फिर एक कहानी और श्रीमुख . "अधूरा वादा"

फिर एक कहानी और श्रीमुख  .  अधूरा वादा

खेत में दस मिनट की देरी से पहुँचे टिकाधर काका को देख कर मनोजवा बो ने टिभोली मारा- कहाँ थे काका? बिरधा पिनसिम के पइसा से ताड़ी पीने नही नु गए थे?

काका ने छूटते ही जवाब दिया- गए थे तोरा माई से बियाह करने! पतोहि हो के ससुर से ठिठोली करते लाज नही आती रे बुजरी की बेटी?

खेत में सोहनी करती सभी बनिहारिने खिलखिला उठीं, और मनोज बो भी आँचल से मुह दबा कर हँसने लगी।

टिकाधर काका कभी भी खेत में समय से नही पहुँचते, पर कोई भी कास्तकार सबसे पहले टिकाधर काका को ही "जन" जोड़ता है। जितना काम बीस बनिहारिने मिल कर भी पूरा न कर पाती हों, टिकाधर काका के रहते वही काम पंद्रह "जन" मिल कर घडी भर पहले सँपरा देते हैं।

सारे गांव के लिए मजकिया हैं टिकाधर काका। बच्चे, बूढ़े,जवान, मेहरारू सब मजाक करते हैं टिकाधर काका से, और जम कर गालियाँ सुनते हैं। अमृत जैसी लगती हैं उनकी गालियाँ... अगर गालियों की कोई प्रतियोगिता कराई जाय तो सीवान जिले में फर्स्ट से लेकर थर्ड तक सब प्राइज टिकाधर काका की झोली में ही जायेगा।

जल्दी-जल्दी अपनी छूटी 'पाहि' पकड़ते टिकाधर काका खुरपी चलाना शुरू करते हैं, तबतक फिर टोक देती है दिलीपवा बो- "ए काका,संचहुँ आप हमारी माँ से बियाह कर लीजिये। बेचारी अकेली रहती है, पतोहुवों से पटती भी नही है। यहां आ जायेगी तो हमको भी आराम हो जायेगा..."

काका हाथ चमका के कहते हैं, "दुनिया जहान की सब निर्लज्ज छौंड़ी हमरे गांव में बियहा के आ गयीं है का रे? ससुर भसुर का सब लाज घोर के पी गयी है का रे हरजाई की बेटी? कवना खपड़ि में जन्माई थी तोर माई तुमको रे..."

बनिहरिनों का मन हरिहरा गया है।

गाँव की नवकी बहुरिया और नवके छोकड़े सब नहीं जानते, पर काका का भी एक जबाना था। कलकत्ता डनलप फैक्ट्री से कमा के जब गांव आते टिकाधर महतो तो उनके बल पर हीं गांव के सनकनटोली में बहुतों को बाजार की चाय नसीब होती। उनके आगे पीछे बीसों लोग घूमते थे तब। सनकन की तो बात ही छोड़िये, बभनइया में कितने ही लोग होंगे जो टिकाधर महतो की दी हुई धोती पहन कर दिन काटते थे। सनकन टोली के लोगों में नील से रंगी हुई धोती पहनने वाले पहले आदमी थे टिकाधर महतो। आज भी टिकाधर काका का शौख कम नही हुआ है। घर में दूसरा कोई खाने पहनने वाला तो है नही, बनिहारी की कमाई और पांच सौ के बिरधा पिनसिम के बल पर अब भी चमचम धोआ धोती पहनते हैं काका। पर वो जमाना तो और ही था।

सोहनी करते अभी आधा घंटा भी नही हुआ पर सबसे बाद में आए टिकाधर काका औरों से एक 'लगी' आगे निकल गए हैं। सब समझ रहे हैं कि अब काका पीछे मुड़ कर सबके तीन पुस्त को तारना शुरू करेंगे। बूढी रजमतिया के आँख टीपने पर खंखार के कहती है जोखन बो, " तब काका, बिना दांत वाले मुह से तो दलपीठवा खाने में बड़ी गजन होता होगा आपको, इधर से ठेलते होंगे तो उधर से निकल जाता होगा। काहें नही चलानी दांत लगवा लेते हैं?"

काका इतना पर पिनिक के शुरू हो जाते हैं, "आय हाय हाय... अस्सी बरीस की तोर सास जब लाल छींट का बेंलाउज पहिर के बंगाली के दोकान में गपागप रसगुल्ला खा सकती है, तो हम दलपीठवा काहे नही खा सकते हैं रे... अपना भतार से कहि के उसका चलानी दांत बनवा दे कि मुर्गी का मीट गपागप खायेगी बुढ़िया।"

काका के पिनकने पर एक तीर और छोड़ती है जोखन बो, "ए काका, हमार सास तो अभिन बहुते जवान है। आपकी तरह उनका हाथ नही कांपता है।"

- हट्ट बुजरी की बेटी, जवान है तो जा के कह दे कि फराक पहिर के घूमे। और मन ही मन बुढ़िया को फराक पहने देख कर ठठा कर हँस पड़ते हैं काका...

