कहानी : जामुन के पेड़ का प्रोटोकॉल बरसात में ...

कहानी : जामुन के पेड़ का प्रोटोकॉल बरसात में ...

मुहल्ले में एक हुआ करता था, जिसकी अहमियत बरसात के दिनों में बढ़ जाती.. शेष महीने उसका कोई प्रोटोकॉल नहीं रहता. बरसात में जब जामुन पकती तो लगातार उसके चूने.. टपकने की प्रकिया चलती रहती लेकिन पेड़ से जमीन पर टपकने पर अधिकतम जामुन क्षतविक्षत हो जाते थे. गिरने के बाद भी जामुन, साबुत बचते लेकिन अधपके वाले. अधपके जामुन अपने जिस्म पर चोट तो बचा लेते लेकिन जुबां पर वैसी रौनक़ नहीं बिखेर पाते जो पके जामुनों में रस और रौनक़ होती.

मीठे-मदमस्त और तन्दुरुस्त जामुनों के लिए किसी को पेड़ पर चढ़ाने की दरकार होती. अब जामुन खाने वाले दसियों लेकिन चढ़ने वाला सूरमा एक ही था. सभी 'जामुन भक्त' जोर लगाकर उस सूरमा को पेड़ पर चढ़ाते. उसके पिछवाड़े पर तीन चार लोग हाथ लगाकर उसे सत्ता की तने पर किसी तरह सरकाकर उसे जामुन के गुच्छों तक पहुंचाने में सहयोग करते.

पेड़ पर अपना दूत भेजने के बाद पेड़ के नीचे खड़ी जनता की अपेक्षा हिलोरें मारने लगतीं अब सारे मदमस्त, मनमाफ़िक जामुन, सीधे उनके मुंह में. नीचे चार लोग पुरानी चादर तानकर मुंह उठाये खड़े हो जाते कि मितवा अभी किसी डाल पर खड़ा होकर डाल हिलायेगा और पूरी चादर जामुनों से लद जायेगी.

उधर चढ़ने वाला ज्यों ही "सत्ता का गुच्छा" अपने बाहों में पाता ..भूल जाता था कि नीचे दस लोग इस आस में खड़े हैं कि उसका मीत अभी जामुनों की बौछार रहेगा. वो पेड़ पर पहुंचते ही रंग बदलना शुरू कर देता. शुरुआती दस मिनट तो उसको जामुनों की जवानी निहारते बीत जाते.. फिर शुरू होती अपनी जिह्वा को तृप्त एवं जामुनों को उदरस्थ करने की प्रक्रिया. उधर नीचे, जनता आवाज लगाती "कब गिराओगे.. बीस मिनट हो गये" लेकिन उसको कहां खबर कि नीचे लोग लार टपकाये मुंह उठाये ताक रहे हैं. वो सबसे पहले रसभरे मोटे ताज़े जामुनों को छांट कर खा लेता तथा गुठलियाँ नीचे टपका देता. मन भरने के बाद अपना व्यक्तिगत झोला निकालता फिर शेष रसभरी जामुनों को अपने व्यक्तिगत झोले में भरना शुरू करता.झोला जब नाक तक भर जाता तब कहीं अन्त में जाकर डालियां झाड़ता.. आधे घंटे के इस प्रकिया में नीचे खड़ी जनता का कम से कम एक लीटर खून जलकर खाक़ हो जाता था.वाजिब भी था क्योंकि वही जनता थी जिसने सिर्फ जामुन की आस पर उसके पिछवाड़े पर जोर लगाकर उसे जामुन की रसीली डालियों पर चढ़ाने में सहयोग किया था. कितनों का तो खून इसपर जलता कि अपने तो गूदा खा रहा है और हमारे मुंह पर गुठली गिरा रहा है.. सबसे फजीहत उनकी होती जो मजार वाली चादर तानकर गरदन उठाकर लार ग्रन्थियों से संघर्ष करते.

मित्रों! तमाम बार धोखा खाने के बाद भी हम सब उसके पिछवाड़े पर हाथ लगाकर उसे पेड़ पर चढ़ाते थे लेकिन वो! हर बार डाल पर पहुंचते ही रंग बदल देता. जामुन खाता, गुठलियाँ गिराता.. सारा रस खुद चूस जाता.. सारी आशाओं को कुचल कर मुस्कुराता. लेकिन मजबूरी यह कि पेड़ पर सिर्फ उसी को चढ़ने आता..

कुल मिलाकर किसी से आशा तभी तक करो जब तक वो तुम्हारी कब्जे में है..क्योंकि ज्यों ही वो सत्ता के मचान पर पहुंचेगा भूल जायेगा कि आपने हाथ लगाकर उसे वहाँ तक पहुंचाया.

रिवेश प्रताप सिंह

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