण जीवित है तो केवल और केवल हमारी पुत्री के बलिदान के कारण जीवित है। पर उसका दुर्भाग्य देखिये, उसके लिए किसी की आँख मे अश्रु की एक बूंद तक नहीं आयी। उसके लिए कोई नहीं तड़पा, उसके लिए कोई उदास नहीं हुआ। "

यशोदा काँप उठीं एकाएक, और लिपट गयीं नंद महाराज से! नंद ने उनके कंधे पर हाथ रख कह कहा, "जानती हो यशोदा! किसी भी युग को कृष्ण यूँ ही नहीं मिल जाते।हर सभ्यता कृष्ण को जन्म देने का मूल्य चुकाती है। हर कृष्ण के पीछे किसी न किसी माया का बलिदान होता है। एक योग्य शासक पाने के लिए प्रजा को भी मूल्य चुकाना ही पड़ता है न! हम सब ने इस युग के उद्धारक को जन्म देने का मूल्य चुकाया है, पर सबसे बड़ा बलिदान हमारी पुत्री ने ही दिया यशोदा।"

यशोदा नंद को चुप कराने आईं थीं, किन्तु अब स्वयं रो रहीं थीं और नंद उन्हें धीरज धरा रहे थे। नंद ने उनके कंधों को थपथपाते हुए कहा," हमारा जन्म ही इसलिए हुआ था कि कृष्ण की बाललीला में सहयोग कर सकें, वह हम कर चुके। भविष्य जब कृष्ण की कथा लिखेगा तो हमारा नाम यहीं तक आएगा यशोदा। कोई ग्रन्थकार नहीं बताएगा कि कृष्ण के जाने के बाद नंद-यशोदा का क्या हुआ। समय ने हमारे लिए यही निश्चित किया है।"

यशोदा चुपचाप देखने लगीं नंद की ओर! नंद ने फिर कहा, "एक बात कहूँ? मेरी मानो तो अब मत रोना कृष्ण के लिए। कृष्ण के लिए बहाए गए अश्रु कहीं न कहीं हमारी पुत्री का अपमान ही करेंगे। यहाँ से चलने के बाद उससे मिलना भी तो होगा, कैसे मुह दिखाएंगे उसे? अब मत रोना यशोदा, मत रोना..."

यशोदा चुप सी हो गईं। नंद जानते थे यशोदा उनकी बात नहीं मान पाएगी।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

Share it
Top