एक पुरानी कथा नये कलेवर में : गधे का भेजा

एक पुरानी कथा नये कलेवर में : गधे का भेजा

जंगल का शेर बूढ़ा हो चला था। अब शरीर में इतनी ताकत न बची थी कि जंगल में उसके पंजों के निशान देखने को मिलते..सो हर वक्त अपनी मांद के सामने ही मिल जाते बूढ़े शेर । दरबार में हाजिरी लगाने वालों में ज्यादातर मक्खियाँ ही उसके सिर के इर्दगिर्द भिनभिनाती मिलतीं। कुछेक जानवर दूर से हालचाल पूछकर उनके अस्तित्व का भान करा देते।

एक दिन एक सियार शेर के पास पहुंचा और तीन मीटर की दूरी बनाकर बड़े सहृदयता से कहा-

" एहीं से गोड़ लाग रहें हैं"

शेर- "जुग-जुग जीयअ भगिना"

सियार- "और मामा! क्या हाल है? "

शेर- " हाल का कहीं बेटा! अब बस चली-चला की बेला है। जैसे तैसे कट रही है जिन्दगी"

सियार- " और, भोजन-पानी मामा ? "

शेर- "बिटवा! अब न तो पहले वाली ताकत रही और न ही जलवे, जवानी, बस जो भी बचाखुचा मिल जाता है उसी के सहारे जिन्दगी को खींच रहे हैं"

सियार- " लेकिन मामा! हसरतें तो अभी भी उछालें मारती होगीं ?"

शेर- " बेटा.. हसरतें तो मरते दम तक जवां रहतीं हैं अब हसरतों की बात करोगे तो बात बहुत दूर तक चली जायेगी.. अब छोड़ो भी..आंख भर आयी..गला रुध रहा है"

सियार बात बदलते हुए..

"वैसे मामा आपने भी अपनी पूरी जिन्दगी में खूब ऐश फरमाये फिर भी कोई ख्वाहिश दिल में दबी दबी सुलग रही हो तो बताएँ"

शेर- "नहीं बेटा ऐसी तो कोई ख्वाहिश नहीं बची, जो चाहा, जैसे चाहा, हासिल किया। जंगल का सब कानून ताख पर रखकर लूटा-खसोटा, जहाँ जो मिला उसको उदरस्थ किया। जंगल की शायद ही कोई ऐसे प्रजाति हो जिसके रक्त से मेरी जिह्वा ने स्नान न किया हो।"

सियार-" मामा तब तो आपको मरने पर कोई अफसोस नहीं होना चाहिए..आप तो आप राज भोगकर विदा होने वाले हैं"

शेर- " ऐसा नहीं है बिटवा, दिल में अभी भी एक ख्वाहिश उतनी ही जवां हैं लेकिन बुढ़ौती में ऐसी हसरतों का क्या"

सियार- "क्या मामा?"

शेर- " बिटवा जिन्दगी के अन्तिम दौर में हूँ इसलिए झूठ नहीं बोलूँगा लेकिन आज तक गधे का भेजा और उसका गूदा नहीं चखा। मरते वक्त तक बस यही कमी सालती रहेगी बेटा"

सियार- " जाओ मामा तुम भी! इत्ती सी हसरत लिए भीतर ही भीतर सुलग रहे हो, एक बार कभी इशारा कर दिये होते तो आपका भान्जा चुटकी में आपके लिए गधों की कतार खड़ा कर देता"

शेर- " बेटा! अब कतार लेकर क्या करेंगे बुढ़ौती में। बस एक अदद भेजा मिल जावे उसका गूदा चख लूं..बस तो चैन से प्राण छोड़ू।

सियार- "मामा! सूर्यास्त से पूर्व आपके सामने गधा हाजिर होगा..लेकिन मुझको तो अब बिल्कुल भी नहीं यकीं कि आपको खुद के पंजे और जबड़े पर आपका अख्तियार बचा है।

शेर- " क्या बात कर रहे हो बिटवा? अब तेरे मामा को ऐतना भी कमजोरी नहीं पकड़ी कि निवाला न गटक पावें।

सियार- " मामा तूर लिहो न?"

सियार ने तंज कसा

सियार के तंज पर शेर गुर्राते हुए सियार के निकट आ पहुंचा।

सियार- ठीक है,ठीक है मामा.. समझ गया अभी दम है तुममें.. दम है मामा।

शेर-" लेकिन गदहे को बुलाओगे कैसे"

सियार- " अरे तुम भी मामा..गधा ही न है..आयेगा नहीं तो जायेगा कहां"

शेर को वादा करके सियार जंगल पार कर दूर निकल गया। जंगल से बाहर कुछ गदहों का झुण्ड घास चर रहा था। सियार वहीं झुण्ड के समीप बैठ गया. कुछ ही देर में झुण्ड से एक गधा निकल कर आया और आह्लादित होकर सियार से बोला-

"ओह् हो सियार भाई! यहाँ कैसे?"

