चरित्रहीन गाय (व्यंग्य)

चरित्रहीन गाय (व्यंग्य)

बकलोलपुर के जंगल मे एक हत्या हो गयी। एक गाय को कई भेड़ियों में सरेआम मिल कर चीड़-फाड़ दिया। गाय चुकी सज्जन थी, विवादों से दूर रहने वाली थी, सो प्रकृति के नियमों के अनुसार उसकी हत्या एक सामान्य प्राकृतिक घटना थी। इस धरा धाम पर सृष्टि के प्रारम्भ से ही भेड़िये गायों को यूँ ही चीरते-फाड़ते रहे हैं, सो उस दिन भी गाय चीर डाली गई।

जंगल मे लोकतंत्र था। हत्या के चार घण्टे बाद ही जंगल के रक्षक श्रीमान हाथी जी पहुँचे और सभी भेड़ियों को कैद कर लिया गया। जंगल के सभी जानवर आक्रोश में थे, सबने भेड़ियों का अत्याचार देखा था सो सभी उनके लिए फाँसी की माँग कर रहे थे।

पर लोकतंत्र में अपराध की सजा इतनी सरलता से कहाँ दी जाती है! किसी महान पशु ने कहा था, " जिसमे अपराधी भी पूरे आत्मसम्मान के साथ तिरछी मुस्कुराहट फेंकता हुआ चले, वही सच्चा लोकतंत्र होता है।"

बकलोलपुर में भी सच्चा लोकतंत्र था। गाय की हत्या का मुकदमा महामहिम शेर जी के पास गया। वे जंगल के राजा थे, माई बाप थे। न्याय करना उनका "पेशा" था, उन्हें न्याय करने में मजा आता था। वे इतने न्यायप्रिय थे कि कभी-कभी तो राह चलती प्रजा को पकड़-पकड़ कर जबरदस्ती न्याय करते थे। जनता उनके न्याय के डर से थर-थर काँपती थी, पर शेर जी न्याय का आनंद छोड़ते नहीं थी। पशु उनके न्याय के डर से रास्ता बदल कर भागते थे।

कभी-कभी जब शेर जी पूरे मूड में होते तो अपने सिपाहियों से किसी राह चलते पशु को पकड़वा कर अपने सामने लाते और मुस्कुराते हुए कहते," इधर आओ डार्लिंग! हम तुम्हारा न्याय करेगा।"

बेचारा पशु गिड़गिड़ाता- मालिक! हुजूर! माई-बाप! हमको माफ कीजिये, हम कोई गलती नहीं किये हैं।

साहब गरजते- कोई बात नहीं! तुमने कुछ नहीं किया तो क्या हुआ, हम न्याय जरूर करेंगे। फिर शेर साहब न्याय करते। अगले दिन उस पशु की हड्डियों को चबाने के लिए कुत्तों में युद्ध होता, जिसे देख कर शेर जी को आनंद आ जाता था।

शेर जी के दरबार मे जब गाय की बछिया-बछड़े रोते बिलखते पहुँचे तो शेर जी की न्यायप्रियता जाग उठी। उन्होंने होठों पर जीभ फेरते हुए कहा, "हम जरूर न्याय करेगा। भेड़ियों को छोड़ेगा नहीं। लेकिन आज नहीं कल, आज हमको दूसरे का न्याय करना है।" दरबार के एक कोने में दो बकरियां बंधी हुई थीं, शेर जी ने शाम तक उनका भरपेट न्याय किया।

गाय के बछड़े अगले दिन दरबार में गए, लेकिन उनके जाने के पहले ही दो भेंड़ वहाँ पहुँच गए थे। शेर जी ने दुखी हो कर कहा, " आज तो इन भेड़ों का न्याय करना है। एक काम करो, तुमलोग अगले हप्ते के दूसरे रविवार को आओ। हम तुम्हारा न्याय जरूर करेगा।" बेचारे बछड़े वापस लौट आये। शेर जी ने उसदिन बड़े प्रेम से दोनों भेड़ों के साथ न्याय किया। उस दिन न्याय इतना कठोर हो गया कि शेर जी की डकार तक रुक गयी, सो अगले हप्ते भर के लिए उन्होंने दरबार को बंद कर दिया।

गाय के बछड़े-बछिया अगली तारीख पर सुबह होने के पूर्व ही पहुँच गए। शेर साहब जबतक आये तबतक कुल चार लोग न्याय कराने पहुँच गए थे। शेर जी ने एक नजर सबको देखा और मुस्कुराए। गाय के परिजनों की उम्मीद बढ़ी, उन्हें विश्वास हो गया कि आज उन्हें अवश्य न्याय मिलेगा। वे मन ही मन भेड़ियों को फाँसी पर लटकते हुए देखने लगे। शेर जी उठे और अर्दली से पूछा, "आज सबसे अंत मे कौन आया है?"