आज खेत में सोहनी कराने अरबिंद सिंह का बड़का बेटा आया है। जाने क्या सोच कर पूछ पड़ता है, "अच्छा काका! सुनते हैं कि आप तो कलकत्ता में बहुत पैसा कमाते थे। फिर उ नोकरी छोड़ कर गांव में बनिहारी क्यों करने लगे?"

काका का हँसता हुआ मुह एकाएक सूख गया है। जवानी के दिनों से अबतक काका से यह सवाल जब कभी भी पूछा गया तो जवाब नही दे पाये काका, पर हर बार पुराने दिनों में पहुँच जाते हैं।

आज भी एकाएक जवानी के दिनों में पहुच गए हैं काका, शायद तीस-बत्तीस साल पीछे।

तब अभी नया-नया बियाह हुआ था टिकाधर महतो का। गांव की बुढ़िया सब कहती हैं कि वैसी पतोह फिर गांव में दूसरी नही आयी, परी थी परी। हर बार दू दू बरीस तक बाहर रहने वाले टिकाधर जब बियाह के महीना दिन बाद कलकत्ता गए तो छह महीने पर ही डनलप से पंद्रह दिन की छुट्टी ले कर गांव आ गए। उधर टिकाधर बो सातवें महीने के पेट से थी। घर आने पर इस बार एको बार बाजार नही गए टिकाधर महतो, दिन भर घर में घुसे रहते। दोस्तों ने खूब मजाक बनाया पर बेकत से एको छन दूर नही होते। पर पंद्रह दिन बीतने में कितना देर लगता है, छुट्टी खत्म हुई और टिकाधर जाने को तैयार हो गए। टिकाधर बो रोकती रह गयी पर नोकरी तो आखिर नोकरी होती है न, उ का बुझेगी प्रेम को। मजबूर टिकाधर महतो दुलहिन को किसी तरह मना कर और जल्दी आने का वादा कर कलकत्ता चले गए।

पर टिकाधर महतो को पता नही था कि जल्दी आने का यह वादा इतनी जल्दी पूरा करना पड़ेगा। डेढ़ महीने बाद ही एक दिन घर का तार मिला कि कनिया की तबियत बहुत ख़राब है जल्दी आओ। अगले ही दिन रेलगाड़ी पकड़ कर गांव पहुचे टिकाधर महतो तो पता चला कि उसको गए आठ दिन हो गए...

माँ ने बताया, बच्चा पेट में उल्टा हो गया था। तीन गांव की सब जानकर धगड़िन को बुला लिए थे पर...

अंतिम बेला में बेहोसी में बकबका रही थी- उनको तार भेज दे कोई, उ आ जायेंगे तो सब ठीक हो जायेगा।

पिछले बत्तीस सालों से जब भी सोते हैं तो यही सोचते हैं टिकाधर महतो कि काश! कलकत्ता नही गए होते।

माई-बाप, बहन-बहनोई हजारों बार कहते रह गए कि दूसरा बियाह कर लो, पर टस से मस नही हुए टिकाधर काका।

धीरे-धीरे पहले बाबूजी गए, फिर माँ गयी, निपट अकेले हो गए टिकाधर काका, पर न बियाह किये न ही लौट कर कलकत्ता गए। शायद गांव में ही रह के अपना अधूरा वादा पूरा कर रहे हैं।

सोहनी करते काका आज पहली बार दूसरी बनिहारिनो से चार कदम पीछे रह गए हैं। अरविंद सिंह का बेटा फिर आवाज लगाता है- "क्यों काका, बताये नहीं कि कलकत्ता की नोकरी क्यों छोड़ दिए।"

गमछा के कोर से आँख पोछते काका अपने चिर परिचित अंदाज में जवाब देते हैं,- कलकत्ता चले जाते तो आपके बाबूजी का रासलिल्ला कैसे देखते छोटका बाबू साहेब। कहि दीजिये अरबिंद बाबू से, कि ई जो बुढ़ौती में मनोरमवा के घर का चक्कर लगा रहे हैं न, कहियो थूरा जाएंगे।

लड़का ठठा के हँस उठा है। मन ही मन कहता है- ई बुढऊ केहू के ना छोड़िहें।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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