"खास तुमसे ही मिलने प्राणप्रिय मित्र" सियार ने संक्षिप्त एवं सार्गर्भित उत्तर दिया.

" चिंतित लग रहे हो मित्र" गधे ने गंभीर स्वर में सियार से पूछा।

सियार- "चिंतित तो नहीं हू़ं मित्र लेकिन एक बड़ी जिम्मेदारी के निर्वहन को लेकर गंभीर अवश्य हूँ।"

गधा- कैसी जिम्मेदारी मित्र?

सियार- "मित्र तुम्हें शायद न पता हो किन्तु जंगल में शेर की उम्र जैसे जैसे बढ़ रही है उनका हुकुम कमजोर पड़ रहा है इसलिए वो अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अपने जीते जी जंगल का राजा नियुक्त करना चाहते हैं। सच कहूँ तो उनकी बड़ी इच्छा है कि मैं राजसिंहासन पर आसीन हूँ लेकिन तुम तो जानते ही हो कि अपनी जो कदकाठी है वो इस लायक नहीं कि सिहांसन का वजन थाम पाये। भले शेर मामा की अनुकम्पा मुझपर बरसती है किन्तु मैं यह कतई नहीं चाहता कि उनके इस निर्णय से जनता जनार्दन में एक असंतोष व्याप्त हो। मामा के मरणोपरांत उन पर पक्षपात का आरोप मढ़ा जाये।

गधा- "तब क्या विचार किया तुमने?

सियार- "विचार क्या करना है? तुम्हें राजा के लिए आगे करेंगे."

गधा- "मुझे?"

सियार- "हां!आपको ही।"

गधा-"लेकिन मुझमें ऐसी क्या खूबी है सियार भाई."

सियार- " अरे क्या नहीं है तुममें.. धैर्य है, ताकत है, रफ्तार है, अपार बुद्धि के स्वामी हो और सबसे खास बात यह कि मीत हो तुम मेरे।

तुम राजा बनोगे तो तुम्हारा करीबी होने पर मुझे भी लाभ होगा, समझो कि मैं बिन मुकुट के जंगल का राजा बन बैठूंगा।"

गधा- "हूँ..लेकिन मुझे करना क्या होगा?

सियार- "कुछ नहीं भाई..पहले तो तुम्हें राजा के समक्ष निर्भीक भाव से हाजिर होना है। एक छोटा सा साक्षात्कार होगा..साक्षात्कार क्या, एक शिष्टाचार भेंट समझो। तदोपरान्त 'राजा शेर' तुम्हें कुछ दांवपेंच सिखायें जिसके की तुम भविष्य की चुनौतियों को सरलता और सहजता से स्वीकार कर सको लड़/निपट सको।

गधा- "दावपेंच ? अरे यार! मेरे पास न दो नाखूनों वाले पंजे हैं और न ही तीक्ष्ण दंत विन्यास. मै कौन सा दावपेंच सीखूंगा।"

सियार-" तुम्हारी यही कमजोरी और आत्मविश्वास हीनता तुम्हें गदहा बनाकर रखी है। मित्र तुम्हें पता ही नहीं कि तुम्हारे भीतर क्या है..फिर भी सोच लो क्योंकि यह समय दुविधा पूर्ण निर्णय का नहीं है। राजा बनने के लिए अपने मन-मस्तिष्क को दृढ़ करना पड़ेगा क्योंकि मैं यह कदापि नहीं चाहता कि राजा की नजर में मेरे चयन पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो। यह कोई बच्चों का खेल नहीं.. यह पूरे जंगल एवं वहां के जीवजंतुओं के भविष्य का विषय है। गदहा भाई ठंडे मस्तिष्क से विचार कर लो.. क्योंकि तुम्हारी कायरता एवं विचलन मुझे राजभवन में अपमानित कर देगी।

गदहा- " यदि तुम्हें मुझ पर इतना विश्वास है तो चलो लेकिन देख लेना भाई..

सियार- "फिर वही बात.."

गदहा- "ठीक है भाई चल तो रहा हूँ"

सियार गधे को लेकर सूर्यास्त के एक घंटे पहले हाजिर हो गया. सियार शेर के करीब आकर बोला-

" मामा आपकी आज्ञानुसार एक एक योग्य उत्तराधिकारी को चुनकर लाया हूँ. मैं चाहता हूँ कि आप भी इनकी योग्यता और क्षमता को परखे देखें और चमत्कृत हों."

शेर- " यहाँ आयें गदहा महाराज मेरे समीप विराजें.. बड़ी प्रशंसा सुनी है आपकी. लेकिन आज आपको देखकर विश्वास हो रहा है कि जंगल का भविष्य सुरक्षित हाथों में सौंपकर शरीर छोड़ूंगा। आइए करीब आइए मेरे."

