लड़िकाई कौ प्रेम-१

लड़िकाई कौ प्रेम-१

भारत में यदि क्रिकेट सफलता के शीर्ष पर न होता तो संभवतः यह देश आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहा होता। सिनेमा भी था और है परंतु यह यथार्थ कम काल्पनिक अधिक है और कम सोच वाले व्यक्ति न केवल भ्रम में डाले रहता है बल्कि भावुक भी बनाता है।

पर क्रिकेट की तो बात ही निराली है। आइपीएल ने भले ही इसे थोड़ा सहिष्णु बना दिया है लेकिन अभी भी इसका रोमांच सिर चढ़कर बोलता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

१९८० के दशक से बेरोजगारी और अवसरों के अभाव से जूझ रहे इस देश को खुशियों के नाम पर अगर किसी ने कुछ दिया तो वह यह क्रिकेट ही था। १९८३ में संयोगवश भारत क्रिकेट का विश्व विजेता बना और धीरे-धीरे कपिल देव, सुनिल गावस्कर, कृष्णामाचारी श्रीकांत, सैयद किरमानी जैसे कुछ नाम भारत के गांव-गांव में पहुंचने लगे।

हांलांकि सुनील गावस्कर कैरेबियन पेस बैट्री एंडी राबर्ट्स, जोएल गार्नर, माइकल होल्डिंग और मैल्कम मार्शल के विरुद्ध १९७१-७२ की अपनी पहली श्रृंखला में ही ७०० से अधिक रन ठोक कर अपने नाम का ऐसा सिक्का जमाए कि कैरेबियन द्वीप में १८९० के दशक में गिरमिटिया मजदूर के रूप में गए और वहीं बसने को मजबूर हुए हर भारतीय के घर में पैदा होने वाले बच्चे का नाम सुनिल रखा जाने लगा था। गावस्कर उन दिनों वेस्टइंडीज में जितने लोकप्रिय थे, भारत में उससे कम ही लोकप्रिय थे।

पर तिरासी का वर्ल्ड कप जीतने के बाद दो नाम बड़ी तेजी से भारत के गांव-गांव में फैलने लगे। १९८३ के उस वर्ल्ड कप के लीग मुकाबले में जिंबाब्वे के खिलाफ भारत के १६ रन पर पांच विकेट गिर गए थे और फिर तबके कप्तान कपिल देव ने विकेट कीपर बल्लेबाज सैयद किरमानी के साथ एक ऐसी जबरदस्त पारी खेली जिसे वर्ल्ड क्रिकेट में हमेशा याद किया जाता है, कपिल ने नाबाद १७५ रन बनाए जो कि एकदिवसीय क्रिकेट में भारत का पहला और उनका भी एकमात्र शतक था जिसके बदौलत भारत ने जिम्बाब्वे को हराया।

उस लीग मुकाबले में भारत ने वेस्टइंडीज को भी हराया था लेकिन लोगों ने इसे उलटफेर से अधिक का महत्व नहीं दिया।

सेमीफाइनल में पाकिस्तान को वेस्टइंडीज और इंग्लैंड को भारत ने हराया और फिर...

तहलका तो तब मचा जब भारत ने १९७५ और १९८९ के चैंपियन वेस्टइंडीज को फाइनल में पीट दिया।

भारत द्वारा बनाए गए १८३ रन का पीछा करते हुए वह टीम जिसके बारे में फाइनल में एंपायरिंग कर रहे डिकी बर्ड ने कहा था कि वे इसे लंच से पहले ही जीत लेंगे, वह वेस्टइंडीज की टीम १४० रन पर आलाउट हो गई।

पर यह महज संयोग ही था लेकिन ऐसा सुखद था कि क्रिकेट को भारत के गांव समझना शुरू करने लगे।

कई भारतीय विद्वानों ने इसे गिल्ली-डंडा का आधुनिक रूप बताया।

टीवी का तो केवल नाम सुना जाता था, भारत के गांव इसे रेडियो कमेंट्री से सुन रहे थे, देख रहे थे, पुलकित, आनंदित, उत्साहित, हतोत्साहित भी हो रहे थे। धन्य थे वे रेडियो कमेंटेटर संजय बनर्जी, सुशील दोषी, मनीष देव, जसदेव सिंह, विनित गर्ग, रवि चतुर्वेदी, अनुपम गुलाटी, हर्ष भोगले आदि जो अपने शब्दों से क्रिकेट ऐसा खाका बना रहे थे कि श्रोताओं के मन-मस्तिष्क में पूरा का पूरा क्रिकेट उतरता जा रहा था।