शेर जी जब-जब न्याय करते थे तब-तब अर्दली को भी हिस्सा मिलता था। अर्दली मुस्कुरा उठा। उसने एक तिरछी मुस्कुराहट छोड़ते हुए कहा, " हुजूर! आज तो खरगोश जी सबसे अंत मे आये हैं।"

शेर जी बोले, "फिर तो आज उनकी ही बारी है। हम रोज पहले आने वालों के साथ न्याय कर के बाद में आने वालों के साथ अन्याय करना नहीं चाहते। यह लोकतंत्र है, यहाँ सबका बराबर अधिकार है। आज खरगोश जी का ही न्याय होगा।" उसदिन खरगोश जी के साथ शेर जी ने खूब रसदार न्याय किया। गाय के परिजन वापस लौट आये।

दिन बीतने लगे। तारीख पर तारीख बीतती गयी, पर गाय का नम्बर नहीं आया। इधर गाय के बछड़े-बछिया भी बड़े हो कर बुजुर्ग हो गए। बीस वर्ष बीत गए। इन बीस वर्षों में गाय की हत्या के अदिकांश प्रत्यक्षदर्शी पशु मर गए। जो बचे, उन्हें भी घटना की याद नहीं रही। गाय के बच्चों में भी भेड़ियों को सजा दिलाने का वह जज्बा न रहा। जंगल के पशु इस घटना को भूल गए।

जब सारे पशु घटना को भूल गए तो शेर जी को याद आया। उन्होंने कहा, "सबको हाजिर किया जाय, आज मैं गाय का न्याय करूँगा।" गाय के परिजनों की मरी हुई आशा जी उठी। वे दरबार पहुँचे। उधर भेड़िये भी दरबार लाये गए।

शेर जी ने पूछा, "गाय की हत्या को किसने देखा है?"

दरबार में चुप्पी छा गयी। गाय के बूढ़े बछड़े ने कहा,"हुजूर! जिन्होंने देखा था, वे तो मर-खप गए।"

शेर जी दुखी हो कर बोले, "फिर कैसे सिद्ध होगा कि गाय की हत्या ही हुई थी?"

बछड़ा चिल्लाया, "हुजूर! माई-बाप! इन्हीं भेड़ियों ने मेरी माँ की हत्या की थी। इन्हें सजा दी जाय।"

शेर ने डाँटा, " चुप्प! अरे तुम्हारे कहने से हम मान लेंगे? क्या सुबूत है कि गाय की हत्या हुई? जबतक कोई देखने वाला कहेगा नहीं तबतक कैसे दोष सिद्ध होगा।"

बछड़े ने कहा, " वैसा तो कोई नहीं।"

शेर ने कहा, "फिर तो भेड़िये दोषी नहीं। जाओ जी भेड़िया, तुम निर्दोष हो..."

भेड़ियों में खुशी की लहर दौड़ गयी। वे झूम उठे। बछड़े को गुस्सा आया। उनसे शेर जी से कहा, " हजूर! पर मुझे यह तो बताइए कि फिर मेरी माँ की हत्या की किसने?"

शेर जी ने कहा, "जब किसी ने हत्या होते देखा ही नहीं तो किसे कहूँ? तुम्हारी माँ की हत्या ही नहीं हुई।"

- तो मालिक वह मरी कैसे?

- हो सकता है उसने अपनी ही सिंह अपने पेट में घुसा लिया हो और मर गयी हो। या हो सकता है कि वह मरी ही न हो...

शेर जी के अर्दली ने कहा, " हुजूर! मुझे तो लगता है कि गाय किसी के साथ भाग गई थी। यह गायें तो होती ही चरित्रहीन हैं। कोई बैल मिल गया होगा, भाग गई होगी उसके साथ गुलछर्रे उड़ाने।"

शेर जी मुस्कुराए। बोले, "यही सच है। गाय जरूर किसी बैल के साथ भाग गई है।"

भेड़ियों ने चिल्ला कर कहा, "दुहाई सरकार की! आप सर्वज्ञाता हैं, देवता हैं। हम पहले ही कह रहे थे कि गाय एक बैल के साथ भाग गई है, पर कोई नहीं मानता था। हुजूर हमने तो खुद अपनी आँखों से गाय को बलिया वाले बैल के साथ भागते देखा था। आज आखिर आपने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से यह समझ ही लिया कि गाय मरी नहीं थी बल्कि भागी थी।"

दरबार धन्य-धन्य कर उठा। शेर जी के न्याय की धूम मच गयी।

दरबार से निकलने वाले हर पशु के मुह पर एक बात थी, " गायें तो होती ही चरित्रहीन हैं।"

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

गोपालगंज, बिहार।

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