गदहा धीमे कदमों से चलकर शेर के समीप पहुंच गया। शेर गदहे को अपनी ज़द में देखकर अपने पंजों से उसके गरदनों को घेरा फिर अपने बुजुर्ग जबड़ों से गरदन को जब्त करने के लिए बढ़ा.. कुछ देर तक तो गदहा दावपेंच सीखने और राज सत्ता के नशे में मशगूल रहा लेकिन नाखूनों के खतरनाक इरादों ने उसके भीतर सनसनी भर दी। एक क्षण में राजा बनने का ख्वाब हिरन हो गया और शेर की चंगुल से खुद को छुड़ाकर हिरन से भी तेज रफ्तार बनाकर भगा।

गदहे को छुड़ाकर भागता देख शेर और सियार दोनों स्तब्ध!

सियार- " क्या मामा! बड़ी बेइज्जती कराये..

बताओ! निवाला मुंह से निकल कर भाग गया और तुम ताकते रह गये। जब पूछा था कि 'तूर लोगे न मामा' उस वक्त तो हम पर गुर्रा रहे थे। सारी हेकड़ी निकल गयी।

शेर- " अबे हमको का मालूम कि एक सेकेंड में उछल कर भाग जायेगा नहीं तो पूरी तरह कसकर शिकार किया होता। खैर! जब भाग्य में गदहे का भेजा लिखा ही नहीं तो हमारे तुम्हारे प्रयास करने से क्या.. जाने दो भान्जे।"

सियार- " ऐसे कैसे जाने दें मामा..उसी को दुबारा पटकता हूँ तुम्हारे कदमों में"

शेर- " भांजे..मुझे नहीं लगता कि अब वो दुबारा आने वाला"

सियार- " आयेगा क्यों नहीं मामा..'है तो गदहा ही न'.."

सियार फिर निकला गदहो की टोली की तरफ..सिर झुकाये, चिंतित मुद्रा में... गदहे की निगाह जब सियार पर पड़ी तो शर्माते हुए नमस्ते करके अपनी झिझक छुड़ाई.

गदहा- " नमस्ते सियार भाई"

सियार ने सिर घुमाकर खिन्न भाव से बोला..

"भाड़ में जाये तुम्हारा नमस्ते, बड़ी बेइज्जती करायी हमारी। नाक कटवा दी.. एतना नाम और भौकाल बनाकर ले गये थे सब मटियामेट कर दिया.."

गदहा-" देखो सियार भाई!"

सियार-" चुप भर रहना.. एक सेकंड थम नहीं आये और चले हैं कानून बघारने"

गधा- "लेकिन यार पता नहीं क्यों उनके दावपेंच में मुझे कुछ खतरा लगने लगा इसलिए.."

सियार- " जब तुमको अपने मीत पर विश्वास नहीं बात ही खत्म"

गधा- " यार तुमपर विश्वास तो बहुत है लेकिन पता नहीं क्यों..

सियार- "अच्छा खबरदार हो जाओ, करेजा एक पैसा का नहीं चले हैं राजा बनने"

गधा- "अच्छा चलो फिर चलने को तैयार हैं लेकिन देख लेना भाई"

सियार- "कुछ नहीं देखना मुझे..हिम्मत हो तो चलो नहीं तो घास चरो.. हमको कौन गरज पड़ी है कि चिरौरी कर के राजा बनवायें, और अपनी बेइज्जती भी करायें।"

गदहा इतना ताना सुनकर तैयार हो गया.. लेकिन अबकी खूब चौकन्ना था लेकिन शेर ने भी अपनी व्यूह रचना में कोई कसर नहीं छोड़ी।

गदहे को सियार के साथ देखकर शेर गरजा- देखो भान्जे अबकी इनको समझा दो कि राजा बनना कोई बच्चों का खेल नहीं। पहले हिम्मत करके पांच मिनट सामने खड़े हों तब जाके राजा बनने का ख्वाब देखें.

अबकी गदहे न थोड़ी हिम्मत बांधी लेकिन उससे पहले ही शेर ने अपने जबड़े में बांध लिया सेकंडों में गदहे के राजसत्ता का ख्वाब अधूरा रह गया लेकिन यह क्या! जब शेर गधे का भेजा तूरे तो उसमें से गुदा गायब..

शेर का मुंह खुला का खुला रह गया उसने सियार की तरफ देखकर पूछा

" इसमें तो गूदा ही नहीं भान्जे!"

सियार-" आप भी मामा सठिया गये हैं बिल्कुल..गदहे के भेजे में गूदा होता तो राजा बनने आता और आ भी गया तो भागने के बाद दुबारा मेरे जाल में फंसता..

चलो तसल्ली हो गयी न कि गधे का भेजा तूरे हैं भले उसमें कुछ हो न हो..

रिवेश प्रताप सिंह

गोरखपुर

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