ठीक से अबतक भी हिंदी न बोल पाने वाला यह देश हर तीन ओवर बाद अगले तीन ओवर तक की कमेंट्री न केवल बड़े चाव से सुनता था, बल्कि उसे समझता और समझाता भी था। बैट, बाल, स्टंप, कैच, एलबीडब्ल्यू, रन, आउट, ओवर, कट, पुल, हुक, लाफ्ट, स्विंग, स्पिन, गुगली, गल्ब्स, पैड, हेल्मेट, रनर, स्कोर, बोर्ड को समझने लगा था।

आज भी अच्छे-अच्छे लोगों को स्लिप, प्वाइंट, सिली प्वाइंट, कवर, एक्स्ट्रा कवर, लांग आफ, लांग आन, स्क्वायर लेक, गली, मिड आन, मिड आफ, मिड विकेट, फारवर्ड शार्ट लेग पर खड़ा होने को कह दो तो केवल मुंह ही ताकेंगे लेकिन ये कमेंटेटर जब फिल्ड की पोजीशन बताते थे तो हम सुनने वालों का रोंवा गनगनाने लगता था।

पर हम अब क्रिकेट के पांडित्य की ओर अग्रसर होने लगे थे और तब क्रिकेट सम्राट पत्रिका हम लोगों की विकिपीडिया हो चली थी।

तभी शोर उठने लगा कि अब तक आयोजित हुए तीन प्रूडेंशियल वर्ल्ड कप जो केवल इंग्लैंड में हुए थे, अब पहली बार भारतीय उपमहाद्वीप में रिलायंस वर्ल्ड कप-१९८७ के नाम से आयोजित होंगे। जिसके दो मेजबान होंगे भारत और पाकिस्तान।

एक सेमीफाइनल पाकिस्तान और दूसरा भारत में होगा और फाइनल ईडन गार्डन कोलकाता में होगा।

भारत, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया और जिंबाब्वे एक ग्रुप में और पाकिस्तान, वेस्टइंडीज, इंग्लैंड और श्रीलंका दूसरे ग्रुप में।

भारत-इंग्लैंड और पाकिस्तान-आस्ट्रेलिया सेमीफाइनल में पहुंचे और दोनों मेजबान सेमीफाइनल हार के बाहर हो गए क्योंकि भारतीय मना रहे थे कि पाकिस्तान और पाकिस्तानी मना रहे थे कि भारत अपना सेमीफाइनल हार जांए और हुआ ये कि दोनों हार गए।

रिलायंस वर्ल्ड कप-८७ से भारत और पाकिस्तान में मैच अब धर्मयुद्ध के रूप में देखा जाने लगा।

नवजोत सिंह सिद्धू ने लगातार पांच अर्द्ध शतक बनाया।

ग्राहम गूच के स्वीप-शाट्स भारत को सेमीफाइनल हरवा दिए तो इंग्लैंड के तबके कप्तान माइक गेटिंग के रिवर्स स्विप ने वर्ल्ड कप हरवाया था।

छुपा रुस्तम आस्ट्रेलिया पहली बार एलन बॉर्डर की अगुवाई में वर्ल्ड चैंपियन बना।

सुनिल गावस्कर ने अपना पहला और आखिरी एकदिवसीय शतक बनाया।

सुनिल गावस्कर और इमरान खान ने अपनी यारी दोस्ती निभाने के लिए एक साथ सन्यास ले लिया और अपनी गद्दारी के लिए प्रसिद्ध इस पाकिस्तानी ने तीन दिन बाद अपना सन्यास तबके पाकिस्तानी तानाशाह जनरल जियाउल हक के कहने पर यह कह कर वापस ले लिया कि पाकिस्तान को बिना विश्व चैंपियन बनाए वह सन्यास कैसे ले सकता है?

भारत पाकिस्तान के मैचों में फसाद की दूसरी जड़ यह घटना बनी।

भारत पाकिस्तान का क्रिकेटरीय उन्माद अगले अंक में.....

१८ जून २०१९

आलोक पाण्डेय

बलिया उत्तरप्रदेश

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